भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
- कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५२६
अपने पतिसों प्रीति सदा बिस्तारई ॥२५॥
तब राधा यह बात सभी मन में लही ।
अपनी प्रीत अधिकार सकुच नहीं कही ॥
यह सुनके-जदुनाथ जु ऐसे बोलिया ।
सबके नीकी भांत जु हिय दृग खोलिया ॥
एकै टौना जान सकल जग माहि है ।
इह सम टौना और दूसरो नांहिं है ॥
ब्रज भूमि सें एक यहै टौना आइया ।
सो मैं मूरतवंत तुम्हें दिखराइया ॥
मनबच करकै मोहिं जु चाहै बस करै ।
श्रीवृषभानुकुमारि की सेवा चित धरै ॥
रुकमिन के मनमाहिं जु सुनके आइया ।
यह टौना बड़भाग सों हमने पाइया ॥
रुकमिन तन मन-आप कुवर राधै दियो ।
राधाको मन मुदित प्रीत सों कर लियो ॥
तबहीं भूषण सरस जु रुकमिन के हुते ।
पहिरे राधा कुँवर जु मनमाने तबै ॥ २६ ॥
रुकमिन अपने हाथ भूषण पहिराया ।
इह बिध टौना डार कै प्रीत बधाइया ॥
और सखी जे साथ सिंगार सिंगारिया ।
सतभामा मन माहिं जु कुढ़ कुढ़ हारिया ॥
अष्टि सुगन्धि मँगाय आपने हाथ सों ।
ले रुकमिन सब लाये राधिका गात सों ॥
अतिही शुद्ध संवार जबै भोजन भये ।
नंद यसोधा पास तबै मोहन गये ॥
५३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रुकमिन नाना भांति करे बिञ्जन सबै ।
अनगिन स्वाद न जाहिं गिनाए तासमैं ॥
भोजन को जब बैठे हेम के थारही ।
एक और जदुकुलिन एक ब्रज नारही ॥
कपट बचन बहुभांति जु सतभामा कहै ।
मुख मीठी मनचोख अधिक हिये में लहै ॥
कही करो जिन और परोसो लायके ।
दूध दही बहु भाँति मही जु मँगायके ॥ २७ ॥
खोटी जियमें जानि कुढ़ी रानी सबै ।
श्रीराधा सुन बैन जु मुसुकानी तबै ॥
भोजन सुखद कराय कुँवर सुखरास को ।
पौढ़ाई ले सेज सु अधिक विलास सों ॥
अपने अपने गेह सबै रानी गईं ।
रुकमिन राधा साथ करत बातें रहीं ॥
निस भई एसी भांत हिलत और मिलतही ।
सिज्या जोगा जोग बिछाई ललितही ॥
तब हरि अपने आई मन्दर पग धारिया ।
सबको सुख अधिकाइके दुख निरवारिया ॥
रुकमिन राधा कुँवर कूं सेज सुवाइ ही ।
आई हरी के पास पलोटन पाइ ही ॥
पाय पलोटत नींद श्याम को ना परी ।
सुन्दर राधा सेज पै तरफत है परी ॥
रुर्कमिन से कहो श्याम काज इक कीजिये ।
राधा आवत नाहिं नीन्द सुन लीजिये ॥ २८ ॥
हौं तो वाको भेव जीय को ज़ानहूं ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३१
बारेपन की टेव सभी पहिचान हूं ॥
जब सोवन की बेर वाह की आवई ।
बहु मेवन के ढेर सुमाय करावई ॥
पै राधा कों नींद नहीं कबहूं परै ।
जब लगही वह पान दूधको ना करै ॥
तातें वाको नींद न कबहूं आवई ।
मो बिन यह सुध और सु को हिय लावई ॥
पाय पलोटत माहिं तबै उठ धाइया ।
रुकमिन राधा सेज पै तरफत पाइया ॥
डार कटोरे माहिं जु दूध पिवाइया ।
हलबल में भली भांत न दूध सिराइया ॥
तातो दूध पिवाय कै आई रुकमिनी ।
दाबन लागी पाय श्याम के दुलहनी ॥
दावन चरन सरोज जभी कर में गह्यो ।
सीतकार कर पाय खैंच हरि जू लियो ॥२६॥
रुकमिन कह्यो तिहकाल कहा हमने कियो ।
सीजुखरी किहकाज खैंच क्यों पग लियो ॥
तातो हो वह दूध पिये तें पग जरे ।
हमरे पायन माहिं अबे छाले परे ॥
राधे पीवे दूध तुम्हारो पग जरो ।
हमसों ऐसी बात अटपटी जिन करो ॥
राधा हमरे ध्यान सदा अभिलाखई ।
निशदिन चरन सरोज हिये में राखई ॥
तातो पीवत दूध पगन ऊपर परो ।
रुकमिन तातें चरन हमारो ह्यां जरो ॥
५३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रुकमिन मानी बात जु मनमोहन कही ।
ब्रजबासिन के प्रेम मगन मन ह्वै गई ॥
बहुरि कही हम नाहिं तुम्हें हरि भावई ।
मम हिरदै में चरन कमल नहिं आवई ॥
बोले हरि मम चरन नहीं तुम हीय में ।
निशदिन तो पग बसत हमारे जीयमें ॥ ३० ॥
बोली रुकमिन कुँवर सुनो घनश्याम जू ।
सब सुखदायक नाथ संपूरन काम जू ॥
मन्दर मन्दर भोग सदा भोगत रहो ।
व्याप न सकत बियोग सकल बिध सुख लहो ॥
रुकमिन कों कियो राजी खुसी बहु प्रीति सों ।
राधा की अब सुनों प्रेम की रीति कों ॥
सेज पै राधा कुँवर विरह की बावरी ।
कहत सखिन सों बोल लावरी लावरी ॥
मनमोहन घनश्याम कहां अबतक रहो ।
जो इक छिनहूं होत नहीं न्यारो भयो ॥
ऐसे कह उठ बैठ रही मुरझायकै ।
फिर गिररही इहि भांति तरफ दुख पाय कै ॥
बहुत भांति कही बात सखी समुझावई ।
मन में धारो धीर आवें तो - आवई ॥
इतनेही में आय श्याम पग धारिया ।
पायन खुरको सुनत विरह निरवारिया ॥३१॥
हिलत मिलत भुज मेल ग्रीव में प्रीत सों ।
बृन्दावन के केल करत वाही रीत सों ॥
लागे करन विलास कुँवर संग चावसों ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३३
भूले सब रनिवास प्रेम के भाव सों ॥
प्रेम कथा दोऊ और की अस्तुति गावई ।
चरनदास बल जाय प्रेम कछु पावई ॥
भोरभये वह ठांव जु कुन्ती आइया ।
अपने सगरे पुत्र संगही लाइया ॥
तिह सों पूछत श्याम बहुत कुसरात है ।
पायन धारो सीस जु मिलबे की भांत है ॥
कुन्ती भाषत बैन सुनों भगवान जू ।
तुम सम याजग माहिं को चतुर सुजान जू ॥
इतने द्यौसन माहिं कभू नहीं सुध करी ।
दुरजोधन के बैर बिपत बहु हम भरी ॥
हौं यह अपने जीव विचारत ही रहूं ।
तुम भ्रातन को नाथ नहीं भूलत कभूं ॥ ३२ ॥
बोले तब बलराम मात तुम सत कही ।
दुख में होय सहाय हितू बंधू वही ॥
तोपै हमहूं चैन कभू नाहीं रहो ।
जरासन्ध के त्रास समंदबासा लहो ॥
बहुरो भीषम और विदुर ज्ञानी महा ।
बहुते और नरेश सबन दरशन लहा ॥
मिले परस्पर आय सबै घनश्याम सों ।
अस्तुति लागे करन श्याम अभिराम कों ॥
कहत धन्य जगमाहिं यह जादोंबंश है ।
इन सम और न कोय जु हरि को अंश है ॥
जनमें जिनके माहिं कृष्ण गोपाल हैं ।
दरस परस सुख देत सबन प्रतिपाल हैं ॥
५३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
फिर बोली ब्रजबाल श्याम सेती कहैं ।
आई दरशन काज न्हान सों ना हमें ॥
तुमको लख जदुराज सकल विध दुखगये ।
चार पदारथ आज हमैं प्रापत -भये ॥३३॥
पहिले ऊधो आय जोग समुझाइया ।
तब हमरे मन मांहिं कछू नहीं आइया ॥
अब मोहन मुख देख हिये निश्चै भयो ॥
ऋषिमुनि जोगीश्वरन यह सुखनाहीं लहो ॥
यह सुन बोले श्याम सुनों ब्रजनागरी ।
तुम हो परम सुजान सकल गुन आगरी ॥
जे सुख तुम्हरे साथ जो हमने पाइया ।
गृह वन बहुती भांतसों खेल मचाइया ॥
अब इह संपत माहिं प्रगट जो देखिये ।
सुपने हूं के माहिं न वहसुख पेखिये ॥
सर्व आत्मा रूप हमैं चित में धरो ।
सब जीवन को जीव हिये निश्चै करो ॥
तुम तो सुमरो मोहिं सदा चितलाय कै ।
हम रहिहैं तुम पास प्रीत के भाय कै ॥
आतमही सें रूप आत्मा देखिये ।
यह अध्यातम ज्ञान हिये अवरेखिये ॥ ३४ ॥
समझायो इह भांत सकल ब्रजबालको ।
सुफल जनम जग माहि भजें गोपाल को ॥
कूप रूप संसार सों बाहर ऊबरै ।
श्रीनन्दलाल कृपाल प्रीत डोरी गहै ॥
कहैं गुरु शुकदेव परिक्षत राजसों ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३५
श्याम हुते उंही ठांव जु सुख के साज सों ॥
पांडौ पुत्र पवित्र और कौरौं जहां ।
आये दरशन पाय मुदित बैठे तहां ॥
जिनके सुमरन ध्यान सकल दुख भागई ।
आध व्याध कछु पीडन कबहूं लागई ॥
तिन को दरस सुखपरस जु कोऊ जन लहै ।
तिहकी महिमा अधिक रसन कैसे कहै ॥
जितने राजा भूप हुते वह ठाँव ही ।
अस्तुति लागे करन बहुत मन भावई ॥
पर्म हंस है नाम सकल संसार में ।
तुमतें चारों बेद प्रगट जु संचार में ॥३५॥
रक्षा करन धैन विप्र के तुम इहां ।
लीनों है औतार जगत के सांइयां ॥
आदि अन्त और मध्य संपूरन काम हो ।
तुमहीं को हम करत सदा परनाम हो ॥
इहविध अस्तुति करत हुते राजा सभी ।
पातक तज पग परस महा पदवी लही ॥
द्रौपदी रानी बहुर तहां जो आइया ।
जाकी महिमा अधिक सकल जग गाइया ॥
पटरानिन के बीच बैठी इक साथही ।
तिनसों लागी कहन बात इह भांतही ॥
हरि जू जैसी भांत ले आये ब्याह कै ।
सो सब हमरे पास कहो समझायकै ॥
रानी रुकपिन चतुर प्रथम बोली तबै ।
सुनहो द्रौपदीं जान बात हमरी अबै ॥
३६
५३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
धन्न हमारे भाग आजही लेखिये ॥
सहज ही तुम्हरो दरस नैन भर देखिये ॥३६॥
जो तुम हांसी करो नहीं इह बात सों ।
तो हम ब्याहकी बात कहें भली भाँत सों ॥
देस चंदेरो नगर सकल जग जानिये ।
तहां शिशुपाल नरेश सु प्रगट बखानिये ॥
भई सगाई मोहिं प्रथम ही वाह सों ।
साजी सगरी सोंज भली विध ब्याह कों ॥
आयो वह भूपाल साथ बहु भूपले ।
बांधो कंगन हाथ बहुत हुलसों हिये ॥
कुलकी सारी रीति करी बहु भांति ही ।
मम हिरदे में बसत श्याम दिन रातही ॥
अन्तरजामी लाल हिये की जानकै ।
कुन्दनपुर में आये दीनता मान कै ॥
रथ के ऊपर बैठ गरज कर धाइया ।
सब राजन के अग्रह में हरि लाइया ॥
हरि की सेवा मांहिं बहुत सुख मानियां ।
हम तो अपनो भाग धन्न कर जानियां ॥ ३७।
पुन सतभामा चतुर बात अपनी कही ।
मणि की सगरी कथा बखानी सब वही ।
- : बहुरो अपनो व्याह जामवन्ती कह्यो ।
जामवन्ती की कथा सबै जिह बिध भयो ॥
पुन कालिंदी कहत सभी निज काथको ।
रानी द्रौपदी सुनो हमारी बात को ॥
हरि चरनन की आशधरी निज हीय में ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३७
जलमें कीनों बास प्रीतधर जीय में ॥
इकदिन अर्जुन सहित श्याम पग धारिया ।
पान ग्रहन कर मोहि सकल दुख टारिया ॥
बहुरों बोली चतुर मित्र बिंदा तभी ।
रानी द्रौपदी बात सुनों हमरी सभी ॥
जबतें सुध भई मोहि तभी मन में करो ।
हरिचरणनको ध्यान और चित ना धरो ॥
मम भ्रातन गत मोहि लखी इह रीतसों ।
हरि को दीन्ही व्याह भली विध प्रीतसों ॥ ३८ ॥
हौं अपने जिय मांहि यही इच्छा लहूं ।
औरहूं जन मनमांहिं मैं हरि चरनन रहूं ॥
पुन सीता इह भांति बचन उचारिया ।
सात वृषभ की कथा सकल विस्तारिया ॥
भद्रा कहत सुनाय सुनों रानी द्रौपदी ।
मैं हूं कृष्ण की बात सुनी सरवन सभी ॥
मन में कीन्हों नेम और नाहीं भजूं ।
निशदिन हरि को सेव सदा जिय में सजूं ॥
जान पिता यह बात ब्याह हरिकों दई ।
इच्छा मनके मांहिं सकल पूरन भई ॥
सेवें हरिके चरन सुमन चित लायकै ।
सुभग भाग जिहनार सुफल है आइकै ॥
पुन बोली इहभांत लछमना गुन भरी ।
अपने व्याह की बात सकल बरनन करी ॥
तात हमारे काज स्वयंबर ही कियो ।
मैं हरिचरनन ध्यान हिये में गह लियो ॥ ३६ ॥
५३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आये तहां घनश्याम दीन पहिचान कै ।
पानग्रहन कियो मोहि आपनी जानकै ॥
हों दासी घनश्याम की वा दिन तें भई ।
आध व्याध तज सकल बिथा जी की गई ॥
अब तुम देहु असीस मोहिं भली भांतिसों ।
जनम जनम जगदीश सेवों दिन राति हों ॥
बोली राजकुमार बहुरि सुख पायकै ।
सोरह सहस सौ नार सुबचन सुनाय कै ॥
भौमासुर हो दइत हमें बहु दुख दियो ।
हम सबहुन को घेर आन इकठा कियो ॥
चित में गह हरिशरन यही मनसा धरी ।
चरनन को धर ध्यान बहुत बिनती करी ॥
तबहीं पहुंचे आय जगत के साइयां ।
भौमासुर को मार सभी जु छुटाइयां ॥
तबतें सेवा मांहिं नाथ हमकों लियो ।
सब दासिन की दासी हमें सब को कियो ॥ ४० ॥
जो पै कृपा अगाध श्याम हमपर करैं ।
हम रंचक अभिमान नहीं जिय में धरैं ॥
गर्ब करै जो नार कभू घनश्याम सों ।
दुखपावे बहुबार गोपिका बाम ज्यों ॥
प्रेम कथा अति गूढ़ की अस्तुति कहा करूं।
चरनहि दासा होय शीश चरनन धरूं ॥
ब्रजवासिन के भाग बड़े जिय जानिये ।
केहूं बरने न जाहि योंहीं सत मानिये ॥
गृह बन जिनके संगरहै दिन राति ही ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३६
कीन्हे बालचरित्र उहां बहु भांति ही ॥
ब्रजबासी नर नारि सकल बिध सुख दिये ।
सकल मनोरथ काम श्याम पूरन किये ॥
पुन सतभामा बोल तभी पूछन लगी ।
सुनहो द्रौपदी बात एक रस में पगी ॥
हम तो अपनी व्याह कथा सबही कही ।
अब तुम भाखो बात हमारे चित यही ॥ ४१ ॥
पांच जनन किह भांति तुम्हें जु बिवाहिया ।
अद्भुत लीला सुनन हिये में आइया ॥
त्तब बोली इह भांति द्रौपदी गुन भरी ।
हमरे तात बिचार प्रतिज्ञा यों करी ॥
फिरत मत्सको बेध जु कोई जन करै ।
द्रौपदी पावै सोई बचन यह ना टरै ॥
देश देश के नृप सबै तहां आइया ।
अपने पुत्र बिचित्र संगही लाइया ॥
धनुष बान निज हाथ तहां सबहुन लियो ।
फिरत मत्स को वेध किहूं नाहीं कियो ॥
अर्जुन अपने हाथ धनुष जबही लियो ।
ताही छिन के मांहि मत्स बेधन कियो ॥
याविध मोहि विवाहि मुदित मन लाइया ।
अपनी कुंती मायकूं शब्द सुनाइया ॥
मात एके बस्तु भली हमने लही ।
बांट लेहु तुम पांच मात ऐसे कही ॥
तातें पांचों भ्रात मोहिं ब्याहो तहां ।
प्रगट देह कर पांच जीव एकै जहां ॥ ४२ ॥
५४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
चरनदास बिसवास सों, कही कथा सुखरास ।
पढ़ै सुनै जो प्रीतसों, पावै परम हुलास ॥ ४३ ॥
अष्टपदी छन्द ॥
कहें गुरू शुकदेव परिक्षत राज सों ।
श्री बसुदेव के यज्ञ करन के काज कों ॥
रानी द्रौपदी पास हुतो रानी सबै ।
सुनी सकल की बात जु उन भाखी तबै ॥
गंधारी तिह संग सुभद्रा जानिये ।
कुंती तिनके बीच उहां मन आनिये ॥
सब गोपिन लिये संग जसोधा मायही ।
तिनहुं श्याम की बात सुनी मन लायही ॥
सुन अचरज की बात चक्रत मन में भई ।
हिय में बिसमै होय थकितसी है रही ॥
कहें धन्य ये नार सकल बड़ भाग हैं।
नितप्रत जिनके अंग श्याम संग लाग हैं ॥ ४४ ॥
और सकल ऋषराज सबै तहां आइया ।
मनमोहन घनश्याम को दरशन पाइया ॥
नारद वेदव्यास ऋषन के राजही ।
विश्वामित्र पुलस्त और भारद्वाजही ॥
गोतम और बशिष्ठ सतानन्द जानिये ।
पर्शराम अभिराम शिष्यन संग मानिये ॥
उत्रा अंगिरा और मारकंडे तहां ।
दत्तात्रेय बिचार सकल आये जहां ॥
बामदेव अरु जाग भाग भृगु आइया ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४१'
गर्ग आदि बहु नावगिनें नहीं जाइयां ॥
हरि जू तिनकों आप बहुत आदर कियो ।
विध सो पूजा साज परम सुख ही दियो ॥
दोऊ करकों जोड़ जगत के साइयां ।
लागे अस्तुति करन बहुत मन भाइयां ॥
दुर्लभ दर्शन होहिं ऋषिन के जगत में ।
देवन प्रापत नांह बड़ा सी शक्त में ॥४५॥
जनम सुफल अब आज हमारो ही भयो ।
जो हम सहजके मांहि दरस तुम्हरो लह्यो ॥
हरि भगतन के दरस की महिमा को कहैं ।
जनम जनम के पाप छिनक में ना रहैं ॥
जो जन सेवा देव बहुत हितकै करै ।
तिनमें श्रीभगवान नहीं मनमें धरै ॥
महा अधम है सोइ यही मन आनिये ।
मूरख ताहि समान नहीं पहिचानिये ॥
नारायन सब बीच हिये में धारिये ।
सूरज चंद की सेव जु कुछ बिस्तारिये ॥
पृथ्वी जल और पवन अगन आकाश कों ।
देखै इनके बीच सु जगत निवास कों ॥
जो जन ऐसी भांत सों पूजा नित करै ।
सुफल कामना होय जु कुछ इच्छा धरै ॥
याही विध हरि भक्त सकल पहिचानिये ।
हरितें इनको भिन्न कभू नहीं जानिये ॥४६॥
यह नर देही जान अपावन है महा ।
जाको परथम बास नरकही में भया ॥
५४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गंगाजल सम नाहिं सलिल सलितान कों ।
यह बिचार नहि होय मूरख अज्ञान कों ॥
राजन ऐसी भांत जगत के सांइयां ।
बहु अस्तुति उँहठांव करी मन भाइयां ॥
सकुचे सब ऋषराय सुनों जब बात कों ।
सब मिल ऐसी भांत कहें जदुनाथ कों ॥
तुम जग जीवन नाथ सुजमत निवासहो ।
हम दासन के दास तुम्हारी आस हो ॥
ऐसी विध जदुनाथ जु तुम अस्तुति करो ।
हमकों भर्म बहु होय समझ कछु ना परो ॥
जगत गुरू जगदीश जगत प्रतिपाल हो ।
सबके सरजनहार सकल रिछपाल हो ॥
सब देवन के देव तुम्हीं जदुराज जू ।
हम नहिं जानत भेव श्री महाराज जू ॥४७॥
तुम माया सब जगत सभी पर छाइया ।
तो गत अगम अपार अन्त नहिं पाइया ॥
तातै बहुती भांत भर्म मन आनई ।
तुम्हरो भेव अगाध कौन विध जानई ॥
तुम्हरो अद्भुत शक्त सकल घट पूर है।
तुम्हरो रूप अरूप सबन तैं दूर है ॥
कोऊ तुमकों आप पिता कर जानई ।
कोऊ अपनो पुत्र हिये में आनई ॥
सबके पालनहार सकल के ईश हो ।
कैसे चरित तुम्हार कहैं जगदीश हो ॥
दरस परस सुखदान तुम्हारो जानिये ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४३
तुम किरपा सों बात यही पहिचानिये ॥
धरती भार अपार उतारन काज ही ।
प्रगटे भक्तन हेत श्री जदुराज ही ॥
बानी तुम्हरी बेद स्मृति संसार में ।
तुम्हरी गत नहा चीन्ह परत निर्धार में ॥ ४८ ॥
भक्तन ही के संग सदा जोह रहै ।
भक्त पदारथ पाय मुक्ति सोइ लहै ॥
तुम्हरी भक्ति अनूप सकल सुखरास है ।
कोऊ जन नहिं होत कभी जु निरास है ॥
तुम प्रभु पूरन काम कृपाल दयाल हो ।
तुमकों करत प्रनाम सुनों गोपाल हो ॥
पारब्रह्म भगवान धरम के धाम हो ।
तातै अस्तुति करत विप्रन को श्याम हो ॥
नातो हम मन मांहि चहत दिन रैन का ।
तुम्हरे चरन सरोज सुखद की रैन का ॥
पारब्रह्म प्रभू ईश हमारे हो तुम्ही ।
सब दासन के दास तुम्हारे हैं हमी ॥
तुम कारन बहुभांति जु हम जप तप करें ।
मनमें अपने ध्यान तुम्हारो ही धरैं ॥
सबहीबिध जगमाहिं तुम्हीं सुखदान हो ।
तुमकों करत प्रनाम सुनों भगवान हो ॥ ४६ ॥
सबही घट के मांहि रहो इह भांत में ।
जैसे पावक रहत गुप्त सब काठ में ॥
तुमकों श्री बसुदेव नहीं पहिचनियां ।
पुत्र जान बहुभांत हिये हित मानियां ॥
५४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निद्रा आलस होत जभी नर रूपकों।
सुध बुध नाहीं रहत रंक और भूप कों ॥
सोवतही के माहिं सुपन जो देखिये।
जीव दिष्ट के साथ जु कौतुक पेखिये ॥
जोपे श्रीभगवान भेव नहिं जानिये।
देखन हारो सुपन को नां पहिचानिये ॥
ऐसें सगरे जीव भर्म मानैं सदा।
प्रभू पूरन को रूप सु पहिचाने कहा ॥
तुम्हरी किरपा होय `जभी जदुनाथ जू।
दिव्य दिष्ट नर लोय कों आवै हाथ जू ॥
सब जादों कुल बंस मोह लिपटानियां।
तुमरी गति अति गूढ़ इन्हू नहीं जानिया ॥ ५० ॥
जानौ अतिही हीन हमारी शक्ति कों।
करैं कौनविध नाथ तुम्हारी भक्ति कों ॥
तुम्हरे चरन सरोज जु सुखदाई महा।
जिहसों आध और व्याध नहीं व्याप्त सदा ॥
कृपा करो घनश्याम सकल हम दास पै।
तिन चरनन के पास हमारो निवासकै ॥
बानप्रस्थ जे लोय तुम्हीं कों धावईं।
जपतप कै मन आप तुम्हीं सों लावईं ॥
तुम्हरो रूप अपार ध्यान कर देखईं।
अपनो जीवन जनम सुफल कर लेखईं ॥
ज्यों गज चींटी आदि जु लघु दीरघ सबै।
सब बपु जीव समान जान लीजै अबै ॥
दीपक को दृष्टान्त यही जु बिचार है।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४५
लघु दीरघ सब ठांव वही उजियार है ॥
कोऊ जन यह बात न जिय में आनई ।
तनमें जिय किह ठांव रहत को जानई ॥ ५१ ॥
तैसें श्री घनश्याम सदा सुखरास ही ।
निसदिन श्री बसुदेव के गेह निवास ही ॥
राजनराम और श्याम जगत सुखदानजू ।
सुनकै ऐसी बात लगे मुसकान जू ॥
पुन बोले सुखपाय श्री नारद तभी ।
कहत सुनों बसुदेव वचन मेरे सभी ॥
कर्म नाश नहीं होय जु कर्मन कीजिये ।
यह निश्चे कर आप हिये धर लीजिये ॥
हरि की सेवा माहिं जोई जन चित धरै ।
मनमें अपने नाहिं कछू इच्छा करै ॥
तिह के कर्म कटजाहिं छिनक में जानिये ।
मुक्तहोय कुछ संस नहीं उर आनिये ॥
जो जन प्रभूकों पूजकै इच्छा फल चहै ।
पापकरैं तिह नाहिं मुक्त कैसे लहै ॥
श्रीभगवान के काज कर्म सब कीजिये ।
ताको फल जो होय उन्हीं कूं दीजिये ॥ ५२ ॥
होंही कहत न बात यह अपने जीय सों ।
कहत सबै सुज्ञान जु पण्डित हीय सों ॥
ऐसी बिध के कर्म जोइ जन साजई ।
कर्म बन्धतें छूट मुक्तपुर राजई ॥
जो तुम कहो यह बात के हम ग्रहवारी हैं ।
जोग जुगत के काज नहीं अधिकारी हैं ॥
५४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तो तुमकों इक बात कहूं समुझायकै ।
कर्म जोग को पंथ कहूं मन लायकै ॥
जो कुछ पुन्न और दान सदाही तुम करो ।
नेम धर्म व्रत और जु कुछ मन में धरो ॥
तिनकों फल जो होय सु हरि कूं दीजिये ।
इच्छा मन के माहिं कछू नहीं कीजिये ॥
सो हरि तुमसों होय न न्यारो जानिये ।
सदा बसत गृह मांहिं तुम्हारे मानिये ॥
या विधि नारद बचन कहै बसुदेव सों ।
तब उनही मन मुदित पहिचानों भेव कों ॥ ५३ ॥
बहुरौ श्री बसुदेव बचन ऐसे कहो ।
सुनहु विप्रसुर ज्ञान बात चित में लहो ॥
हम को दीक्षा देहु जज्ञ के काज की ।
इच्छा पुरवै मोहि जु सुख के साज की ॥
विप्रन सुन यह बात बहुत सुख पाइया ।
बसुदेव सों अभिषेक तभी जो कराइया ॥
जज्ञ करन बसुदेव बैठे सब साज सों ।
संग लीन्हीं दोऊ नार जज्ञ के काज कों ॥
ल्बाये जज्ञ की सोंज सबै जादों तहां ।
सुर विमान चढ़ व्योम आये देखन उहां ॥
किन्नर और गंधर्ब गुनी आये सभी ।
हरि के गुन बहुभांत सबन गाये तभी ॥
ब्रह्मा सम बसुदेव तहां जु विराजई ।
गुर ज्यों सब उंह ठांव रिषी सुर राजई ॥
सोभत तहां जदुराज राम सुख साजही ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४७
होत जज्ञ भली भांत जु उनके काजही ॥ ५४॥
बैठे बहुते विप्र और पंडित जहां ।
श्री वसुदेव ने दान बहुत दीन्हे तहां ॥
ऐसी विधिसों जज्ञ कियो चित लायकै ।
कर स्नान जो दान दिये मन लायकै ॥
सव राजन कों आय तभी पूजा दई ।
सवकी पूरी आस जु कुछ इच्छा भई ॥
सुर किन्नर गंधर्व तहां जो आइया ।
आय़ुस ले निज धाम सभी जु सिधाइया ॥
कौरों भीषम आदि और उन साथ के ।
बहुतै और नरेश हितू जदुनाथ के ॥
अस्तुति श्रीजदुराज की मिल सबहुन कही ।
नमस्कार करजोर सवन आय़ुस लही ॥
श्री वसुदेव सुजान वचन भाषन लगे ।
ब्रजबासिन के साथ प्रीत रस में पगे ॥
तुम तो प्रान समान हमारे हो सबै ।
तुमतें कैसी भांति होहिं न्यारे अबै ॥ ५५॥
या बिध कहत सुनाय प्रेम की बात
तब देवी इंह भांत श्याम सों यौं कही ।
तोहि कछू इंह ठांव में सुध बुध है रही ॥
बहु असुरन के माहि बसे द्वारींपुरी ।
कहिबेतें यह बात तोहि लागै बुरी ॥
चलो जाव घर और बेग सुध लीजिये ।
नातौ ऐसें राज काज सब छीजिये ॥
यह सुनकै घनश्याम नंद कों बोल कै ।
बोले छबि अभिराम हिये कों खोल कै ॥
कही धन्य ए द्योस जु तुम दरशन लहैं ।
तुमतें न्यारे होन नहीं कबहुँ चहैं ॥
तुम तें बिनती करत कंपत सब गात है।
हम सें ऐसी कहत न आवत बात है॥ ५६॥
रक्षक नाहीं कोय द्वारिका में उहां ।
जो तुम आज्ञा होय तो अब जावें तहां ॥
इक परदेश में वास रिपुन के बीचही ।
नातो तुम्हरो पास नहीं छोड़ें कभी ॥
यह कारन मनलायके आज्ञा दीजिये ।
आपन हूं ब्रज जाय गोधन सुध लीजिये ॥
देख नंद और मात जसोधा ओरहीं ।
रोवें नार नवाय कै नंद किशोरही ॥
तक मुख रोवन लागे जसोधा नंदहू ।
परो ग्रीवके बीच प्रीत को फंदहू ॥
कहैं कन्हैयालाल हमें तू राख लै ।
लोटन लगे तिंह काल बचन यह भाखकै ॥
नंद कहैं घनश्याम हमें संग लेहु जू ।