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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 690 में से

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पृष्ठ 589

तब देवी इंह भांत श्याम सों यौं कही ।
तोहि कछू इंह ठांव में सुध बुध है रही ॥
बहु असुरन के माहि बसे द्वारींपुरी ।
कहिबेतें यह बात तोहि लागै बुरी ॥
चलो जाव घर और बेग सुध लीजिये ।
नातौ ऐसें राज काज सब छीजिये ॥
यह सुनकै घनश्याम नंद कों बोल कै ।
बोले छबि अभिराम हिये कों खोल कै ॥
कही धन्य ए द्योस जु तुम दरशन लहैं ।
तुमतें न्यारे होन नहीं कबहुँ चहैं ॥
तुम तें बिनती करत कंपत सब गात है।
हम सें ऐसी कहत न आवत बात है॥ ५६॥
रक्षक नाहीं कोय द्वारिका में उहां ।
जो तुम आज्ञा होय तो अब जावें तहां ॥
इक परदेश में वास रिपुन के बीचही ।
नातो तुम्हरो पास नहीं छोड़ें कभी ॥
यह कारन मनलायके आज्ञा दीजिये ।
आपन हूं ब्रज जाय गोधन सुध लीजिये ॥
देख नंद और मात जसोधा ओरहीं ।
रोवें नार नवाय कै नंद किशोरही ॥
तक मुख रोवन लागे जसोधा नंदहू ।
परो ग्रीवके बीच प्रीत को फंदहू ॥
कहैं कन्हैयालाल हमें तू राख लै ।
लोटन लगे तिंह काल बचन यह भाखकै ॥
नंद कहैं घनश्याम हमें संग लेहु जू ।