सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 604, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 604

नासकेतलीलावर्णन । ५६३
मूयें किरिया को करै, अगत जाय हो भूत ॥ ३२ ॥
चौपाई ॥
वेद माहिं ऐसे लिख राखा । ब्रह्माजूने परगट भाखा ॥
याकूं समझ जतन अब कीजे । उपजावन पुत्तर मन लीजे ॥
ब्राह्मण श्रेष्ठ तोहि मैं जानौं । मेरे बचन सांच करि मानौं ॥
उद्दालकउवाच ॥
मुनि उद्दालक ऐसे कहिया । ब्यासी सहसबरस तप रहिया ॥
रहूं अस्थिर मन में नहिं आवे। तिरिया पुत्तर को उपजावे ॥
हे पिप्पलादिक चितना धरूं । तिरिया का संग कैसे करूं ॥
नेम बर्तकों कैसे हारूं । भवसागर में मन क्यों डारूं ॥
नरकमाहि वेही नर जावें । टेक बर्त कूं जो विसरावें ॥ ३३ ॥
दोहा ॥
जिन छोड़ा है नेम कों, खोया तप का मूल ।
छोड़ छोड़ फिर जग लिया, ताके मूंहडे धूल ॥ ३४ ॥
चौपाई ॥
लिखा वेद में नरकों जैहै । दुनिया तज दुनिया फिर लैहै ॥
कई भांत के दुख उठि लागैं। आवत हैं वाही कै आगैं ॥
हो अतीत फिर घर में आवैं । तीन लोक में भरमत धावैं ॥
मुकति ठिकाना वाकूं नाहीं । जाय परै चौरासी माहीं ॥
नारी सुत कछु काम न आवैं । अंत समय ह्यांई रह जावैं ॥
कोई किसी का संगी नाहीं । मारगमें मिल मिल उठजाई ॥
तातें जग कूं मिथ्या देखा । सुत नारी का झूठा लेखा ॥
यातें करूं न मन में आवे । धोखे में अब को भरमावे ॥ ३५ ॥
दोहा ॥
मैंने तप धारन किया, कैसे छांडूं ताहि ।