सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 599, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 599

५५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ओम् ॥
श्रीशुकदेव जी सहाय ॥
अथ श्री महाराज साहिब श्री स्वामिचरणदास
जी कृत नासकेत लीला प्रारम्भते ॥
दोहा ॥
जै जै श्रीमुनि व्यासजी, जै जै गुरु शुकदेव ।
तुम किरपा सूं कहत हूं, नासकेत को भेव ॥ १ ॥
आय बैठ हिरदै बिषै, मो मुख कहो बखान ।
तुमतो जानत हो सबे, मैं हूं मूढ़ अजान ॥ २ ॥
चरणदास हो कहत हूं, भाषा परम पुनीत ।
सुन सुन आवै नीत पर, छूटै सकल अनोत ॥ ३ ॥
नर नारी सुन लीजिए, अद्भुत कथा सुजान ।
पाप पुण्य की ओर सूं, जो कोइ होय अजान ॥ ४ ॥
त्रेतायुग की यह कथा, संस्कृत के माहिं ।
नासकेत ही नांव है, मैं भाषूं ले छाहिं ॥ ५ ॥
नीमपारहो के बिषे, कथा कही जो सूत ।
सौनक आदि रिषी सबै, सुन