भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४६
जसुमत कों गृह काज जान किन देहु जू ॥
जसुमत कहैं नंदराय सों तुम गृह कों चलो ।
साजो घर और बार करो कारज भलो ॥ ५७ ॥
लोक बंध की लाज सभी तज डार हूं ।
निशिदिन या ब्रजराज कों नैन निहारहूं ॥
दूर करो मत मोहिं देवकी माइ जू ।
हौं तुम्हरे ब्रजराज कुंवर की धाई जू ॥
धाइन को बहु भांत सूं आदर कीजिये ।
असन बसन धन धाम भली बिध दीजिये ॥
गोधन और धन सकल हमारो लेहु जू ।
नित प्रत मोहनलाल कों देखन देहु जू ॥
पाँच सात मिल बात जु ऐसी विध कहै ।
सबहुन जानें देहु सु हम ह्याहीं रहें ॥
सबं मिल ऐसी भांति मतो मनमें करै ।
तब उत भेंटैं कौन पाय काके परै ॥
भाषैं श्री वसुदेव जु हम केतो कहै ।
ये तो केहूं भांति कहे नाहीं लगै ॥
हम सबही बहु भांति जु कहि कहि हारई ।
प्रेम प्रीत भरभार टेक नहीं टारई ॥ ५८ ॥
तब अपनी घनश्याम माया विस्तारिया ।
जासों सब ब्रह्मण्ड में कौतुक धारिया ॥
सो माया ब्रज लोगन ऊपर डारिया ।
तब चलबे की सोंज सबन जु सँभारिया ॥
चलो चलो अब बेग सभी मुखतें कहैं ।
राम राम परनाम नहीं रसना लहैं ॥