भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 609, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन यों कही, हे राजा बड़भाग ।
जानत होसब शास्त्र, भक्ति बिषै अनुराग ॥ १ ॥
वह ब्राह्मण अभिलाष सुत, फिर लागा तपध्यान ।
परम पुरुष का धांवना, हिरदै माहीं थान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
नारी की मन आशा रहै। काहू से मन की नहीं कहै ॥
रात दिना चिन्ता मन माहीं। छिन इक तिरिया भूलत नाहीं ॥
सब तन काम जगै दुखदाई। जैसे सूता सिंह जगाई ॥
उसी वासना बीज खिसाहा। होनहार की यही दिसाही ॥
वह बीरज कर माहीं लीन्हा। कंवल फूल माहिं धर दीन्हा ॥
मुंद गया कुशामांहिं लिपटाय। फिर वह गंगा बीच बहाया ॥
ब्रह्मा जू की आज्ञा दया। तैश कंवल जू बहता भया ॥
आगे सुनों कहैं रणजीता। जैसे कारज भया पुनीता ॥३॥
दोहा ॥
नग्गर एक सुहावना, गंगा निकट सुथान ।
राजा रघु ह्वां का धनी, तेजवंत ज्यों भान ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
सतजुग बीत जु त्रेता लागा । तब राजारघु भया सुभागा ॥
कुल में पूरा धर्म उजागर । दयावंत अरु किरपा सागर ॥
जाकी परजा सब सुख पावै । नितही समां काल नहिं आवै ॥
धनवन्ते सुन्दर नर लोई । बड़ी उमर के रोग न कोई ॥
राजा जितका रघु सतवादी । निहकंटक निरभय जिंहगादी ॥
सूर बीर दाता सुखदाई । जाकी जग में बहुत बड़ाई ॥