भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिह माया करतार सकल जग बस कियो ।
सो माया नहीं फेर सकत राधा हियो ॥
माया अतिबलवंत न कोऊ सम करैं ।
प्रेम राधिका अग्र धीर नाहीं धरैं ॥
चींटी निरबल आंधक कहा बलधारई ।
जब हस्ती पग माहिं पकर कै डारई ॥
ब्रजबासी सब लोग बाट ब्रजकी लई ।
ग्रह कारज के माहिं सबन की मत छई ॥
राधा रुकमिन गेह रही ठहराय कै ।
चलबे की चित नाहिं रही मन लायकै ॥ ५६ ॥
तब हरिजू रनवास सबै जु बुलाइया ।
विनती कर मृदुबैन सभुन समझाइया ॥
राधा आंते परबीन चतुर चित जानई ।
हठ दृढ़ गहकै और बात नहीं मानई ॥
कहै सुनैं को बात सो कासों भाषई ।
केहूं कैसी भांति मरन अभिलाषई ॥
विष भष अपने पेट कटारी ही करूं ।
ना तो अबही बूड़ सरोवर में मरूं ॥
मृत अकाल बिचार नेक धीरज गहै ।
केहूं बिध जदुनाथ-को नित दरशन लहै ॥
कूदपरी जल माहिं सरोवर के तहीं ।
महा तपत उर माहिं भई सीतल नहीं ॥
कंठ कुंवर परमान भयो जल सब तहां ।
अति गंभीर अधीर नीर जो हो उहां ॥
तब सतभामा बोल उठी इह भांत सों ।