भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 595, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तहां आय बहु भांत सुभोगे भोगही ।
नित बिहार जहां होत जानत सब लोगही ॥
वेई वृक्ष वेई कदम जमुन के कूलही ।
वेई कमल सरोज कमोदनि फूलही ॥
वेई जमुनां नीर सुपर्म रसालहीं
जहां क्रीड़त आनँद सों मोहन लालहीं ॥ ६७ ॥
दूजो कृष्ण सरूप और परगट भयो ।
सो रानी पटरानी देवकी संग गयो ॥
यह लीला सुखरास सुनै जो गावई ।
पूजै मनकी आस परम सुख पावई ॥
लीला परम पुनीत भक्त की रीत सों ।
चरणदास कहि भाष भली विधप्रीत सों ॥
जो बांचै चित्तलाय कोइ सरवन करै ।
भक्ति परापत होय हिये आनंद भरै ॥
प्रेम भक्ति के भाय यह लीला गाइया ।
चरन कमल चितलाय परम सुख पाइया ॥
अरज करै चरनदास सुनौ शुकदेव जू ।
जनम जनम द्यो भक्ति करूं गुरू सेवजू ॥ ६८ ॥
इति श्री कुरुक्षेत्र लीला अष्टपदी छन्द श्री महाराज साहिब
श्यामचरणदास जी कृत संपूर्णम् ॥
श्रीराधाकृष्णार्पणमस्तु ॥