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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 605

५६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हांसी होवे जगत मैं, अपकीरति हो जाहि ॥ ३६॥
पिप्पलादकउवाच ॥
चौपाई ॥
फिर पिप्पलाद जु बोला ऐसैं। आप स्वारथी भाषै जैसैं ॥
हे उदालक यह सुन लीजे। जुक्ति अजुक्ति बिचारही कीजे ॥
जो कोइ संतति सूं है हीना। वाका धर्म सदा है छीना ॥
अरु जिनकी तपसूं रुचि नासी । सो वे भिष्टल नरक निवासी ॥
हम तेरा तप नाहिं छुटावैं। बलकी उलटा धर्म बढ़ावैं ॥
सुत उपजावन ही के हेता। नारी संग करै जो जेता ॥
इन्द्री स्वाद सदा नहिं धावै । रितु के समय दान दे आवै ॥
वाकूं पाप दोष नहिं लागै । ब्रह्माबचन जु भाष आगै ॥ ३७॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे कहि पिप्पलाद मुनि, गए ब्रह्मा के पास ।
सभी सुनाई जो हुती, वाकी सभै सुबास ॥ ३८ ॥
ब्रह्मा की अज्ञा लई, और किया परनाम ।
रिषी गए अस्थान कूं, पूरन करि के काम ॥ ३९ ॥
हे राजा ऐसे भई, उदालक तप माहिं ।
विघ्न हुवो चिंता लगी, हिरदै तिरिया छाहिं॥ ४० ॥
दुखी रहै सोचत रहै, नित यों करै विचार ।
को कन्या कितसो लहूं, अरु जाऊं किस द्वार ॥ ४१ ॥
चौपाई ॥
इस कारन ब्रह्मा पै जाऊं। यह सब अपनी बात सुनाऊं ॥
मो भागन सुत है अकि नाहीं । ऐसे पूछूं जाय गुसाईं ॥
चल्यो चल्यो ब्रह्मापै आयो। हाथ जोर के शीश नवायो ॥
ब्रह्मा बहुतक आदर कीनो। बैठन कारन आयसु दीनो ॥