भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५५१
मनकी घुंडी खोल जीव की बात सों ॥ ६० ॥
चाहत लीन्हों कंथ परायो चोरकँ ।
चितवत बारही बार नैन की कोरकैं ॥
जब लग हैं घनश्याम बाल गोपाल ही ।
तबलग देखे चरित तिहारे ख्याल ही ॥
क्यों नहीं ब्रज कों जाव रहो घर बैठ कै ।
बाद परायो गेह चहत हो पैठ कै ॥
अब तो यह जदुनाथ जगत नायक भये ।
ग्वाल गंवार तुम्हार बात लाइक रहे ॥
तजैं नहा कुललाज बंध की हीय सों ।
जे कुल नार बिचार करें यह जीय सों ॥
मात पिता जिंह गेह जाह के संग दियो ।
उन दुख सुख में साथ सदा ताको कियो ॥
मरत जियत नहीं छाड़ पुरुष के सग रहें ।
ये लक्षन कुल बधू पुरानन में कहें ॥
तब श्रीराधा बोल उठी इह भांत सों ।
सतभामा चितलाय सुनो इह बात कों ॥ ६१ ॥
वेद पुरानन माहिं जु ऐसें गाइया ।
जिन पायो जग माहिं प्रेम तें पाइया ॥
जे प्रेमी जन होहिं सकल सिरमौर हैं ।
तिन पाछैं -हरि फिरत जैसें चकडोर हैं ॥
अब तुम सुनहु बनाय प्रेम की रीत कों ।
दिब्य दृष्टि कर देखो हिये में प्रीत सों ॥
जिन हरिजू के साथ जु नातो मानिया ।
मन्दभाग जग माहि कछू नहीं जानिया ॥
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