भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हिरदा शुद्ध ब्रह्म बुध जाकी । तेजवंत सुंदर छबि ताकी ॥
जाका आश्रम सुन्दर नीका । ऋषि मुनि करकर शोभतटीका ॥
भांति अनेक वृक्ष जहा सोहैं । फूलन भरे अधिक मनमोहें ॥
हरि हरी बेल रही लिपटाई । बोलत भँवर महा सुखदाई ॥
हंस आदि पक्षी बहु सोहत । मोर चकोर कोकिला मोहत १५
दोहा ॥
अरु पक्षी ह्यां बसत हैं, शुभ शुभ भांति अनेक ।
शोभा सब बरनूं कहा, अधिक एक तें एक ॥१६॥
चौपाई ॥
उड़ि बैठे पक्षी जहां तरवर । कँवल भरे सोहैं तहां सरवर ॥
आश्रम सुखदाई बरनां सो । उद्दालक उस ठौर रहें सो ॥
तेजवंत सूरज ज्यों राजैं । जिनके दरशन पातक भाजैं ॥
तपकी शोभा दस दिस छाई । देवलोक में भई बड़ाई ॥
अठासी बरस सहस तप कीनों । लोक वेद में नां चितदीनों ॥
एक पांव सूं ठाड़े रहै। जाड़ा गर्मी पावस सहैं ॥
अधिक तपस्या गाढ़ी कीन्हीं । जाकूं सुरपति सुन अरुचीन्हीं ॥
ईन्द्र भूप डरा मन माहीं । तन में धीरज रहा जु नाहीं १७
दोहा ॥
सकल विकल बहुतै भई, धीरज रहा जु नाहिं ।
कांप कांप बेगी गया, ब्रह्मलोक के माहिं ॥१८॥
चौपाई ॥
जां ब्रह्मा का दरशन लीना । साष्टाङ्ग परनाम जु कीना ॥
फिर बिरंचि आदर बहु कीया । अरघ और आसन जोदीया ॥
भय करि दुखी इंद्र हो रहा । ब्रह्मा आगे अस्थिर भया ॥
नैन उदास दीन मुख कीयें । बिरंच और को तनमनदीयें ॥