भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
गोपीविरह निवेदन । ४६६
रोम रोम घायल भई अरी हेलो लगो प्रेम को तीर ।
कृष्ण बैद बिन को करै औषध की तदबीर ॥
जो कबहूं किरपा करेंरी अरी हेली वे शुकदेव गंभीर ।
विरह बिथा चरणदासि की मेटैं श्री बलबीर ॥३॥
रास रच्यो नन्दलाल हेली वृन्दावन के मांहि ।
संग बिराजै राधिकारी अरी हेली अपने पियके नाल ॥
मुरली मधुर बजाइरी अरी हेली सुनत भई बेहाल ।
जेती ब्रजबाला सबै तनकी रही न सँभाल ॥
खानपान बिसरायकेरी अरी हेली उमंग चली बन मांहि ।
जो नहिं मानै सांच तू वे देखो दौरी जांहि ॥
शरदरेन अति सोहनीरी अरी हेली फैलो पूरन चन्द ।
चतुरानन मुनिजन रिषिन मोहे सनक सनन्द ॥
पशु पक्षी मृगहू थकेरी अरी हेली शंकर छोड़यो ध्यान ।
बढ़ी निश शशिहू थक्यो रंभा भूली तान ॥
तीस और छह बाजे बजैरी अरी हेली राग रागनी साथ ।
तत थेई थेई झुनकार सो नाचैं गोपीनाथ ॥
अब हम तुम दोऊ चलैरी अरी हेली जहां शुकदेव दयाल ।
चरणदासि होय देखिहैं अद्भुत चरित गुपाल ॥४॥
होरी खेलैं सांवरो ग्वाल बाल ले संग ।
कोऊ ढफ ताल बजावईरी अरी हेलो कोऊ बीन मुहचंग ॥
लाल बसन सबके बनैरी अरी हेली लाल लालही पाग ।
नाचत कूदत चावसों गावत आए फाग ॥
गैरू रोक ठाढ़ो भयोरी अरी हेली काहू जान न देत ।
सैन बताय सखान कों छीन मटकियां लेत ॥
बहुर आय रंगसों रंगैरी अरी हेली चोवा देत लगाय ।
५०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अबीर गुलाल और अरगजा मुखपर दे लपटाय ॥
हो हो हो होरी कहैंरी अरी हेली छोड़ैं नाच नचाय ।
हा हा हा करवाय कै फगुवा देत मँगाय ॥
प्रेम प्रीति रसबस करैरी अरी हेली बांकी चितवन डार ।
चरणदासि शुकदेव-की लीला अपरम्पार ॥५॥
राग मंगल सुहा बिलावल ।
चरणदास पिय मौहन प्यारे मोपे कछु टोना कियो ।
देखतही सुध रही न सखीरी खैंच मन कों ले गयो-॥
ताही दिनतें भई बौरी नींद और गई भूख है ।
चितको चिन्ता अधिक बाढ़ी तन गयो सब सूख है ॥
कहा करूं कासूं कहूं सजनी लाज की मारी मरूं ।
एक दिन सखी बरस बीते बिरह पावक में जरूं ॥
चरणदासि शुकदेव प्यारे कृपा मोपै कीजिए ।
मोहन के ढिग जाय सजनी मोहिं सुध आ दीजिए ॥
बिथा मोरी सब सुनावो ओड सूं सब दुख कहो ।
वह तुम्हारे लिए तरसैं तुम क्योंना उनकूं चहो ॥
ज्यों बने त्यों पिय मिलावो दरस मोहिं दिखाइए ।
कछू छल बल बनै तो सजनी संग ही ले आइए ॥
चरणदासि भल भाग सजनी लाल हम घर आइयो ।
जिन सखी मेरे पिय मिलायेसो सदा सुख पाइयो ॥
मेरे मन कों सुख जोदीनों तनकी तपत बुझाइया ।
मोहन के संग रली मानी आनंद मंगल गाइया ॥
एक संग जब भोजन कीनों और ले बालम कहो ।
वा समय की कथा अद्भुत वहसमो सखी नित रहो ॥
चरणदासि पिय सखी तेरी लाग चरनन सूं रही ।
गोपीविरहनिवेदन । ५०१
दासि अपनी जान मोहन आप कर बैनी गुही ॥
प्रीतम बैनी गुहन लागे मैं सखी दरपन लियो ।
पीठ पाछे मुख छिपाकर मंद मंद मुसका दियो ॥
गुह चुके जब पीठ कर धरो हूं सखी पाइन परी ।
जा समय पर गुही बैनी सदा रहियो वह घरी ॥
राग सोरठ ॥
अँखियन कहा नीकी करी ।
श्याम सुन्दर छबि निरख के जहाँ जाय अरी ॥
लोक की सब लाज छूटी कुल की दूर धरी ।
अतिहि व्याकुल धीर नाहीं रहत असुवन भरी ॥
तजों खान अरु पान सोवन प्रेम की लागी लरी ।
बिरह पीड़ा उठत निशिदिन हिये पावक जरी ॥
नेह वाके भई बौरी ढूंढ़ी गरी गरी ।
चरणदासि शुकदेव के अब कौन फंदे परी ॥
राग भैरवी ॥
नैनन साँवरो रह्यो छाय ।
दशहु दिशि सखि श्याम दीखत और ना दरसाय ॥
स्वप्न जाग्रत श्याम सूझे और नाहिं सुहाय ।
श्याम मुखसों बोल निकसत उठत हियसों हाय ॥
श्याम बिन छिन चैन नाहीं जिया अति अकुलाय ।
चरणदासि शुकदेव गुरु मोहिं श्याम देहु मिलाय ॥
- राग सोरठ ॥
हरि पै जानदै पति मोकूं ।
घेरी आय बाट के माहीं कहा कहूं अब तोकूं ॥
५०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
या मथुरा की बहुब्रजनारी बिंजन अधिक बनाये ।
लै लै भेंट चली मोहन कूँ निकट गांव हरि आए ॥
मो कारन यह सखी सहेली हैं इकठौरी ठाढ़ी ।
बाट निहारैं वेगि पधारैं प्रीत श्याम सूं बाढ़ी ॥
चौबे बोल्यो मूरख नारी तू सुध बुध क्यों खोवे ।
अपनो पुरुष तजै जो तिरिया कुलकी लाजडुबोवे ॥
तातें इनको संग छांड़के चल अपने घर माहीं ।
हम तो विप्र सबन तें ऊंचे यामें संसे नाहीं ॥
चौबैन कहै सुनो हो स्वामी मोहिं लाज नहिं भावै ।
विगड़ै काज लाज सूं मेरे बिरथा बाद बढ़ावै ॥
तुम्हहुं नहीं या तनके साथी देखा समझ विचारा ।
वे दीनन के नाथ कहावें पतित उधारनहारा ॥
हठ नहिं कीजे आज्ञा दीजे अबहीं उलटी आऊं ।
हा हा तुम्हरी आज्ञा सेती प्रभुको दरशन पाऊं ॥
तबहिं रिसाय पकर कर ल्यायो पगमें बेड़ी डारी ।
खंच दई कोठे के भीतर पटदे सांकल मारी ॥
फिर बोली मंदिर के अन्दर सुन हो सांच हमारो ।
जीवत बहुरि मिलूं नहिं कबहुं देखूं मुख न तुम्हारो ॥
जानत हूं तू बड़ी हठीली भई विषय रस बौरी ।
मारूं खङ्ग निकामूं तेरी अबै प्रेम की डोरी ॥
तब तो चलीं सबै वे नारी याकी आशा त्यागी ।
तज के देह गई आगेही वह बनिता बड़भागी ॥
हरि रीझे जब चरनों लाई भौसागर सूं त्यारी ।
चरणदासि शुकदेव कहत हैं करी प्रेम हित प्यारी ॥
श्रीधरब्राह्मणलीला । ५०३
( श्रीधरब्राह्मणलीला )
राग काफी ॥
सुनोरे साधो मोहन की बतियां ।
श्रवनन सुन हियरो हुलसत है शीतलहो छतियां ॥
कृष्ण पूतना जब हरि मारी सुनकर कंस डरायो ।
श्रीधर ब्राह्मण अपने घरको तासों दुख समझायो ॥
बोल्यो द्विज मोहिं आज्ञा दीजे अबहीं गोकुल जाऊं ।
काजकरूं तेरे मन भायो हति बालक घर आऊं ॥
बीड़ा लेकर चलो ब्राह्मण पहुँचे गोकुल जाई ।
दई आशिष नंद यशुदाको जीवो कुँवर कन्हाई ॥
ब्राह्मण रूप देख यशुदा ने आदर कर बैठायो ।
ले चरणोदक पूछन लागी किह कारन तू आयो ॥
बोल्यो बचन कपट के जैसे सहत छुरी लिपटायो ।
तेरे भयो पूत मैं सुनके तासु देखने आयो ॥
पलना पौढ्यो ललना अबहीं जागै तब दिखलाऊं ।
तुम बैठो मैं जमुना जाऊं न्हाय बहुर घर आऊं ॥
सूनो मन्दिर देख श्रीधर दाँव पाय उठ धायो ।
मारन कारन कियो मनोरथ मनमें अति हुलसायो ॥
अन्तर्यामी उठो अचानक श्रीधर पकड़ पछारो ।
दे छाती पर जीभ मरोड़ी नाहिं जीव सूं मारो ॥
बहुर दहो ले मुखसों मीडो अरु भूमें ढरकायो ।
आपन पौढ़ रहे पलना में यह कौतुक दरसायो ॥
आय जसोमत पूछन लागी अरे कहा यह कीनो ।
बोल न आवै सैन बतावै हरि सौंही कर दीनो ॥
रिसाय खिसाय कर चलो कंसपै जीभ खोय घर आयो ।
३४
५०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हांफत कांपत लिखी अवस्था राजा कूं दिखलायो ॥
पढ़कर कंस धुनैं मूड़ो कूं अब कहा कीजे भाई ।
चरणदास सुखदेव श्याम की लीलापै बलिजाई ॥
राग काफी ॥
मुकट पर बारीरे नागरनन्दा ।
सब सखियन में यों हरि राजै ज्यों तारन में चन्दा ॥
बृन्दावन की कुंज गलिन में खेलत बालगोविन्दा ।
चरणदास चरणन को चेरो चरण कमल रज बन्दा ॥
राग धनासरी ॥
मोहन बांसुरी में टेरोरी ।
तामें हो कर टोना कीन्हो सरवन सुनि हीयो घेरोरी ।
जबसूं विरह विथा तन दौरी परबस है मन मेरोरी ॥
व्याकुल हो देखन कूं धाई नैनन सूं मग हेरोरी ।
श्यामसुन्दर बिन कछु न सुहावे कोई मिलावे नेरोरी ॥
शुकदेव सखी तुमपै बलिजाऊं करूं निहोरो तेरोरी ।
चरणदासि होयरहुँ तिहारी कछू सुनावो न्योरोरी ॥
रागी काफी ॥
वंशीवारे सों लगन मोरी लाग गई ।
हूं आवतही अपने घरकूं सहज अचानक भेट भई ॥
ठाढ़ोरहत सखा संग लीये सघन कदम्बकी छाही छई ।
कहाबरनू सांवरे कीशोभा शेषथको छबिजाय न कही ॥
अलक झलक माथे तिलक बिराजै सीसजरकसी पागनई ।
फेंटा ऊपर तुर्रा थिरकै गल माला कर मुरली लई ॥
हँस टौना कियो श्यामसलोने प्रेम ठगौरी मोपै डारदई ।
चितवनमें मेरो मनहरलीनूं बौरीहुई कछु सुध न रही ॥
रागबद्ध भजन-माला, साखी संग्रह एवं भक्ति सागर ग्रन्थ उपसंहार
श्रीस्वामीचरणदासजीकेशब्द । ५०५
तनव्याकुल जियै उमड़ोही आवै रोम रोम हरीरूप मई ।
चरणदासिसूं शुकदेवा गुरु भक्तिदान बरघोह यही ॥
राग काफी ॥
बाजत घुंघरू की झनकारी हो ।
नृत्यत अजब अनोखी गतसों । कृष्ण कुंवर गिरधारी हो ॥
मुकुटजटित सिर अधिक बिराजत अलक झलक घुंघरारी हो ।
तान मान सुरताल मधुरधुन तत्त तत्त ततकारी हो ॥
उघरत गत सांगीत कला सब पग नूपुर झुनकारी हो ।
जुगल स्वरूप रूप अद्भुत धर बिहरत दे दे तारी हो ॥
रसिकशिरोमन लालमनोहर सन्तन को रखवारी हो ।
चरणदासि शुकदेव श्यामके चरण कमलपर वारी हो ॥
राग माझ ॥
मोहनजी तुम साहिब मेरे । मैं हूं दासि तिहारी ।
तनमन धन सब तुमपर वारूं । बार बार बलिहारी ॥
तुम बिन हमरो कोऊ नाहीं । यह सरवन सुन लीजे ।
चरणदासकूं चरणन सेती । नेक जुदो नहिं कीजे ॥१॥
हूंतो चरणकमल लिपटानी । तुम क्यों न पकरो बाहीं ।
जैसी लगन है मेरे मनकूं । तेरे मनकूँ नाहीं ॥
ऐसी प्रीतिकरी मोहनजी । निपट कपट की सानी ।
चरणदासि पिय मो मन माने । मैं पिय मन नहिंमानी ॥२॥
पिय प्यारेजी जुलफ तिहारी । नागनसी अतिकारी ।
डस गई हिरदै माँझ हमारे । ता दिन दिष्ट निहारी ॥
ताको विष नखशिखलों बाढ़ो । बिथापीर अति भारी ।
चरणदासि लहरें मोहन बिन । उतरत नाहिं उतारी ॥३॥
छाती दरकी गवन सुन्यो जब । तन व्याकुज मन कंपो ।
५०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भई अचेत गिरी धरनी पर । नैनन दोऊ पल झंपो ॥
फिर आई सुरत आहकर बोली । नैनन नीर बहायो ।
चरणदासि हियलग्यो उमाहो । घर अँगना न सुहायो ॥४॥
मोहनने मेरो मन मोह्यो । देखत कछु कर डारो ।
ताहि दिन तें भई बावरी । ए सखी रोग बिचारो ॥
फिर फिर उठत गिरत धरनी पर । लगन लहर लहराई ।
चरणदास कहु जीवन कैसो । विरह भुवंगम खाई ॥५॥
विरह बिथा नख सिखसूं दौरी । तन में रह्यो न लोहू ।
मित्तर दौर वैद कूँ लावैं । रोग न जानत कोऊ ॥
मनमोहन दे रूप लुभानी । गिरी शहद ज्यों मक्खी ।
चरणदास अब जतन कहाहै । तब नहिं अँखियां रक्खी ॥६॥
लटकचाल सुन्दरतन निरखत । मुखपर ससि बलहारी ।
नैन ढरारे बांकी भौंहैं । जुलफ भुवंगम कारी ॥
हँस हँस बचन बान मोहिं मारे । लगे कलेजे मांहीं ।
चरणदासकसकत निसदिन अब। क्यों ही निकसत नाहीं ॥७॥
मोहन लटक चलन चष चंचल । रूप सरूपमें भारी ।
घरसूं आंगन आंगनसूंधर । नक झुनक झुनकारी ॥
हँसतैं झरैं फूल मानों पांती । बात कहत जानो मोती ।
चरणदास घायल मायल भए । देख परम गत जोती ॥८॥
मोहनजी दोउ जुलफ सँभारो । सांपन सुत मतवारे ।
झूमत रहत कपोलन ऊपर । श्याम भुवंगम कारे ॥
विषके भरे नाग के छौना । मन कूं डर जु हमारे ।
चरणदास को हियो डसि है । जब को लहर उतारे ॥
पिय प्यारेजी कोप न कीजे । तुम कूं नहीं बन आवे ।
तेरी भौंह मरोरन आगे । मेरो जी डर जावे ॥
श्रीस्वामीचरणदासजीकेशब्द । ५०७
बचन कठोर कहो जनि मुखसूं । बरछी अनी जु लागे ।
चरणदास अब थरहर कांपै । एजी मोहन तेरे आगे ॥
राग कल्याण ॥
गंगा स्वर्गलोक सूं आई ।
बावनजी के पग सूं प्रगटी शिवकी जटा समाई ॥
कलजुग मध्य बहुत पतितन के निस्तारन कूं धाई ।
अधम उधारन पाप निवारन तारन तरन कहाई ॥
तब भागीरथ करी तपस्या शंकर भये सहाई ।
किरपा करकर जबही दीन्ही भागीरथी कहाई ॥
अतिही पावन सब मन भावन कहांलों करूं बड़ाई ।
धूप दीप ले करौ आरती फूल अरु पान चढ़ाई ॥
दरशन करके शीश नवावो अंत परम पद पाई ।
चरणदास हरि चरनोदक की सुखदेव महिमा गाई ॥
राग झँझौटी ॥
एसे कीजे गंगा का अस्नान ।
पाप प्रतिग्रह नाहीं लीजै दया धर्म उर आन ॥
भजन ध्यान अरु कथा कीरतन सेवा पूजा दान ।
या विधिसों जो दरशन करिहैं पावैं मुक्ति निदान ॥
अस जो कूद करें जल गदला विषै बासना ठान ।
मेला जान तमाशे जावैं फल नहिं रंचक मान ॥
हरि चरनोदक प्रगट भयो है यह निहचै जियजान ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं करो प्रेम सूं पान ॥
राग हेला ॥
गंगाजी की धार हेला पाप कटन कूं आर है ।
जो कोई न्हावे प्रीत सूं रे अरेहेला उतरे भौजलपार ॥
५०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जेते तीरथ और हैंरे अरे हेला तिन में है सिरदार ।
प्रगटी प्रभु के चरन सों महिमा अगम अपार ॥
अकाल मोत पावै नहींरे अरेहेला निहचै मनमें धार ।
शीश निवा दरशन करो मिटै कष्ट के भार ॥
बहुर जोन आवै नहींरे अरे हेला कहैं शुकदेव पुकार ।
चरणदास अचवन करो हरि चरनोदक सार ॥
आरती ।
आरती गंगा माई की कीजे । बस वैकुंठ महासुख लीजै ॥
स्वर्गलोक सूं गंगा आई । शिव की जटा में आन समाई ॥
सेवाकर भागीरथ लीनी । मृत्यु लोक में परगट कीनी ॥
फूल पान मिष्टान चढ़ावो । कर कर दरशन शीश नवावो ॥
शीश छुवाय न्हाय जो कोई । पाप कटें और निर्मल होई ॥
चरणदास शुकदेव बखानी । पतितउधारन सुरसरि जानी ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत शब्द संपूर्णम् ।
अथ कवित्त प्रारभ्यते ॥
कवित्त ॥
जुगताधरि ध्यानधरैं जिसको तपसी तनगारिकै खाकलगावैं ।
चारसु वेद न पावत भेद बड़े तिरदेव नहीं गति पावैं ॥
अकास पताल मृत्युलोकहीमें जाको नामलिये सबहीसिरनावैं ।
चरणदास कहैं ताकूं गोप सुता करतारी दैकर नाच नचावैं ॥
पीतम्बर की मेखला मुद्रा किए कुंडल की चन्दन की विभूत
लायें देखो इक जोगिया । मुरली कीनादपूरै शब्द तौ कहै
अलेख दधहूकी भीख मांगै सबही बिध, भोगिया ॥ वाको
कवित्तवर्णन । ५०६
स्वरूप आली अटँको है मेरे चित कछु ना सुहात अब भयो
तन रोगिया ॥ कहै चरणदासि दोऊ नैना तो डिगम्बर भए
मिलत नाहीं प्यारो मन भयो है वियोगिया ॥
निसबासर ध्यानकरें प्रभुकौं रसना रससूं हरि नाम पढ़ी ।
जमनातट जाय अस्नान करें नित सेवाकरें इक पाय ठढ़ी ॥
दीनानाथ तुम्ही हम दीन प्रभू मोहिनाथ अनाथजु कीजे बढ़ी ।
चरणदास कहैं सुता भीषम की हरिनाम् लियें सुख सेज चढ़ी ॥
वेदहूं कूं मानें अरु पूजें पुरानहूं कूं गीताहू समझें जो गुरु ने
समझाई है । ब्राह्मणके पायलागूं मारूं मुख पण्डित को वेद
को छिपाय भेद और गत गाई है ॥ पढ़ पढ़कै अर्थ करें हिये
मांहिं नाहिं धरें करें ना विचार सब दुनियां भरमाई है ।
कहै सोतो करें नाहिं पण्डित एकहू माहिं शुकदेवजी के दास
चरणदास गति पाई है ॥
लीलाहैं अनन्त नामरूप हैं अनन्त जाके शक्ति हैं अनन्त
वारपारहू न पायो है । महिमा अपार रहे देव मौन धार मुख
जै जै उचार निज शीशहू नवायो है ॥ ब्रह्मासे अनन्त सोऊ
वेद को उचार करें नारद अनन्त जाको गुणाबाद गायो है ।
कहैं चरणदास सोई नन्दको दुलारो प्यारो देदे नवनीत
ब्रजबालन नचायो है ।
वेदविधि जग्य भोग अरप्योहू लेत नाहिं ग्वालन को
दधि झूठो खोस खोस खायो है । जाको भै मान लोकपालहू
नवायें शीश सोतो भक्तिभाव बस हाऊतें डरायो है ॥ जाकी
मायाबस जीवबँधे तिहुंलोकहूके सोतो प्रेम बस होय ऊखल
बँधायो है । कहैं चरणदास नँदनन्द ब्रजचन्द प्यारो नवनीत
काज ब्रज ग्वालनी नचायो है ॥
५१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नेति नेति कहि ताहि वेदहू बखान करैं ब्रह्मा आदि सुर
मुनी निसदिन ध्यायो है । शेशहू रटत जाको पावत न ओर
छोर ताहि को यशोदा मैया गोद में खिलायो है ॥ शिव
सनकादि ताहि खोज खोज हारिरहे ब्रजबाला प्रेमबस रासहू
रचायो है । कहैं चरणदास शुकदेव के प्रताप सेती आदि
पुरुष भक्तिहेत नन्दगेह आयो है ॥
जाको ब्रह्मा वेद माहिं गावत हैं नेति नेति ताहि ब्रज
ग्वालवाल ख्यालहू खिलायो है । शिव सनकादि ताको
पावत न आदि अन्त पूतकहि ताहि बाबा नन्दने लड़ायो
है ॥ जाकी शक्ति आसरे खड़े हैं ब्रह्माण्ड पिण्ड ताको ब्रज-
नारी पाँय चलन सिखायो है। कहैं चरणदास शुकदेव के
प्रताप सेती आदि पुरुष भक्ति हेत नन्दगेह आयो है ॥
पद राग सोरठ ॥
नरायन नरायन रटो निज मूल ।
थोड़ासा जीवन घनीसी भूल ॥
आयाथा कुछ लाहा कारन लगा यहां तू पूंजीहारन ।
आगे साह लगेगा मारन अब तू करले जियका सूल ॥
जिनहरितेरी रक्षाकीनी ताती पवन लगन नहिं दीनी ।
तैं वाकी सेवा नहिं कीनी पानीसे तू किया अस्थूल ॥
अबतू विसर गया उस पियकू गर्भमांहि सुखदीया जियकू ।
तलमूड़ी ऊपरको पाँवथे जठर अगनि में रहा तू झूल ॥
अब तुम सुमरो श्रीपति देवा छिनमें पारलगवै खेवा ।
जबजम आवै जियकेलेवा हाथमें फाँसी अरु तिरशूल ॥
चरनहिदासकहैहितचितकी यह संसारखानि है बिषकी ।
जगत बड़ाई है दिन दसकी दया अमरफल पाप बबूल ॥
श्रीश्यामाश्याम ।
श्रीराधाकृष्णाय जुगलचरनकमलमकरन्दाय नमो नमः ॥
अथ श्रीमहाराज साहिब श्रीचरणदासजी कृत
कुरुक्षेत्रलीला प्रारम्भते ॥
अष्टपदी छन्द ॥
अपने गुरु शुकदेव कूं शीश निवायकै ।
साधो कहूं कथा भागौत सुनो चित लायकै ॥
चरणदास के इष्ट कृष्ण गोपाल हैं ।
दुख हरन सुख करन सुदीन दयाल हैं ॥
दसम स्कन्ध बिषै यह कथा सब गाइ है ।
राजा परिक्षित कूं शुकदेव सुनाइ है ॥
राज सिंहासन ऊपर बैठे थे हरी ।
काहूने सूरज गहन की चरचा आ करी ॥
जब श्री मोहनलाल मतौ मनमें कियो ।
न्हान चलैं कुरुक्षेत्र सबनसों यों कह्यो ॥
तब अधिकारन कूं बुला आज्ञा दई ।
बेग करो सामा चलबे की यों कही ॥
नगर द्वारिका लोगन कूं उत्सव भयो ।
सब काहू ने ठाठ चलन ही को ठयो ॥
हाथी और हथनाल घोड़े और पालकी ।
ऊंट कजावे साज डोले और नालकी ॥
रथ चंडोल सवारे सबै बनाय कै ।
सखी सहेली लई मांहि बैठाय कै ॥
तोप रहकले बान जु आगे चलाइया ।
५१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
खच्चर और घुरनाल को अन्त न पाइया ॥
नौवत और सहनाय नफीरी वाजई ।
तुरही और करनाय भेर धुन गाजई ॥
ध्वजा पताका निसान वनै मन भावनें ।
रंग सुरंग फरकें सुनहरी सुहावनें ॥
रुक्मिन और पटरानी आठों साथही ।
चाले सैन सिंगार द्वारिका नाथ ही ॥
राजा राना संग चले बहु साज सों ।
हौदा सों हौदा मिलाय और गजराज सों ॥
तीस और छः वाजे वजैं आनन्द सों ।
पण्डित गुनी महन्त चले जु घमण्ड सों ॥
सेना को दल जात न काहू पे गिनों ।
मानों उमड़ो मेघ चहूं दिस चौगुनों ॥
वेगही पहुंचे जाय क्षेत्र के माहिं ही ।
केई जोजन लों कटक परो वा ठांहिं ही ॥
राजन कूं आज्ञादई उतरो सबै ।
कर परिनाम जु आये डेरों में तबै ॥
सकल कुटुंब संग नहाये मोहन लाल हूं ।
दान दिये बहु भांतिन के तिह काल हूं ॥
रंक सबै राजा भये वा दान सों ।
विप्र पढ़ें धुन वेद जु बहु सनमान सों ॥
दोहा ॥
कर अस्नान भोजन कियो, पहरे बसन बनाय ।
चरणदास कहैं सभा में, जदुपति बैठे आय ॥
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५१३
अष्टपदी छन्द ॥
बातन हूँ में बातजु ब्रज की आइया ।
बोले श्री जदुनाथ परम सुख पाइया ॥
ब्रजवासिन की सुध जु कहूँ कोई पावई ।
हमसों कहियो आय यही मन भावई ॥
कृष्णकुंवर की सबै कही जो बनाय के ।
ब्रजवासिन की बात सुनौ चित लायकै ॥
अब ब्रजवासिन बात कहूँ मन भावती ।
प्रेम प्रीत रसरीत जु सबै सुहावती ॥
नन्द महर वृषभान गोप हूँ आइया ।
कीरत जसुधा आदि सबै तहां धाइया ॥
श्री राधा संग आई बहु ब्रज बाल हूँ ।
गइयन बछरन साथ आये सब ग्वाल हूँ ॥
उतरे आली ठौर मगन मन होय के ।
हरि के चरनों मांहि सुरत समोय के ॥
तबै अचानक बात कही कोऊ आय के ।
गहन न्हान घनश्याम हूँ आये धाय के ॥
देवकी और वसुदेव कुटंब संग आइया ।
नगर द्वारिका बासो सबहीं धाइया ॥ १ ॥
यह सुनके नन्दादिक कूं आनन्द भयो ।
खान पान गये भूल हिये में सुख छयो ॥
दौरो ढूंढो जाय कहां हरि ऊतरे ।
हम तो उन बिन भये काठ के पूतरे ॥
एक कूँ है देखे पहिचानें अकि नहीं ।
लाज मान हैं वे हमरे तन देखहीं ॥
राजा हूवे जाय द्वारिका नाथ हैं।
जदुबंसी कुल मांहिं तो जादव नाथ हैं ॥
सकल खण्ड के राजा शीश निवावई ।
हम तो मूढ़ गँवार कैसे जानें पावई ॥
राजाहू नहीं जानै पावे द्वार लों ।
खांहि छरिन की मार पौर रखवार सों ॥
होनी होय सो होय चलैं अरराय कै ।
मारहु खाते जांय धसैं दरराय कै ॥
आये सुन गोपाल सबै सुख पाइया ।
ग्वाल गोप ब्रजबाल जु अंग न समाइया ॥ २ ॥
धन धन है दिन आज भैया हरि आइया ।
कहैं परस्पर बात ऐसें बनाइया ॥
एक कहै वाहि गहि बृन्दावन लै चलैं ।
एक कहै हमदाँव आज लैं हैं भलैं ॥
कहै एक सुनोरे भैया हरि आवई ।
कहै एक चुप रहो आवन देहु तौ ।
अपने नैनन देख मिलो सुख लेहु तौ ॥
रौल बोल सुन गाय चक्रित सी हो रही ।
श्रवन देके बैन थकित सब हो गई ॥
हरि बिन जोवे धैन भई दुख पायसी ।
दूधहीन तनछीन रही मुरझाय सी ॥
कूदत फांदत चौंकी सुन यह बातही ।
मन आनन्द बढ़ाय फूली न समात ही ॥
हरष मान बछरन कूं लातें मारही ।
मुख थन नहिं दें है जु झिझक बिडारहीं ॥ ३ ॥
? No, let's look at whether there is a halant under 'छ' or 'ठ': Under 'छ': no halant. Under 'ठ': no halant. Wait, but in Hindi/Braj books from this era, is it pronounced/written पूछयोorपूछ्यो? Many people transcribe it as पूछयोorपूछ्यो. But look closely at पूछयो: is there any ligature? No, it's छandयो. Wait, let's look at कह्योin L17: 'क', then 'ह' with 'य' inside it? No, 'ह' followed by 'यो'! Wait, in Hindi, it's often writtenकह्यो, उठ्यो, पूछ्यो, where 'ह्यो' has 'ह' + 'य'. But wait, in standard unicode, writing पूछयोvsपूछ्यो: Wait, let's look at L12 again: Is the letter 'छ' or 'छ'? Yes. Is the letter after it 'यो'? Yes. Wait, could it be पूछयो? Yes, पूछयो. Wait, what about उठ्यो? In Hindi poetry, उठ्योvsउठयो? Actually, let's check उठ्यो` in L1
५१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैहूँ अपने नन्द जसुधा माय पै ॥
लरकाई फिर होय तौ वह सुख पाइये ।
खेलूं अंगना जाय दही फिर खाइये ॥
देवकी और वसुदेव बिसर दोऊ गये ।
आंसू पर आंसू गिर भीज बसन नये ॥
श्याम सुन्दर को प्रेम उमड़ सरिता वही ।
भक्तों की कर सुरत चरणदासा कही ॥५॥
रोवत कान्ह सुजान कही कोऊ जायके ।
दौर देवकी माय चक्रित भई आयके ॥
कुंवर लाडलो कान्ह काहे कूं रोवई ।
आय देवकी बात पूछती यों भई ॥
मुख ऊपर कर फेर पोंछ आंसू सबै ।
तोपै वारी जांव बलैयाँ ल्यूं अबै ॥
बहुरों जल की धार नैनन भर आवई ।
थंभ नहीं सकत जु प्रेम प्रवाह वहावई ॥
कहत पुकार पुकार कहा भयो पूत कूं ।
जानें कही कछु बात ल्यावो वा दूत कूं ॥
दुःख हरन सब जगत को मेरो लाल है ।
कैसें रोवत जात भयो बेहाल है ॥
नन्द यशोदा माय जु आये होहिं तौ ।
उन के आये सुनै काहै कूँ रोव तो ॥
लेहु बुलाय आपने यशोदानन्द कों ।
एतो दुःख क्यों भयो जुआनन्दकन्द कों ॥६॥
आगै हू जु कबै सुध उनकी आवती ।
रोवत देखत याहि महा दुख पावती ॥
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५१७
धन्य द्योस है आज प्यारे परताप को ।
दरस करें हम तेरे माय और बाप को ॥
बोली देवकी माय और वसुदेव जी ।
माय बाप मिलबे की बधाई देहु जी ॥
मिलनें दैहैं जबै बधाई देहुगे ।
बैठ गोद के मांहि परम सुख लेहुगे ॥
बोले कृष्ण मुरार माय सुन लीजिये ।
जगत बिषे कहा वस्तु बधाई दीजिये ॥
तन मन सम कुछ वस्तु नहीं ब्रह्माण्ड में ।
सो तन तुमही दियो सदा जु अखण्ड में ॥
पूछत राजा परिक्षित श्री शुकदेव कूं ।
तीन लोक को नाथ कहौ रोवे जु क्यों ॥
जब बोले शुकदेव न संशय मान तू ।
भक्तों बस भगवान यह निहचै जान तू ॥ ७ ॥
साध चहैं सोई करें यह भेद अगाध है ।
हरि साधों के मांहि मांहि हरि साध है ॥
कोई सखी रनवास में बात सुनाइया ।
सिंहासन पर रोवत श्याम कन्हाइया ॥
सरवन सुन यह बात सबै हक धक रहीं ।
सबही दौरी आय कि परदौ लग रही ॥
चिक के भीतर खरी सकुच और लाज सों ।
मधुर बचन कह पूछत ए रोवैं जु क्यों ॥
बोल उठी जब माय देवकी बात हूं ।
ब्रजबासी, मिल आये ग्रहन की जातहू ॥
दूध पिवाय हँसाय जु लाड़ लड़ाइया ।
५१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सो जसुमत और नंदहू ब्रज तें आइया ॥
माय हेत की बात सुनी गोपाल ने ।
यातें रुदन कियो है मेरे लाल ने ॥
महा मूढ़ अज्ञान कंस के त्रास तैं ।
पठियो थो मैं उन के घर या आस तैं ॥ ८ ॥
याकी ढीठी और मचलाई सब सही ।
माखन चोर्यो सव ग्वारिन को और मही ॥
काहू तैं लरतो भिरतो काहू तैं भाज तो ।
अब सूधो हो गयो भयो महाराज तो ॥
प्रीत पुरातन जान आईं ब्रज नागरी ।
सुन्दर रूप सरूप सबन तें आगरी ॥
सब रानी मुसकाय बात ऐसें कही ।
धन धन धन हैं भाग आज हमरे सही ॥
रुक्मिन और सतभामा वचन सुनाइया ।
राधाजू कूं लीजे श्याम बुलाइया ॥
बृन्दावन की लीला सब दिखलाइये ।
ब्रजबनिता और ग्वालहिं बेग बुलाइये ॥
पीताम्बर और लकुट मुकुट माथे धरो ।
गुंजमाल हूं पहर रूप नटवर करो ॥
मिल गावो और नाचो अनिही हुलास सों ।
हमकों आनन्द दीजे रास बिलास सों ॥ ६ ॥
ये बातें सुन श्याम रोवते हँस परे ।
अति आतुर उठ चाले भाजे गहबरे ॥
सिहासन तें उठे पीव नांगे भले ।
कोऊ लियो नहीं संग अकेले ही चले ॥