भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
ब्रह्मा ही के बचन सुनि, खुसी होय सुख पाय ।
गया जु इन्दर लोक में, आनन्द अधिक बढ़ाय ॥२८॥
चौपाई ॥
अब सुन ब्रह्मा जू की दाया । पिप्पलादिको निकट बुलाया ॥
सभी भांत कर वह समझाया । उद्दालक के पास पठाया ॥
तप निरबर्त करन के काजे । पिप्पलादि मुनि आय बिराजे ॥
उद्दालक उठि आदर कीना । बड़े भाव सूं आसन दीना ॥
चरन धोय कर पूजा कीन्ही । नमस्कार कियो कर आधीनी ॥
और कही तुम ह्यां पग धारे । कौन हेत कहिये मुनि प्यारे ॥
पिप्पलादकउवाच ॥
पिप्पलाद कही सुन रिषिराये । सहजें हम दरशन कूं आए ॥
बड़ी तपस्या का धन तेरे । पै संदेह उठा इक मेरे ॥ २६ ॥
दोहा ॥
नारी सुधारी रिषि सबै, तप करें अधिक अत्यन्त ।
तप धनही के जोर सूं, रहें जु सदा अचिन्त ॥३०॥
चौपाई ॥
सबके आश्रम में सुतनारी । सुन्दर भवन महा सुख भारी ॥
तुम्हरे तिरिया ना संताना । यह हम अचरज बहुतक माना ॥
पुत्र बिना कुल बंस न चालै । सोत बिना सूखै ज्यों तालै ॥
बंश नष्ट सूं आगै नाहीं । पित्र देवता रीते जांहीं ॥
होहिं न परसन नीकै जानौ । तातें उपजावन सुत ठानौ ॥
जीवत मरतैं काज संवारै । भला पुत्र हो दो कुल तारै ॥
दीपक सूं दीपक ज्यों लागे । ऐसे वंश चलै यौं आगे ॥
जो कोई पुत्र बिनाहै हीना । वाका जगत सुन्न अरु छीना ॥
दोहा ॥
वाकूं घरसूं काम क्या, खोवन वंश अऊत ।