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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 593, कुल 690 में से

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पृष्ठ 593

५५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नाते पै मतभूल न धोखे में परो ।
बर्न कुलीन बिचार गर्ब मत चितधरो ॥
मात पिता जो नेम बतायो चावसों ।
सब जग लीन्हों नेम प्रीत के भावसों ॥
अब तो हम संसार जो प्रेम बखानईं ।
प्रेम नेम को भेद कछू नहीं जानई ॥
जिह बन में सिंहराज विराजत प्रेम है ।
तिह बन तैं गजराज ज्यों भाजत नेम है ॥ ६२ ॥
तू अजान नहिं जानें न नेक हूं मानई ।
हरि जानें यह रीत कि रुकभिन जानई ।
यह त्वै जग के माहिं प्रगट कीरत भई ॥
तेरे पिता हरि बाद दोष चोरी दई ॥
मणि की चोरी काज जु हरि कितहूं गये ।
मणि पाई उहं ठांव खिस्याने सब भये ॥
तैं तो हरि के काज कहा कारज कियो ।
जग उपहास पै हास सीस ऊपर लियो ॥
कर झझारी अग्नि दई भांवर जहां ।
ऐसी बिध सों ब्याह भयो तुम्हरो तहां ॥
ऐसी बिधको ब्याह नहीं कोऊ करै ।
ऐसे ब्याह को गर्ब कहा मन में धरै ॥
जग में ऐसो ब्याह जहां तहां पाइये ।
पे यह प्रेम को ब्याह कठिन मन लाइये ॥
मो सम नहीं तेरो प्रेम चढ़ावत भौंह क्यों ।
हरिसों बूझ यह बात देह हरि सोंह हों ॥ ६३ ॥
सुनकर बोले बात तभी ब्रजनाथ जू ।