भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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नासकेतलीलावर्णन । ५६१
ब्रह्मोवाच ॥
हे इन्दर तू कैसे आया। दुखी दीन मुख क्यों जु बनाया ॥
भय उपजा कासों तोहि भारी । आसन क्यों कांपा बलकारी ॥
इन्द्रउवाच ॥
इन्दर कहै सुनों विधि करता । तुमही या जग के हो भरता ॥
वही कहूं जासूं भय खाया । तुम्हरे चरन निकट ज्यों आया ॥१९॥
दोहा ॥
मुनि उदालक पुतरतो, तिरलोकी विख्यात ।
तप जु करै भू लोक में, एक पांव दिन रात ॥२०॥
तप करतें बहुचिर भया, तातें हिया डरात ।
आसन कांपत है घनों, धीरज नाहिं धरात ॥ २१ ॥
यातें कहो उपावही, कित जाऊं मैं भाज ।
अमरावती नगरी सहित, सोंपा ह्यां का राज ॥ २२ ॥
अरु सोंपूं तिरलोक हू, कहां रहूं मैं जाय ।
कहा करूं रिषि तेज सूं, भय व्यापो अधिकाय ॥ २३ ॥
सूतउवाच ॥
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