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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 594, कुल 690 में से

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पृष्ठ 594

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५५३
राधा भाषत सांच सभी यह बात जू ॥
जबही सुने इंह भांत बचन जदराय कै ।
बिन रुकमिन सब और रहीं खिसयाइ कै ॥
बहुरों श्री घनश्याम बचन ऐसें कहो ।
राधा प्यारी बैन हमारे चित लहो ॥
जल भीतर तें निकस बाहरें आव हों ।
जो चाहत मन माहिं सु हमें बतलाव हों ॥ ६४ ॥
राधा कहत सुनाय बचन इक पावहूं ।
तबहीं जल तें निकस बाहरें आवहूं ॥
कहो तबै घनश्याम जु कछु मांगो अबै ।
सो सब तुमकों दैहुं जु तुम इच्छा सबै ॥
बबा नन्द की सहस दुहाई जानियो ।
तुम्हरे चरन की सौंह हिये में आनियो ॥
बोली राधा तबै बृन्दावन जांव जू ।
कै नित रहो तहां संग कै नीर समाव जू ॥ ६५ ॥
यों ही करूंगो प्यारी कहो जग साइयां ।
श्री राधा मन भयो अनंद बधाइयां ॥
पर्मानन्द सुख पाय धरी मन धीरही ।
आई बाहर निकस सरोवर नीरही ॥
रुक्मिन नौतन चीर अनूप मंगाइया ।
राधा जू के अंग सकल पहराइया ॥
राधा जी को प्रेम कि बिसवै बीस है ।
चरणहिदासा वार कि तन मन सीस है ॥ ६६ ॥
गुप्त भईं राधा कुंवर बृन्दावन आइया ।
श्रीब्रजदूलह कुंवर संगही ल्याइया ॥