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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 610

नासकेतलीलावर्णन । ५६७
चंद्रवती थी पुत्री ताकी । धुर सूं कथा कहूं मैं वाकी ॥
जन रणजीत कहैं सुन लीजै । सबही श्रोता ह्यां चित दीजै ॥५॥
दोहा ॥
सुंदर मंदर सोहना, दिपत विराज हुलास ।
चूने लीपा सेतही, जित कन्या का बास ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रंग महल जहां चित्तर कारी । ऊंचा महल झरोखे बारी ॥
महा सुन्दरी कंचनबरनी । सुघड़ चतुर देखत मनहरनी ॥
नख शिख ज्यों विधि आप सँवारी। गुनवंती अरु रूप उज्यारी ॥
दिवियों विषे न कन्या ऐसी । गंधर्व्यों विषे न कहिये जैसी ॥
आसुरी विषे जु देखी नाहीं । ना कहिये तिरलोकी माहीं ॥
वैसा रूप न हुआ न होगा । वा कन्या कै जोगन जोगा ॥
बड़ी अप्सरा चार पिछानों । रंभा और उरवसी मानों ॥
और तिलोत्तमा तीजी नारी । और मैनका चौथी प्यारी ॥७॥
दोहा ॥
ये जो चारों अप्सरा, स्वर्गही मांहि अनूप ।
उनसैं भी बहुतै सरस, वा कन्या का रूप ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
दस हजार जो कन्या ओरी । वाके पास रहैं करजोरी ॥
सो वह कन्या सखियों साथी । परन बांधि गंगा नितन्हाती ॥
न्हाय सदाही भोजन करती । सखियों सहित सुखी जोरहती ॥
एक दिना ऐसी गति भई । चढ़ि सुखपाल गंग कूं गई ॥
भांत भांत के भूषन साजैं । मुतियन के गलहार बिराजैं ॥
आगे पीछे दहिने बावैं । चढ़ि तुरंगन कन्या जावैं ॥
कोइ कोइ भुजा चंवर कर धारैं । बस्तर भूषण रूप सँवारैं ॥९॥
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