भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 596, कुल 690 में से
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(ग़ज़ल)
मुझे श्याम से मिलने की आरज़ू है।
शबोरोज़ दिल में यही जुस्तजू है॥
नहीं भाती हैं मुझको बातें किसी की।
सुनी जब से उस यार की गुफ़्तगू है॥
नहीं मुझको मतलब जहाँ में किसी से।
चुभा जबसे दिलमें सनम् खूबरू है॥
जो आशिक़ है उसका नहीं उस्से ग़ाफ़िल।
तड़पता अज़ल से खड़ा रूबरू है॥
शराबे मुहब्बत पिई जिसने यारो।
हुवा दोनो जग में वही सुर्ख़रू है॥
सभी आशिक़ों पे किया कर्म तूने।
मुझ आसी पे तेरा नहीं दिल रुजू है॥
जहाँ देखे रनजीत हाज़िर वहीं है।
हर इक गुल में उसकी मिली मुश्कबू है॥
(शब्द-उरदू)
मुरशद मेरादिल दरियाई दिलके अन्दर खोजा।
तिसके अंदर सत्तर काबा मका तीसों रोज़ा ॥ १ ॥
चौदह तबक़ औलिया जिसमें भेद न होर्य जुदाई।
सहस्र कमाल नमाज़ में ठाढ़े दर्शन जहाँ खुदाई ॥ २॥
हवा न हिर्स खुदी नहिं खूबी अनलहक़ जहांबानी।
बिन चिराग़ खाने सब रौशन जिसमें तरूत सुभानी ॥ ३॥
बिना शजर जहाँ बहु गुलफूले बिना अबर जहां बरसै।
बिन सरोद तंबूर बजत हैं चश्मे हो मन दरसै ॥
जिस दरगाह मसल्ला डारें बैठे क़ादर क़ाज़ी।