भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५५६
सोरठा ॥
ब्राह्मण ऋषों समेत, बैशंपायन पासही ।
गया जु करि बहु हेत, कछु पूछन की आसधरि ॥१०॥
पांडव वंश मझार, उपजा हुवा जु भूप यह ।
बोला वचन सँभार, बैशंपायन साथही ॥११॥
जनमेजय उवाच ॥
चौपाई ॥
करि डंडौत बचन यों भाषा । अरुचरनन परि मस्तक राखा ॥
सीस उठा मुख तका सुभागे । फिर यों अस्तुति करने लागे ॥
हे बुधवान बड़े तुम चतुर । भक्ति तपस्या में अति आतुर ॥
सर्व शास्त्र तुम नीके जानों । धरम दया नीके पहिचानों ॥
व्यासदेव के शिष बहु प्यारे । जोगी महा जगत सूं न्यारे ॥
दिव्य कथा पूछत हूं तोही । पाप संपूरन काटन सोई ॥
किरपा करि संदेह मिटावो । भिन्न भिन्न करि सभी सुनावो ॥
जनमेजय यों पूछन कीना । रणजीत कहैं ऋषि उत्तरदीना १२
वैशंपायन उवाच ॥
दोहा ॥
सुन राजा अद्भुत कथा, कहूं तुम्हारे हेत ।
इस में संशय है नहीं, सर्व पाप हरि लेत ॥१३॥
राजा कथा पुरान की, शुभ है सुनने जोग ।
और ऋषीश्वर भी सुनों, तन मन नासैं रोग ॥१४॥
चौपाई ॥
एक ऋषि जो पहिले भया । धर्मनीक उज्ज्वल मन छया ॥
उद्दालक जिंह नाम बखानों । तपसी ब्रह्मा का सुत जानों ॥
वेद अर्थ का जाननवारा । इंद्रीजित जोगेश्वर भारा ॥