भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४७
होत जज्ञ भली भांत जु उनके काजही ॥ ५४॥
बैठे बहुते विप्र और पंडित जहां ।
श्री वसुदेव ने दान बहुत दीन्हे तहां ॥
ऐसी विधिसों जज्ञ कियो चित लायकै ।
कर स्नान जो दान दिये मन लायकै ॥
सव राजन कों आय तभी पूजा दई ।
सवकी पूरी आस जु कुछ इच्छा भई ॥
सुर किन्नर गंधर्व तहां जो आइया ।
आय़ुस ले निज धाम सभी जु सिधाइया ॥
कौरों भीषम आदि और उन साथ के ।
बहुतै और नरेश हितू जदुनाथ के ॥
अस्तुति श्रीजदुराज की मिल सबहुन कही ।
नमस्कार करजोर सवन आय़ुस लही ॥
श्री वसुदेव सुजान वचन भाषन लगे ।
ब्रजबासिन के साथ प्रीत रस में पगे ॥
तुम तो प्रान समान हमारे हो सबै ।
तुमतें कैसी भांति होहिं न्यारे अबै ॥ ५५॥
या बिध कहत सुनाय प्रेम की बात
तब देवी इंह भांत श्याम सों यौं कही ।
तोहि कछू इंह ठांव में सुध बुध है रही ॥
बहु असुरन के माहि बसे द्वारींपुरी ।
कहिबेतें यह बात तोहि लागै बुरी ॥
चलो जाव घर और बेग सुध लीजिये ।
नातौ ऐसें राज काज सब छीजिये ॥
यह सुनकै घनश्याम नंद कों बोल कै ।
बोले छबि अभिराम हिये कों खोल कै ॥
कही धन्य ए द्योस जु तुम दरशन लहैं ।
तुमतें न्यारे होन नहीं कबहुँ चहैं ॥
तुम तें बिनती करत कंपत सब गात है।
हम सें ऐसी कहत न आवत बात है॥ ५६॥
रक्षक नाहीं कोय द्वारिका में उहां ।
जो तुम आज्ञा होय तो अब जावें तहां ॥
इक परदेश में वास रिपुन के बीचही ।
नातो तुम्हरो पास नहीं छोड़ें कभी ॥
यह कारन मनलायके आज्ञा दीजिये ।
आपन हूं ब्रज जाय गोधन सुध लीजिये ॥
देख नंद और मात जसोधा ओरहीं ।
रोवें नार नवाय कै नंद किशोरही ॥
तक मुख रोवन लागे जसोधा नंदहू ।
परो ग्रीवके बीच प्रीत को फंदहू ॥
कहैं कन्हैयालाल हमें तू राख लै ।
लोटन लगे तिंह काल बचन यह भाखकै ॥
नंद कहैं घनश्याम हमें संग लेहु जू ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४६
जसुमत कों गृह काज जान किन देहु जू ॥
जसुमत कहैं नंदराय सों तुम गृह कों चलो ।
साजो घर और बार करो कारज भलो ॥ ५७ ॥
लोक बंध की लाज सभी तज डार हूं ।
निशिदिन या ब्रजराज कों नैन निहारहूं ॥
दूर करो मत मोहिं देवकी माइ जू ।
हौं तुम्हरे ब्रजराज कुंवर की धाई जू ॥
धाइन को बहु भांत सूं आदर कीजिये ।
असन बसन धन धाम भली बिध दीजिये ॥
गोधन और धन सकल हमारो लेहु जू ।
नित प्रत मोहनलाल कों देखन देहु जू ॥
पाँच सात मिल बात जु ऐसी विध कहै ।
सबहुन जानें देहु सु हम ह्याहीं रहें ॥
सबं मिल ऐसी भांति मतो मनमें करै ।
तब उत भेंटैं कौन पाय काके परै ॥
भाषैं श्री वसुदेव जु हम केतो कहै ।
ये तो केहूं भांति कहे नाहीं लगै ॥
हम सबही बहु भांति जु कहि कहि हारई ।
प्रेम प्रीत भरभार टेक नहीं टारई ॥ ५८ ॥
तब अपनी घनश्याम माया विस्तारिया ।
जासों सब ब्रह्मण्ड में कौतुक धारिया ॥
सो माया ब्रज लोगन ऊपर डारिया ।
तब चलबे की सोंज सबन जु सँभारिया ॥
चलो चलो अब बेग सभी मुखतें कहैं ।
राम राम परनाम नहीं रसना लहैं ॥
५५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिह माया करतार सकल जग बस कियो ।
सो माया नहीं फेर सकत राधा हियो ॥
माया अतिबलवंत न कोऊ सम करैं ।
प्रेम राधिका अग्र धीर नाहीं धरैं ॥
चींटी निरबल आंधक कहा बलधारई ।
जब हस्ती पग माहिं पकर कै डारई ॥
ब्रजबासी सब लोग बाट ब्रजकी लई ।
ग्रह कारज के माहिं सबन की मत छई ॥
राधा रुकमिन गेह रही ठहराय कै ।
चलबे की चित नाहिं रही मन लायकै ॥ ५६ ॥
तब हरिजू रनवास सबै जु बुलाइया ।
विनती कर मृदुबैन सभुन समझाइया ॥
राधा आंते परबीन चतुर चित जानई ।
हठ दृढ़ गहकै और बात नहीं मानई ॥
कहै सुनैं को बात सो कासों भाषई ।
केहूं कैसी भांति मरन अभिलाषई ॥
विष भष अपने पेट कटारी ही करूं ।
ना तो अबही बूड़ सरोवर में मरूं ॥
मृत अकाल बिचार नेक धीरज गहै ।
केहूं बिध जदुनाथ-को नित दरशन लहै ॥
कूदपरी जल माहिं सरोवर के तहीं ।
महा तपत उर माहिं भई सीतल नहीं ॥
कंठ कुंवर परमान भयो जल सब तहां ।
अति गंभीर अधीर नीर जो हो उहां ॥
तब सतभामा बोल उठी इह भांत सों ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५५१
मनकी घुंडी खोल जीव की बात सों ॥ ६० ॥
चाहत लीन्हों कंथ परायो चोरकँ ।
चितवत बारही बार नैन की कोरकैं ॥
जब लग हैं घनश्याम बाल गोपाल ही ।
तबलग देखे चरित तिहारे ख्याल ही ॥
क्यों नहीं ब्रज कों जाव रहो घर बैठ कै ।
बाद परायो गेह चहत हो पैठ कै ॥
अब तो यह जदुनाथ जगत नायक भये ।
ग्वाल गंवार तुम्हार बात लाइक रहे ॥
तजैं नहा कुललाज बंध की हीय सों ।
जे कुल नार बिचार करें यह जीय सों ॥
मात पिता जिंह गेह जाह के संग दियो ।
उन दुख सुख में साथ सदा ताको कियो ॥
मरत जियत नहीं छाड़ पुरुष के सग रहें ।
ये लक्षन कुल बधू पुरानन में कहें ॥
तब श्रीराधा बोल उठी इह भांत सों ।
सतभामा चितलाय सुनो इह बात कों ॥ ६१ ॥
वेद पुरानन माहिं जु ऐसें गाइया ।
जिन पायो जग माहिं प्रेम तें पाइया ॥
जे प्रेमी जन होहिं सकल सिरमौर हैं ।
तिन पाछैं -हरि फिरत जैसें चकडोर हैं ॥
अब तुम सुनहु बनाय प्रेम की रीत कों ।
दिब्य दृष्टि कर देखो हिये में प्रीत सों ॥
जिन हरिजू के साथ जु नातो मानिया ।
मन्दभाग जग माहि कछू नहीं जानिया ॥
३७
५५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नाते पै मतभूल न धोखे में परो ।
बर्न कुलीन बिचार गर्ब मत चितधरो ॥
मात पिता जो नेम बतायो चावसों ।
सब जग लीन्हों नेम प्रीत के भावसों ॥
अब तो हम संसार जो प्रेम बखानईं ।
प्रेम नेम को भेद कछू नहीं जानई ॥
जिह बन में सिंहराज विराजत प्रेम है ।
तिह बन तैं गजराज ज्यों भाजत नेम है ॥ ६२ ॥
तू अजान नहिं जानें न नेक हूं मानई ।
हरि जानें यह रीत कि रुकभिन जानई ।
यह त्वै जग के माहिं प्रगट कीरत भई ॥
तेरे पिता हरि बाद दोष चोरी दई ॥
मणि की चोरी काज जु हरि कितहूं गये ।
मणि पाई उहं ठांव खिस्याने सब भये ॥
तैं तो हरि के काज कहा कारज कियो ।
जग उपहास पै हास सीस ऊपर लियो ॥
कर झझारी अग्नि दई भांवर जहां ।
ऐसी बिध सों ब्याह भयो तुम्हरो तहां ॥
ऐसी बिधको ब्याह नहीं कोऊ करै ।
ऐसे ब्याह को गर्ब कहा मन में धरै ॥
जग में ऐसो ब्याह जहां तहां पाइये ।
पे यह प्रेम को ब्याह कठिन मन लाइये ॥
मो सम नहीं तेरो प्रेम चढ़ावत भौंह क्यों ।
हरिसों बूझ यह बात देह हरि सोंह हों ॥ ६३ ॥
सुनकर बोले बात तभी ब्रजनाथ जू ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५५३
राधा भाषत सांच सभी यह बात जू ॥
जबही सुने इंह भांत बचन जदराय कै ।
बिन रुकमिन सब और रहीं खिसयाइ कै ॥
बहुरों श्री घनश्याम बचन ऐसें कहो ।
राधा प्यारी बैन हमारे चित लहो ॥
जल भीतर तें निकस बाहरें आव हों ।
जो चाहत मन माहिं सु हमें बतलाव हों ॥ ६४ ॥
राधा कहत सुनाय बचन इक पावहूं ।
तबहीं जल तें निकस बाहरें आवहूं ॥
कहो तबै घनश्याम जु कछु मांगो अबै ।
सो सब तुमकों दैहुं जु तुम इच्छा सबै ॥
बबा नन्द की सहस दुहाई जानियो ।
तुम्हरे चरन की सौंह हिये में आनियो ॥
बोली राधा तबै बृन्दावन जांव जू ।
कै नित रहो तहां संग कै नीर समाव जू ॥ ६५ ॥
यों ही करूंगो प्यारी कहो जग साइयां ।
श्री राधा मन भयो अनंद बधाइयां ॥
पर्मानन्द सुख पाय धरी मन धीरही ।
आई बाहर निकस सरोवर नीरही ॥
रुक्मिन नौतन चीर अनूप मंगाइया ।
राधा जू के अंग सकल पहराइया ॥
राधा जी को प्रेम कि बिसवै बीस है ।
चरणहिदासा वार कि तन मन सीस है ॥ ६६ ॥
गुप्त भईं राधा कुंवर बृन्दावन आइया ।
श्रीब्रजदूलह कुंवर संगही ल्याइया ॥
५५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तहां आय बहु भांत सुभोगे भोगही ।
नित बिहार जहां होत जानत सब लोगही ॥
वेई वृक्ष वेई कदम जमुन के कूलही ।
वेई कमल सरोज कमोदनि फूलही ॥
वेई जमुनां नीर सुपर्म रसालहीं
जहां क्रीड़त आनँद सों मोहन लालहीं ॥ ६७ ॥
दूजो कृष्ण सरूप और परगट भयो ।
सो रानी पटरानी देवकी संग गयो ॥
यह लीला सुखरास सुनै जो गावई ।
पूजै मनकी आस परम सुख पावई ॥
लीला परम पुनीत भक्त की रीत सों ।
चरणदास कहि भाष भली विधप्रीत सों ॥
जो बांचै चित्तलाय कोइ सरवन करै ।
भक्ति परापत होय हिये आनंद भरै ॥
प्रेम भक्ति के भाय यह लीला गाइया ।
चरन कमल चितलाय परम सुख पाइया ॥
अरज करै चरनदास सुनौ शुकदेव जू ।
जनम जनम द्यो भक्ति करूं गुरू सेवजू ॥ ६८ ॥
इति श्री कुरुक्षेत्र लीला अष्टपदी छन्द श्री महाराज साहिब
श्यामचरणदास जी कृत संपूर्णम् ॥
श्रीराधाकृष्णार्पणमस्तु ॥
फुटकरपद । ५५५
(ग़ज़ल)
मुझे श्याम से मिलने की आरज़ू है।
शबोरोज़ दिल में यही जुस्तजू है॥
नहीं भाती हैं मुझको बातें किसी की।
सुनी जब से उस यार की गुफ़्तगू है॥
नहीं मुझको मतलब जहाँ में किसी से।
चुभा जबसे दिलमें सनम् खूबरू है॥
जो आशिक़ है उसका नहीं उस्से ग़ाफ़िल।
तड़पता अज़ल से खड़ा रूबरू है॥
शराबे मुहब्बत पिई जिसने यारो।
हुवा दोनो जग में वही सुर्ख़रू है॥
सभी आशिक़ों पे किया कर्म तूने।
मुझ आसी पे तेरा नहीं दिल रुजू है॥
जहाँ देखे रनजीत हाज़िर वहीं है।
हर इक गुल में उसकी मिली मुश्कबू है॥
(शब्द-उरदू)
मुरशद मेरादिल दरियाई दिलके अन्दर खोजा।
तिसके अंदर सत्तर काबा मका तीसों रोज़ा ॥ १ ॥
चौदह तबक़ औलिया जिसमें भेद न होर्य जुदाई।
सहस्र कमाल नमाज़ में ठाढ़े दर्शन जहाँ खुदाई ॥ २॥
हवा न हिर्स खुदी नहिं खूबी अनलहक़ जहांबानी।
बिन चिराग़ खाने सब रौशन जिसमें तरूत सुभानी ॥ ३॥
बिना शजर जहाँ बहु गुलफूले बिना अबर जहां बरसै।
बिन सरोद तंबूर बजत हैं चश्मे हो मन दरसै ॥
जिस दरगाह मसल्ला डारें बैठे क़ादर क़ाज़ी।
५५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
न्याय करें सीनें की पूछें रक्खें सबको राजी ॥
तिसके फल दीदार किये से नादिर होइ फ़क़ीर ।
मारे काल कलंदर अंदर दिलमें धारे धीर ॥
ऐसा हो जब कमला होई तब कमाल पद पावे ।
साहब मिल साहब को दरसे ज्यों जल बूँद समावे ॥
ऐसा हो सोइ पीर कहावे मनी मान सब खोवे ।
चरनदास ज़मीपर रोशन पाव पसारे सोवे ॥
(कवित्त)
जीवत मरजाय उलट आप में समाय मन कहीं नहीं जाय
यह ऐसी दिलगीरी है। करे बिपिन बास जिन जानत जी
भूख प्यास मेटी पर आस और परम सबूरी है ॥ परमतत्त्व
को बिचार चिंता सबडार हरि रसमें मतवार यह ऐसी
अमीरी है। कहे चरणदास दोनों दीनमें पुकार यार सबही
आसान एक मुशकिल फ़क़ीरी है ॥
श्रीशुकदेव अष्टक ॥
(छन्द)
षोडशवर्ष किशोरमूरति श्यामवरण दिगम्बरं ।
घूघरवारे केस झलकें शुकमुनि चरण प्रणाम्यहं ॥ १ ॥
पद्मआसन उदर त्रिबली चरण पंकज शोभितं ।
आजानुभुजमुसकात मुखसों शुकमुनि चरण प्रणाम्यहं ॥ २ ॥
गूढयंत्रु विशाल उर छबि नाभि गंभीर बिराजतं ।
जलज लोचन सुखद नासा शुकमुनिचरण प्रणाम्यहं ॥ ३ ॥
श्री व्यासनंदन जगद्वन्दन मोह ममत्व निकंदनं ।
कामक्रोध मदलोभ न जिनमें शुकमुनि चरण प्रणाम्यहं ॥ ४ ॥
फुटकरपद । ५५७
ब्रह्मरूप अनूप मुनिवर पराशर कुलभूषणं ।
श्रीकृष्णचरित पुनीत वर्णत शुकमुनिचरण प्रणम्यहं ॥ ५ ॥
त्रिभुवन उजागर कृपासागर द्वंद्व संकट मोचनं ।
प्रेममद मातेरहें नित शुकमुनिचरण प्रणम्यहं ॥ ६ ॥
निरालंब निहभर्म निसिदिन स्थिर बुद्धि निकेतनं ।
धर्मधारी ब्रह्मचारी शुकमुनिचरण प्रणम्यहं ॥ ७ ॥
पतित पावन भर्म नसावन शरणागत सुखदायकं ।
मायाजीतं गुणातीतं शुकमुनिचरण प्रणाम्यहं ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेव अष्टक परमसुंदर पठत पाप नशायकं ।
चरणदास शुकदेव स्वामी भक्ति मुक्ति फलदायकं ॥ ९ ॥
५५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ओम् ॥
श्रीशुकदेव जी सहाय ॥
अथ श्री महाराज साहिब श्री स्वामिचरणदास
जी कृत नासकेत लीला प्रारम्भते ॥
दोहा ॥
जै जै श्रीमुनि व्यासजी, जै जै गुरु शुकदेव ।
तुम किरपा सूं कहत हूं, नासकेत को भेव ॥ १ ॥
आय बैठ हिरदै बिषै, मो मुख कहो बखान ।
तुमतो जानत हो सबे, मैं हूं मूढ़ अजान ॥ २ ॥
चरणदास हो कहत हूं, भाषा परम पुनीत ।
सुन सुन आवै नीत पर, छूटै सकल अनोत ॥ ३ ॥
नर नारी सुन लीजिए, अद्भुत कथा सुजान ।
पाप पुण्य की ओर सूं, जो कोइ होय अजान ॥ ४ ॥
त्रेतायुग की यह कथा, संस्कृत के माहिं ।
नासकेत ही नांव है, मैं भाषूं ले छाहिं ॥ ५ ॥
नीमपारहो के बिषे, कथा कही जो सूत ।
सौनक आदि रिषी सबै, सुन
नासकेतलीलावर्णन । ५५६
सोरठा ॥
ब्राह्मण ऋषों समेत, बैशंपायन पासही ।
गया जु करि बहु हेत, कछु पूछन की आसधरि ॥१०॥
पांडव वंश मझार, उपजा हुवा जु भूप यह ।
बोला वचन सँभार, बैशंपायन साथही ॥११॥
जनमेजय उवाच ॥
चौपाई ॥
करि डंडौत बचन यों भाषा । अरुचरनन परि मस्तक राखा ॥
सीस उठा मुख तका सुभागे । फिर यों अस्तुति करने लागे ॥
हे बुधवान बड़े तुम चतुर । भक्ति तपस्या में अति आतुर ॥
सर्व शास्त्र तुम नीके जानों । धरम दया नीके पहिचानों ॥
व्यासदेव के शिष बहु प्यारे । जोगी महा जगत सूं न्यारे ॥
दिव्य कथा पूछत हूं तोही । पाप संपूरन काटन सोई ॥
किरपा करि संदेह मिटावो । भिन्न भिन्न करि सभी सुनावो ॥
जनमेजय यों पूछन कीना । रणजीत कहैं ऋषि उत्तरदीना १२
वैशंपायन उवाच ॥
दोहा ॥
सुन राजा अद्भुत कथा, कहूं तुम्हारे हेत ।
इस में संशय है नहीं, सर्व पाप हरि लेत ॥१३॥
राजा कथा पुरान की, शुभ है सुनने जोग ।
और ऋषीश्वर भी सुनों, तन मन नासैं रोग ॥१४॥
चौपाई ॥
एक ऋषि जो पहिले भया । धर्मनीक उज्ज्वल मन छया ॥
उद्दालक जिंह नाम बखानों । तपसी ब्रह्मा का सुत जानों ॥
वेद अर्थ का जाननवारा । इंद्रीजित जोगेश्वर भारा ॥
५६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हिरदा शुद्ध ब्रह्म बुध जाकी । तेजवंत सुंदर छबि ताकी ॥
जाका आश्रम सुन्दर नीका । ऋषि मुनि करकर शोभतटीका ॥
भांति अनेक वृक्ष जहा सोहैं । फूलन भरे अधिक मनमोहें ॥
हरि हरी बेल रही लिपटाई । बोलत भँवर महा सुखदाई ॥
हंस आदि पक्षी बहु सोहत । मोर चकोर कोकिला मोहत १५
दोहा ॥
अरु पक्षी ह्यां बसत हैं, शुभ शुभ भांति अनेक ।
शोभा सब बरनूं कहा, अधिक एक तें एक ॥१६॥
चौपाई ॥
उड़ि बैठे पक्षी जहां तरवर । कँवल भरे सोहैं तहां सरवर ॥
आश्रम सुखदाई बरनां सो । उद्दालक उस ठौर रहें सो ॥
तेजवंत सूरज ज्यों राजैं । जिनके दरशन पातक भाजैं ॥
तपकी शोभा दस दिस छाई । देवलोक में भई बड़ाई ॥
अठासी बरस सहस तप कीनों । लोक वेद में नां चितदीनों ॥
एक पांव सूं ठाड़े रहै। जाड़ा गर्मी पावस सहैं ॥
अधिक तपस्या गाढ़ी कीन्हीं । जाकूं सुरपति सुन अरुचीन्हीं ॥
ईन्द्र भूप डरा मन माहीं । तन में धीरज रहा जु नाहीं १७
दोहा ॥
सकल विकल बहुतै भई, धीरज रहा जु नाहिं ।
कांप कांप बेगी गया, ब्रह्मलोक के माहिं ॥१८॥
चौपाई ॥
जां ब्रह्मा का दरशन लीना । साष्टाङ्ग परनाम जु कीना ॥
फिर बिरंचि आदर बहु कीया । अरघ और आसन जोदीया ॥
भय करि दुखी इंद्र हो रहा । ब्रह्मा आगे अस्थिर भया ॥
नैन उदास दीन मुख कीयें । बिरंच और को तनमनदीयें ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६१
ब्रह्मोवाच ॥
हे इन्दर तू कैसे आया। दुखी दीन मुख क्यों जु बनाया ॥
भय उपजा कासों तोहि भारी । आसन क्यों कांपा बलकारी ॥
इन्द्रउवाच ॥
इन्दर कहै सुनों विधि करता । तुमही या जग के हो भरता ॥
वही कहूं जासूं भय खाया । तुम्हरे चरन निकट ज्यों आया ॥१९॥
दोहा ॥
मुनि उदालक पुतरतो, तिरलोकी विख्यात ।
तप जु करै भू लोक में, एक पांव दिन रात ॥२०॥
तप करतें बहुचिर भया, तातें हिया डरात ।
आसन कांपत है घनों, धीरज नाहिं धरात ॥ २१ ॥
यातें कहो उपावही, कित जाऊं मैं भाज ।
अमरावती नगरी सहित, सोंपा ह्यां का राज ॥ २२ ॥
अरु सोंपूं तिरलोक हू, कहां रहूं मैं जाय ।
कहा करूं रिषि तेज सूं, भय व्यापो अधिकाय ॥ २३ ॥
सूतउवाच ॥
[L
५६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
ब्रह्मा ही के बचन सुनि, खुसी होय सुख पाय ।
गया जु इन्दर लोक में, आनन्द अधिक बढ़ाय ॥२८॥
चौपाई ॥
अब सुन ब्रह्मा जू की दाया । पिप्पलादिको निकट बुलाया ॥
सभी भांत कर वह समझाया । उद्दालक के पास पठाया ॥
तप निरबर्त करन के काजे । पिप्पलादि मुनि आय बिराजे ॥
उद्दालक उठि आदर कीना । बड़े भाव सूं आसन दीना ॥
चरन धोय कर पूजा कीन्ही । नमस्कार कियो कर आधीनी ॥
और कही तुम ह्यां पग धारे । कौन हेत कहिये मुनि प्यारे ॥
पिप्पलादकउवाच ॥
पिप्पलाद कही सुन रिषिराये । सहजें हम दरशन कूं आए ॥
बड़ी तपस्या का धन तेरे । पै संदेह उठा इक मेरे ॥ २६ ॥
दोहा ॥
नारी सुधारी रिषि सबै, तप करें अधिक अत्यन्त ।
तप धनही के जोर सूं, रहें जु सदा अचिन्त ॥३०॥
चौपाई ॥
सबके आश्रम में सुतनारी । सुन्दर भवन महा सुख भारी ॥
तुम्हरे तिरिया ना संताना । यह हम अचरज बहुतक माना ॥
पुत्र बिना कुल बंस न चालै । सोत बिना सूखै ज्यों तालै ॥
बंश नष्ट सूं आगै नाहीं । पित्र देवता रीते जांहीं ॥
होहिं न परसन नीकै जानौ । तातें उपजावन सुत ठानौ ॥
जीवत मरतैं काज संवारै । भला पुत्र हो दो कुल तारै ॥
दीपक सूं दीपक ज्यों लागे । ऐसे वंश चलै यौं आगे ॥
जो कोई पुत्र बिनाहै हीना । वाका जगत सुन्न अरु छीना ॥
दोहा ॥
वाकूं घरसूं काम क्या, खोवन वंश अऊत ।
नासकेतलीलावर्णन । ५६३
मूयें किरिया को करै, अगत जाय हो भूत ॥ ३२ ॥
चौपाई ॥
वेद माहिं ऐसे लिख राखा । ब्रह्माजूने परगट भाखा ॥
याकूं समझ जतन अब कीजे । उपजावन पुत्तर मन लीजे ॥
ब्राह्मण श्रेष्ठ तोहि मैं जानौं । मेरे बचन सांच करि मानौं ॥
उद्दालकउवाच ॥
मुनि उद्दालक ऐसे कहिया । ब्यासी सहसबरस तप रहिया ॥
रहूं अस्थिर मन में नहिं आवे। तिरिया पुत्तर को उपजावे ॥
हे पिप्पलादिक चितना धरूं । तिरिया का संग कैसे करूं ॥
नेम बर्तकों कैसे हारूं । भवसागर में मन क्यों डारूं ॥
नरकमाहि वेही नर जावें । टेक बर्त कूं जो विसरावें ॥ ३३ ॥
दोहा ॥
जिन छोड़ा है नेम कों, खोया तप का मूल ।
छोड़ छोड़ फिर जग लिया, ताके मूंहडे धूल ॥ ३४ ॥
चौपाई ॥
लिखा वेद में नरकों जैहै । दुनिया तज दुनिया फिर लैहै ॥
कई भांत के दुख उठि लागैं। आवत हैं वाही कै आगैं ॥
हो अतीत फिर घर में आवैं । तीन लोक में भरमत धावैं ॥
मुकति ठिकाना वाकूं नाहीं । जाय परै चौरासी माहीं ॥
नारी सुत कछु काम न आवैं । अंत समय ह्यांई रह जावैं ॥
कोई किसी का संगी नाहीं । मारगमें मिल मिल उठजाई ॥
तातें जग कूं मिथ्या देखा । सुत नारी का झूठा लेखा ॥
यातें करूं न मन में आवे । धोखे में अब को भरमावे ॥ ३५ ॥
दोहा ॥
मैंने तप धारन किया, कैसे छांडूं ताहि ।
५६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हांसी होवे जगत मैं, अपकीरति हो जाहि ॥ ३६॥
पिप्पलादकउवाच ॥
चौपाई ॥
फिर पिप्पलाद जु बोला ऐसैं। आप स्वारथी भाषै जैसैं ॥
हे उदालक यह सुन लीजे। जुक्ति अजुक्ति बिचारही कीजे ॥
जो कोइ संतति सूं है हीना। वाका धर्म सदा है छीना ॥
अरु जिनकी तपसूं रुचि नासी । सो वे भिष्टल नरक निवासी ॥
हम तेरा तप नाहिं छुटावैं। बलकी उलटा धर्म बढ़ावैं ॥
सुत उपजावन ही के हेता। नारी संग करै जो जेता ॥
इन्द्री स्वाद सदा नहिं धावै । रितु के समय दान दे आवै ॥
वाकूं पाप दोष नहिं लागै । ब्रह्माबचन जु भाष आगै ॥ ३७॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे कहि पिप्पलाद मुनि, गए ब्रह्मा के पास ।
सभी सुनाई जो हुती, वाकी सभै सुबास ॥ ३८ ॥
ब्रह्मा की अज्ञा लई, और किया परनाम ।
रिषी गए अस्थान कूं, पूरन करि के काम ॥ ३९ ॥
हे राजा ऐसे भई, उदालक तप माहिं ।
विघ्न हुवो चिंता लगी, हिरदै तिरिया छाहिं॥ ४० ॥
दुखी रहै सोचत रहै, नित यों करै विचार ।
को कन्या कितसो लहूं, अरु जाऊं किस द्वार ॥ ४१ ॥
चौपाई ॥
इस कारन ब्रह्मा पै जाऊं। यह सब अपनी बात सुनाऊं ॥
मो भागन सुत है अकि नाहीं । ऐसे पूछूं जाय गुसाईं ॥
चल्यो चल्यो ब्रह्मापै आयो। हाथ जोर के शीश नवायो ॥
ब्रह्मा बहुतक आदर कीनो। बैठन कारन आयसु दीनो ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६५
कहो ऋषीश्वर कैसें आये । कौन अर्थ कारज क्यौं लाये ॥
इन्द्रीजीत अरु तुम निरवासी । कैसे आये हमरे पासी ॥
कहै उद्दालक सुनहो नाथा । पूछूँ बात नवाऊं माथा ॥
यह परसँग पूछन कौं आयो । मेरे संतति लिखी बतावो ॥४२॥
ब्रह्मोवाच ॥
दोहा ॥
तब ब्रह्मा भाषत भये, सुनहो यही बिचार ।
तेरे पुत्तर होयगा, वंश बढ़ावन हार ॥ ४३ ॥
बचन हमारा सांच हो, हिरदै राख निहार ।
पहिले पुत्तर आय है, ताके पीछे नार ॥ ४४ ॥
सोई सुता रघुवंश की, पतिबर्ता धर्म रूप ।
गोत बढ़ावन हारही, सुन्दर अधिक अनूप ॥ ४५ ॥
हे ब्राह्मण अब जाइए, अपने आश्रम माहिं ।
परजापति करतार मैं, तू चिंता कर नाहिं ॥ ४६ ॥
उद्दालकउवाच ॥
चौपाई ॥
रिषीने कही जोर कर दोई । नारी बिना पुत्तर कस होई ॥
ऐसी कहीं भई विपरीता । पाछे नारी पहिले पूता ॥
मिथ्या वचन करी तुम हांसी । मैं सकुचा मन भया उदासी ॥
उद्दालक के वचन सुने जब । विधि ह्वां अन्तर ध्यान भये तब ॥
गया देख ब्रह्मा को हाईं । रिषी आया अस्थलके माहीं ॥
अपने मनमें ऐसे ताकी । ब्रह्मा हम सूं झूठी भाषी ॥
कौन भांति बनिहै यह बाता । पहिले पुत्तर पाछे बनिता ॥
सोच सोच भया अधिक उदासा। उद्दालक कहैं चरणहीदासा ॥४७॥
इति श्रीनासकेतउपाख्याने श्रीरणजीतगुसांईजीकृत
उद्दालकचिंतावर्णनोनाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
५६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन यों कही, हे राजा बड़भाग ।
जानत हो सब शास्त्र, भक्ति बिषै अनुराग ॥ १ ॥
वह ब्राह्मण अभिलाष सुत, फिर लागा तपध्यान ।
परम पुरुष का धांवना, हिरदै माहीं थान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
नारी की मन आशा रहै । काहू से मन की नहीं कहै ॥
रात दिना चिन्ता मन माहीं । छिन इक तिरिया भूलत नाहीं ॥
सब तन काम जगै दुखदाई । जैसे सूता सिंह जगाई ॥
उसी वासना बीज खिसाहा । होनहार की यही दिसाही ॥
वह बीरज कर माहीं लीन्हा । कंवल फूल माहिं धर दीन्हा ॥
मुंद गया कुशामांहि लिपटाया । फिर वह गंगा बीच बहाया ॥
ब्रह्मा जू की आज्ञा दया । तैरा कंवल जू बहता भया ॥
आगे सुनों कहैं रणजीता । जैसे कारज भया पुनीता ॥३॥
दोहा ॥
नग्गर एक सुहावना, गंगा निकट सुथान ।
राजा रघु हां का धनी, तेजवंत ज्यों भान ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
सतजुग बीत जु त्रेता लागा । तब राजारघु भया सुभागा ॥
कुल में पूरा धर्म उजागर । दयावंत अरु किरपा सागर ॥
जाकी परजा सब सुख पावै । नितही समां काल नहिं आवै ॥
धनवन्ते सुन्दर नर लोई । बड़ी उमर के रोग न कोई ॥
राजा जितका रघु सतवादी । निहकंटक निरभय जिंहगादी ॥
सूर बीर दाता सुखदाई । जाकी जग में बहुत बड़ाई ॥