भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५६५
कहो ऋषीश्वर कैसें आये । कौन अर्थ कारज क्यौं लाये ॥
इन्द्रीजीत अरु तुम निरवासी । कैसे आये हमरे पासी ॥
कहै उद्दालक सुनहो नाथा । पूछूँ बात नवाऊं माथा ॥
यह परसँग पूछन कौं आयो । मेरे संतति लिखी बतावो ॥४२॥
ब्रह्मोवाच ॥
दोहा ॥
तब ब्रह्मा भाषत भये, सुनहो यही बिचार ।
तेरे पुत्तर होयगा, वंश बढ़ावन हार ॥ ४३ ॥
बचन हमारा सांच हो, हिरदै राख निहार ।
पहिले पुत्तर आय है, ताके पीछे नार ॥ ४४ ॥
सोई सुता रघुवंश की, पतिबर्ता धर्म रूप ।
गोत बढ़ावन हारही, सुन्दर अधिक अनूप ॥ ४५ ॥
हे ब्राह्मण अब जाइए, अपने आश्रम माहिं ।
परजापति करतार मैं, तू चिंता कर नाहिं ॥ ४६ ॥
उद्दालकउवाच ॥
चौपाई ॥
रिषीने कही जोर कर दोई । नारी बिना पुत्तर कस होई ॥
ऐसी कहीं भई विपरीता । पाछे नारी पहिले पूता ॥
मिथ्या वचन करी तुम हांसी । मैं सकुचा मन भया उदासी ॥
उद्दालक के वचन सुने जब । विधि ह्वां अन्तर ध्यान भये तब ॥
गया देख ब्रह्मा को हाईं । रिषी आया अस्थलके माहीं ॥
अपने मनमें ऐसे ताकी । ब्रह्मा हम सूं झूठी भाषी ॥
कौन भांति बनिहै यह बाता । पहिले पुत्तर पाछे बनिता ॥
सोच सोच भया अधिक उदासा। उद्दालक कहैं चरणहीदासा ॥४७॥
इति श्रीनासकेतउपाख्याने श्रीरणजीतगुसांईजीकृत
उद्दालकचिंतावर्णनोनाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥