भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
न्याय करें सीनें की पूछें रक्खें सबको राजी ॥
तिसके फल दीदार किये से नादिर होइ फ़क़ीर ।
मारे काल कलंदर अंदर दिलमें धारे धीर ॥
ऐसा हो जब कमला होई तब कमाल पद पावे ।
साहब मिल साहब को दरसे ज्यों जल बूँद समावे ॥
ऐसा हो सोइ पीर कहावे मनी मान सब खोवे ।
चरनदास ज़मीपर रोशन पाव पसारे सोवे ॥
(कवित्त)
जीवत मरजाय उलट आप में समाय मन कहीं नहीं जाय
यह ऐसी दिलगीरी है। करे बिपिन बास जिन जानत जी
भूख प्यास मेटी पर आस और परम सबूरी है ॥ परमतत्त्व
को बिचार चिंता सबडार हरि रसमें मतवार यह ऐसी
अमीरी है। कहे चरणदास दोनों दीनमें पुकार यार सबही
आसान एक मुशकिल फ़क़ीरी है ॥
श्रीशुकदेव अष्टक ॥
(छन्द)
षोडशवर्ष किशोरमूरति श्यामवरण दिगम्बरं ।
घूघरवारे केस झलकें शुकमुनि चरण प्रणाम्यहं ॥ १ ॥
पद्मआसन उदर त्रिबली चरण पंकज शोभितं ।
आजानुभुजमुसकात मुखसों शुकमुनि चरण प्रणाम्यहं ॥ २ ॥
गूढयंत्रु विशाल उर छबि नाभि गंभीर बिराजतं ।
जलज लोचन सुखद नासा शुकमुनिचरण प्रणाम्यहं ॥ ३ ॥
श्री व्यासनंदन जगद्वन्दन मोह ममत्व निकंदनं ।
कामक्रोध मदलोभ न जिनमें शुकमुनि चरण प्रणाम्यहं ॥ ४ ॥