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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

शब्दवर्णन । ४५३
होनहार हिरदय मुख बोलै बिसरि जाय सब शुद्धि ॥
गुरुशुकदेव दयासों होनी धारि लई मन माहिं ।
चरणदास शोचे दुख उपजै समझेसों दुख जाहिं ॥
राग सीठना ॥
टुक रँग महल में आवकि निर्गुण सेज बिछी ।
जहाँ पवन गवन नहिं होय जहां जाय सुरति बसी ॥
जहाँ त्रय गुण बिन निर्वाण जहाँ नहिं सूर शसी ।
जहाँ हिलि मिलिकै सुखमान मुक्तिकी होय हँसी ॥
जहाँ पिय प्यारी मिलि एक कि आशा दुई नसी ।
जहाँ चरणदास गलतान कि शोभा अधिक लसी ॥
सुनु सुरत रँगीली हे कि हरिसा यार करौ ।
जब छूटै विघ्न विकार कि भव जल तुरत तरौ ॥
तुम त्रै गुण छैल बिसारि गगन में ध्यान धरौ ।
रस अमृत पीवो हे कि विषया सकल हरौ ॥
करि शील संतोष शिंगार क्षमाकी मांग भरौ ।
अब पांचौ तजि लगवार अमर घर पुरुष बरौ ॥
कहै चरणदास पिय देखि गुरु के पावँ परौ ।
जिव आतम बिगड़ी हे पुरुष को भूलि रही ॥
जब पिय बिसराई हे जने जन बाहँ गही ॥
तैं लाज गवांई हे कि पांचन पकड़ि लई ।
तेरे तीन लगे लगवार पचीसौ संग भई ॥
तैं जनम जनम रहि चूक कि यमकी मार सही ।
कहैं चरणदास बिन लाल कि भवजल जात बही ॥
टुक निर्गुण छैला सों कि नेह लगावरी ।
जाको अजर अमर है देश महल बेगमपुररी ॥

४५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
जहाँ सदा सोहागिनि होय पिया सों मिलि रडुरि ।
जब आवागमन न होय मुक्ति चेरी तेरी ॥
कहैं चरणदास गुरु मिले सोई हां रहु बौरी ।
तब सुखसागर के बीच कि लहरि है रहरी ॥
तू सुन हे लंगर बौरी ।
तूपांचौ घेरि पचीसौ घेरी विषयवासना की है चेरी बारी
वारी दौरी । तैं पियभूली चौरासी डोली अङ्ग अङ्ग के सुखमें
फूली मायालाई डौरी ॥ तैं काम क्रोध सों नेह लगायो मन
माता सब जग भर्मायो मोह यार बांकोरी । चरणदास शुक-
देव बतावैं निर्गुण छैला तोहिं मिलावैं जो टुक चेतन होरी ॥
पर आशाहै दुखदाई ।
जिन धीरजसों पति रसिया छांड़ौ बांको मोह यार कियो
गाढ़ो क्रोधसों प्रीति लगाई ॥ जिन जतसत देवर सों मुख
मोड़ा दया बहिन सों नाता तोड़ा सुमति सौकि बिसराई ।
जो धर्म पिता के घरसों छूटी क्षमा मायसों योंहीं रूठी कुमति
परोसिन पाई ॥ सन्तोष चचाको कहा न माना चची दीनता
सों रिसठाना माया मधि बौराई । चरणदास कहै जब निज
पतिपावै श्रीशुकदेव शरण सो आवै शील शिंगार बनाई ॥
राग सीठना ॥
टुकदरशन दे हरि प्यारे ।
बिनदेखेमोहिंकलन परति यह देह जरतिहै व्याकुल प्राण हमारे ॥
तेरी भौंहें मटक और प्रेम लटक हिय अटकी नंददुलारे ।
तेरी सुन्दर सूरति मोहनि मूरति नैना अति मतवारे ॥
तुमसो को छैला सदा नवेला अलबेला बांकारे ।
मैंहूं चरणदासा तुम सुख रासा आसा पुरवो आरे ॥

शब्दवर्णन । ४५५
कहा बाजत करत गुमान मुरलिया रंग भरी ॥
तैं मोहे मोहन छैल कि बांके कृष्णहरी ।
सुन बाँस सुता बड़ भाग तनकसी वन लकरी ॥
कछु टोना कीन्हो है विचित्तर सुघर खरी ।
निशि बासर लागी रहै पिया के अधर धरी ॥
ब्रज सगरो दियो नचाय हाथ भर की बसरी ।
तेरी तान मधुर सुर हे बरषावत प्रेम भरी ॥
सुनिकै धुनि सुर ऋषि मुनि देव महेश समाधितरी ।
चरणदास भई सखि हे तुही शुकदेव बरी ॥
तुम देखो हरिकी लीला साधौ कहन सुनन गम नाहीं ।
वह आप सकल बिस्तारै अरु आप करै प्रतिपारै जब चाहै
तबही मारै या जगमें धूम मचाई ॥ वह अद्भुत कौतुक लावै
रंकहिको राज्य दिलावै राजाको रंक करावै यह गति किनहुं
नहिं पाई । वह अचरज खेल मचावै पाप पुण्य के न्याव
चुकावै आप देखै और दिखावै इक इकसों देइ भिराई ॥ जब
पाप बढ़नको आवै हरि आपहि धोय बहावै दुष्टन को मारि
भगावै संतनकी करै सहाई । चरणदास कहै जो चाहौ शुकदेव
शरण अब आवो तुम सांईं सों लवलावो वै दैहैं दुःख मिटाई ॥
तेरी क्षण क्षण छीजत आयु समझ अजहूं भाई ॥
दिन दोका जीवन जानि छांड़ि दे गुमराहौ ।
सुन मूरख नर अज्ञान चेतता क्यों नाहीं ॥
कहा फूला फिरत गवांर जगत झूठे माँहीं ।
कियो काम क्रोध सों नेह गही है अकड़ाई ॥
मतवारा मायामाहिं करत है कुटिलाई ।
तेरो संगी कोई नाहिं गहैं जब यम बाँहीं ॥
३१

४५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुकदेव चेतावै तोहिं त्यागदे मचलाई ।
चरणदास कहैं भजु राम यही है सुखदाई ॥
अथ वसंत होरी प्रारम्भः ॥
राग वसंत ॥
ऐसे कृष्ण कुँवर खेलत वसंत । जाको सुर नर मुनिपावे न अन्त ॥
संग लिये बहु ग्वाल बाल । अरु फेंटन में भरि भरि गुलाल ॥
सब वस्त्र पहिरे लाल लाल । गल सोहत सुन्दर गुंजमाल ॥
कोउ डफरवाव मौहरि मुहचंग । कोउ ताल बजावत है मृदंग ॥
कोउ ढोल तँबूरा वीण चंगँ । कोउ गावत स्वर दै दै उमंग ॥
कोउ केशरि गागरि लिये हाथ । गहि छिरके तबहीं गोपिनाथ ॥
काहू वेंदी दई हरिजू के माथ । जब आईं राधिका सखिन साथ ॥
इक काजर नैनन आंजो आय । मुख चोवा चँदन अबीर लाय ॥
नीलाम्बर प्रभुको दियो ओढ़ाय । हँसिकरत परस्पर मनके भाय ॥
यह कौतुक ब्रज बाढ़ो अपार । मिलि नाचत कूदत गोपी ग्वार ॥
लखि मोहिरहीं बहु देवनारि । ऐसो अद्भुत अचरज रस विहारि ॥
यह सुख अब कापै कहोजाय । सनकादिक नारद रहे लोभाय ॥
शुकदेव गुरू ने दियो दिखाय । चरणदास ध्यानमें रहो समाय ॥
ऐसे पारब्रह्म खेलत वसंत । कबहूं एक कबहूं अनन्त ॥
जैसे हाटक¹ एक भूषण अनेक । वरण वरण के धरत वेष ॥
टूटै गहना गल जो जाय । फिरि चाहै तौ फिरि बनाय ॥
आपही विष्णु ब्रह्मा महेश । आपहि धरती आप शेष ॥
आपहि सुर नर मुनिहिं जान । आप धरत अवतार आन ॥
आपहि रावण आपहि राम । आपहि कंसा आपहि श्याम ॥
आपन को चढ़िमारे आप । आप आपनको जपतजाप ॥
१ स्वर्णनाम ॥

शब्दवर्णन । ४५७
चरणदास इकंगी आपा देख । हरि कहियत हैं तेरे भेख ॥
शुकदेव दया ते पायो भेव । ताते आप अपन की लागो सेव ॥
वह वसन्तरै वह वसन्त ।
कोइ बिरला पावै वह वसन्त । जाकी अद्भुत लीला रँग अनन्त ॥
जहाँ झिलमिल झिलमिलहै अपार । जहाँ मोती बरषै निराधार ॥
जहाँ फूलन की लागी फोहार । जहाँ अनहद बाजै बहु प्रकार ॥
जहाँ ताल जु बाजै बिना हाथ । जहाँ शंख पखावज एक साथ ॥
जहाँ बिन पग घुंघुरूकी टकोर । जहाँ बिन मुख मुरली घनाघोर ॥
जहाँ अचरज बाजे और और । जहाँ चन्द सूर नहिं सांझ भोर ॥
जहाँ अमृत दरवै कामधेनु । जहाँ मान क्रोध नहिं मोह मैन ॥
जहाँ पांचौ इन्द्री एक रूप । जहाँ थकित भये हैं मन से भूप ॥
शुकदेव बतावैं ऐसो खेल । चरणदास करौ क्यों न वासों मेल ॥
खेलो राम नाम लै लै वसन्त । भक्ति करौ मिलि साधुसन्त ॥
मात पिता सुत दारा जान । सब स्वारथ के संगी पिछान ॥
तोहिं जनमत सबहिन घेरो आय । तैं आप अपनपौ दियो बँधाय ॥
श्वास निकसि रहिजाय देह । सब कुटुँब संघाती भरो गेह ॥
जब सबही मिलिकै तजैं नेह । कहैं वेगि निकासौ रही खेह ॥
कहैं खाट बिछौना द्यो निकास । अरुजारि देहु मुख लै हुतास ॥
ऐसे झूठे संग की कौन आस । ताते हरि भजिले तू हर¹ उसास ॥
इनसों पगो तजो हरिसों मीत । अपने भलेकी न करी चीत ॥
शुकदेव कहैं नर अजहुँ चेत । चरणदास तजौ क्यों न जगसों हेत ॥
मेरेसतगुरु खेलत निजवसन्त । जाकी महिमा गावत साधुसंत ॥
ज्ञान विवेक के फूले फूल । जहाँ शाखा योग अरु भक्ति मूल ॥
प्रेमलता जहँ रही झूल । सतसंगति सागर के कूल ॥
१ अर्थात् हर श्वास में ॥

४५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जहाँ भर्म उड़त है ज्यों गुलाल । अरु चोवा चरचै निश्चय बाल ॥
शील क्षमा को बरषै रंग । काम क्रोध को मान भंग ॥
हरि चरचा जित है अनन्त । सुनि मुक्त होत सब जीव जन्त ॥
आन धर्म सब जाहिं खोय । राम नाम की जै जै होय ॥
जहाँ अपने पिय को ढूंढ़ि लेव । अरु चरण कमल में सुरति देव ॥
कहैं चरणदास दुख द्वंद्व जाहिं । जब प्रियतम शुकदेव गहैं बाहिं ॥
खेलौ नित वसंत खेलौ नित वसंत । मिलि साधु संगमें नित वसंत
जहाँ फूल जु फूले चारि रंग । भक्ति ज्ञान अरु योग अंग ॥
रंग जु चौथा है विराग । विषय वासना देहु त्याग ॥
भँवर होय सूंघै जु कोय । जीवनमुक्ता कहिये सोय ॥
भय औ भ्रम सब छूटि जाय । आनँद पदमें रहे समाय ॥
चन्दन चरचा अति सुबास । महकरही हाँ आस पास ॥
जिहि सुगन्ध शीतलता होय । ताप तपन सबजाहिं खोय ॥
चरणदास हरिचरण माहिं । शीश दिये बहु पाप जाहिं ॥
प्रीतम सुख देवैं अनन्द । अरु काट निवारै सकल फन्द ॥
वह देश अटपटा बिकटपन्थ । कोइ गुरुमुख पहुँचे होय सन्त ॥
बहुत चले मग चाव चाव । औरन सों कहि आव आव ॥
हमहूं पहुंच तुम्हें दे बसाय । ऐसो जान्यो सुलभ दाय ॥
बहुतक तपसी कष्ट साध । बहुतक पण्डित पोथी लाद ॥
बहुतक झुण्डिते जटा धारि । चहुं ओर पावक जारि जारि ॥
बहुतक मुण्डित पूजा राखि । बहुतक भक्ता पिछली शाखि ॥
बहुतक योगी पवन जीति । हरि मिलिबे की करैं रीति ॥
कायर थाके बाट माहिं । कछु इक आगे चले जाहिं ॥
वे कनक कामिनी लिये घेरि । सो भी उनके पड़े फेरि ॥
१ झूठा वेष बनाने वाले ॥

शब्दवर्णन । ४५६
कोइ उनसे छुटकरि आगेजाय । जहाँ ऋद्धि सिद्धिलेवैं लगाय ॥
शुकदेव कहैं सब डारि आस । ह्वां प्रेमी पहुँचै चरणदास ॥
साधौ आतम पूजा करै कोय । जोई करै सोइ मुक्ता होय ॥
नेह नगर में बसै जाय । भवन सँवारै हित लगाय ॥
तामें सेवा धारै धार । आठ पहर करैं बारम्बार ॥
तन मन वचन सँभारि लेव । सम्मुख देखो अपना देव ॥
दया पुष्प माला बनाव । क्षमा शील चन्दन चढ़ाव ॥
लिये दीनता हाथ जोरि । सांचे रंग मन को बोरि ॥
घट घट प्रीतम राख मान । रस भंग न होवै सावधान ॥
प्रसन्नता सोइ धूप दीप । शुकदेव कहैं यों रहु समीप ॥
चरणदास हो सँग न छोर । कृष्णमयी लखु चहुँ ओर ॥
होरी राग धमारि ॥
मोहन चतुर सुजान मेरे घर होरी खेलन आयो हो ।
सखीरी पीत बसन पियरे आभूषण पीरो तिलक बनायो हो ॥
सखीरी लाल हिलाल गुलाल उड़ावत ग्वाल बाल सँग लायो हो ।
सखीरी करन अनेक सबके पिचकारी गावत नाचत धायो हो ॥
सखीरी आनि अचानक हरिने मेरे मुख चोवा लपटायो हो ।
सखीरी केशरि माहीं घोरि अरगजा मो तनपै ढरकायो हो ॥
सखीरी अपने हाथ सवाँरि पानदै हार हिये पहिरायो हो ।
सखीरी रीझ रिझा अरु भीज भिजाकर उर आनन्द बढ़ायोहो ॥
सखीरी मैं हूँ वाके जाय अचानक काजर नैन लगायो हो ।
सखीरी मुरली गहि पीताम्बर लैके नीलाम्बर जो ओढ़ायो हो ॥
सखीरी जासुखको ब्रह्मादिक तरसैं शेष पार नहिं पायो हो ।
सखीरी गोपी कहैं चरणदास श्यामकी सो सुख हमें दिखायो हो ॥
साध चलौ तुम संभारी । जग होरी मचि रही है भारी ॥

४६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दम्भ पाखण्ड गहे करमें डफ डूबड़ डूबड़की तारी ।
त्रैगुण तार तंबूरा साजे आशा तृष्णा गति धारी ॥
पाप पुण्य दोउ लै पिचकारी छूटत हैं बारी वारी ।
सम्मुख ह्वै करि जो नर खेलौ ताके चोट लगी 'कारी ॥
लोभ मोह अभिमान भरो है ले माया गागरि डारी ।
राजा परजा भोगी तपसी भीजि रहे हैं संसारी ॥
कुबुधि गुलाल डारि मुख मींजो काम कला पुटली मारी ।
युग युग खेलत यों चलि आई काहू ते नाहीं हारी ॥
जड़ चेतन दोउ रूप सवाँरे एक कनक दूजी नारी ।
पांच पचीसलिये सँग अबला हँसि हँसि मिलि गावत गारी ॥
चतुरा फगुवा दै दै छूटे मूरख को लागी प्यारी ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निर्गुण ज्ञान गली न्यारी ॥
होरी राग काफी ॥ ''
ज्ञानरंग हो हो हो होरी ॥
निहरूपी बहुरूप धरे हैं नाना भेष करोरी ।
देखन निकसी अपने पियाको समझ भवन की पौरी ॥
बुद्धि विचार शिंगार सजो है निश्चय माथे रोरी ।
जीवन्मुक्त हुलास बढ़ो है परगट खेल मचोरी ॥
खेलत खेलत आपन बिसरो लागी कौन ठगोरी ।
आपा खोजि रामहीं पाये मैं नाहीं निकसोरी ॥
चरणदास नहिंहरिही हरि हैं आपहि आप रहोरी ।
उपजै कौन कौन अब बिनशै बंध मुक्त केहि ठौरी ॥
होरी राग धनाश्री ॥
साधौ घूंघुट भर्म उठाय होरी खेलिये ॥
वेद पुराण लाज तजिबारी इनमें ना उरझैये ।
१ असर कर जानेवाली ॥

शब्दवर्णन । ४६१
शिर सों सकुच उतारि चदरिया पियसों रंग बढ़इये ॥
रूप न रेख न सूरति मूरति ताके बलि बलि जइये ।
अचल अजर अविनाशी सोई सम्मुख दरशन पइये ॥
सत चेतन आनन्द सदाही निर्भय ताल बजइये ।
पाप पुण्य की शंका त्यागो जहां मर्याद न पइये ॥
ओलो नीर विचारौ जैसे यों आपन विसरइये ।
चरणदास वासना तजिकै सागर बूंद समइये ॥
राग सोरठ ॥
हिलिमिलि होरी खेलि लईहो बालमां घर पाइया ।
पांच सखी पच्चीस सहेली आनंद मंगल गाइया ।
समझ बूझका चोवा चरचा भर्भगुलाल उड़ाइया ॥
दुई गई जब इच्छा कैसी खेलन सकल बहाइया ।
चरणदास बासना तजिकै सागर लहर समाइया ॥
होरी राग सोरठ ॥
कांसू खेलै को होरियां हो बालमनाहीं मैं नहीं ॥
अबिर गुलाल अरगजा नाहीं रंग नहीं गागर नहीं ।
ताल मृदंग झाँझ डफ नाहीं राग नहीं रागिनि नहीं ॥
फाग महीना वा घर नाहीं कन्थ नहीं कामिनि नहीं ।
चरणदास नहीं तब हरिकहुकैसो सबकुछ है और कुछ नहीं ॥
होरी राग धमारि ॥
आदिपुरुष अविगत अविनाशी नाना कौतुकै लावैरे ।
आपहि आप और नहिं कोई बहुतक रूप बनावैरे ॥
आपहि मोहनलाल ग्वालहो मुरली आनि बजावैरे ।
आपहि ब्रजकी बनिता होकर वनको दौरी आवैरे ॥
१ बर्फ २ खेल ॥

४६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आपहि गोपी कान्ह विराजै आपहि रासरचावैरे ।
अन्तर्द्धान होय फिर आपहिआपहि ढूंढ़न धावैरे ॥
आपहि व्याकुल अप देखनकूं लीला प्रेम बनावैरे ।
परगट होय सबन सुख देवै आपहि रंग बढ़ावैरे ॥
भोर भये जब खेल मचावै आप आप रहजावैरे ।
कबहुँ एक अनेक कभी हैं विधि निषेध गति भावै रे ॥
सत चित आनंद रूप सदाही शुकदेव हो समुझावैरे ।
चरणदास हो समझि समझिकरि आपहिआनंदपावैरे ॥
होरी राग धनाश्री ॥
साधौ बुद्धि विवेक सँभारि होरी खेलिये ॥
सांख्ययोग की युक्तिसों कीजै नित्यअनित्य विचार ।
माया सकल निवारिकैरे आतम रूप निहार ॥
पांचतत्त्व तीनों गुण परगट इनको दो दिन फाग ।
इकरस सत पद जानि लेरे ताहीसों मन पाग ॥
निश्चय चोवा लाइयेरे भर्म गुलाल उड़ाय ।
देह करमके रंगकीरे गागर दे ढरकाय ॥
जीवन मुक्त जु फगुवा पइये गुरुके चरणन लाग ।
जो कोई ऐसी होरी खेलै जाके ऊंचे भाग ॥
चरणदास कहैं शुकदेव बताई हमहूँ खेलैं जाग ।
प्रियतम प्रियतम जित तित देखे द्वेष गयो अरु राग१ ॥
सखीरी ततम२तले संग खेलिये रस होरी हो ।
निर्गुण निज निर्धार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी शील शृङ्गार सवांरिये रस होरी हो ।
दुविधा मानि निवार सरस रस होरी हो ॥
१ प्रेम २ ओंकार ॥

शब्दवर्णन । ४६३
सखीरी रहनी केसर घोरिये रस होरी हो ।
बहुरि न ऐसों बार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी सतगुण करि पिचकारि ले रस होरी हो
तमरजके भर मार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी गर्बगुलाल उड़ाइये रस होरी हो ।
मोह मटुकिया डारि सरस रस होरी हो ॥
सखीरी मिल मिल रंग लगाइये रस होरी हो ।
चंदन चरच विचार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी निश्चल सिन्धु समाइये रस होरी हो ।
रिमझिम झमक फुहार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी शून्य नगर में नृत्तिये रस होरी हो ।
अनहद झनक झिंगार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी सैन सुरति सों समझिये रस होरी हो ।
सोहंब्रह्म खिलार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी पांच पचीसौ रल मिले रस होरी हो ।
मंगल शब्द उचार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी अलख पुरुष फगुवा लहो रस होरी हो ।
आपा आप बिसारि सरस रस होरी हो ॥
चरणदास रमइया रमि रह्यो रस होरी हो ।
दर्शो है फाग अपार सरस रस होरी हो ॥
गुरु दूती बिना सखी पीव न देखो जाय ।
भावै तुम जप तप करि देखो भावै तीरथ न्हाय ॥
पांच सखी पचीस सहेली अति चतुर अधिकाय ।
मोहिं अयानी जानिकै मेरो बालम लियो लुकाय ॥
वेद पुराण सबै जो ढूंढ़े सुरति स्मृति सब धाय ।

४६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आनि१ धर्म और क्रिया कर्म में दीन्हों मोहिं भर्माय ॥
भटकत भटकत जब मैं हारी चरण सखी गहे आय ।
शुकदेव साहब किरपा करिकै दीन्हो अलख लखाय ॥
देखतही सब भ्रम भय भागे शिरसूं गई बलाय ।
चरणदास जब प्रीतम पायो दर्शन किये अघाय ॥
हरि पीव पाइया सखी पूरण मेरे भाग ।
सुखसागर आनन्द में मैं नित उठि खेलूं फाग ॥
चोवा चन्दन प्रीतिकै सखी केशरि ज्ञान घसाय ।
पुहुप वाससूं जो वह झीनो ताके अंग लगाय ॥
बेरंगी के रंगसूं सखी गागर लई भराय ।
शून्य महल में जायकै सखी पियपर दई ढरकाय ॥
भरम गुलालजब कर लियो सखी बालम गयो दुराय ।
सतगुरुने अंजन दियो तब सम्मुख दरशे आय ॥
ताली लाई प्रेमकी सखी अनहद नाद बजाय ।
सर्वमयी पिय पायकै हम आनँद मंगल गाय ॥
रलमिल प्रियतम द्वै गये सखी दुईगई सब भाग ।
चरणदास शुकदेव दयासूं पायो अचल सुहाग ॥
मैं तो ह्वां खेलूंगी जाय जित मेरो पिया बसै ।
व्याधि उपाधि न संशयकोई आनंदहि आनंद लसै ॥
नितही फागुन एकरस होरी खंडित कबहुं न होय ।
मुक्ति पदारथ फगुवा पइये आपा सरवस खोय ॥
जिनके रसिया शिव ब्रह्मादिक खेलत चावहिचाव ।
ऋषिमुनिदेवत खेलत निशिदिन करिकरिबहुतकभाव॥
भाग बड़े उन्हीं के जानो वा पदलागे धाय ।
१ शपथ ॥

शब्दवर्णन । ४६५
ज्ञान ध्यान के रंगमें डूबे सोई पहुंचे जाय ॥
गुरु शुकदेव बताई हमको जबसों बाढ़ी प्रीति ।
चरणदासहु अति ललचाये सुनि सुनि ह्वांकी रीति ॥
साधौ प्रेम नगर के माहि होरी होयरही ।
जबसूं खेली हमहूं चितदै आपनहूं को खोयरही ॥
बहुतन कुल अरु लाज गँवाई रहो न कोई काम ।
नाचि उठैं कभी गावन लागैं भूले तन धन धाम ॥
बहुतन की मति रंग रँगी है जिनको लागो प्रेम ।
बहुतनको अपनी सुधि नाहीं -कौन करै ऐसो नेम ॥
बहुतन को गद्गदही वांणी नैनन नीर ढराय ।
बहुतनको बौरापन लागो ह्वांकी कही न जाय ॥
प्रेमीकी गति प्रेमी जानै जाके लागी होय ।
चरणदास उस नेह नगरकी शुकदेवा कहि सोय ॥
कोई जानै संत सुजान उलटे भेदकूं ।
वृक्ष चढ़ो माली के ऊपर धरती चढ़ी अकास ।
नारि पुरुष विपरीतभये हैं देखत आवै हास ॥
बैल चढ़ो शंकर के ऊपर हंस ब्रह्म के शीश ।
सिंह चढ़ो देवी के ऊपर गुरुही की बखशीश ॥
नाव चढ़ी केवट के ऊपर सुतकी गोदी माय ।
जो तू भेदी अमर नगरको तौ तू अर्थ बताय ॥
चरणदास शुकदेव सहाई अब कह करिहै काल ।
बांबी उलटि सर्प में पैठी जबसूं भये निहाल ॥
इति श्रीचरणदासकृत शब्द सम्पूर्णम् ॥

४६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ भक्तिसागर प्रारम्भः ॥
अथ छपै छन्द कवित्त चौपाई दोहा प्रारम्भ ॥
छप्पै ॥
श्री ब्यास को पुत्र तासु कों दास कहाऊं ।
सदा रहूं हरि शरण और ना शीश नवाऊं ॥
साधनसूं यह चहूं मोहिं यह बात दृढ़ावो ।
माया जाल संसार तासुसों वेगि छुटावो ॥
अहो श्रीब्रजनाथ बिनय सुनि लीजिये ।
चरणदास को भक्ति कृपा करि दीजिये ॥
गुरु ईश्वर गुरु ईशरीझ गुरु राम बतावैं ।
गुरु काटैं यमफांस बिपति सब अघै नशावैं ॥
गुरुदेवन के देव भेव ब्रह्मादि लखावैं ।
गुरु भवसागर तार पार वह लोक बसावैं ॥
चरणदास यह जानिकै सतसंगति हरिको भजो ।
शुकदेव चरण चितलायकै सो झूठकानि दुबिधा तजो ॥
पग तब होवैं शुद्ध साधुके मग को धावै ।
हस्त शुद्ध तब होयँ दोऊकर शीश नवावै ॥
नैन शुद्ध जब होयँ साधु के दर्शन पावै ।
रसन शुद्ध तब होय रामगुण मुख सों गावै ॥
भनै चरणदास सब शुद्धहो जब चरण परस गुरुदेवके ।
वै आतम तत्त्व बिचार देखकर दर्शन अलख अभेवके ॥
दो० दुखमेटन सुखके करन, चरणदास वे साध ।
दाता ज्ञान विज्ञान के, देवैं मता अगाध ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४६७
साध मुक्ति नहिं चहत हैं, सिद्ध न चाहत साध ।
स्वर्गलोक नहिं चहत हैं, जिनका मता अगाध ॥
चौपाई ॥
इड़ा पिंगला सुखमन धारो । आसन बज्र नागिनी टारो ॥
द्वादश अंगुल होय वेध षट चक्कर लीजै ।
जब बाजै अनहद तूर जहां मन निज कर दीजै ॥
खेचरी मुद्रा त्रिकुटी आवै । अमृत पियै परम सुख पावै ॥
मेरुदण्डको प्राण चलावै । शून्य शिखर जब नगरी पावै ॥
जा नगरीमें चन्द न भान । पहुँचै साधू चतुर सुजान ॥
जाति पांति जहँ नाम न नाता । श्वेत श्याम पीता नहिं राता ॥
योग यज्ञ तप जहां न दाना । तीरथ बर्त्त जहां नहिं न्हाना ॥
किरिया कर्म जहां नहिं पूजा । मैं तू है नहिं एक न दूजा ॥
जहां न सांझ द्यौस नहिं राता । एकै ब्रह्म अखंड विधाता ॥
चरणदास रामकी घाटी पहुँचै गुरुमत शूरा ।
ओछी बुद्धि बाद बहुठानैं करणी करै सो पूरा ॥
छप्पै ॥
बैठ गुफाकेमध्य योगकी युक्ति बिचारै ।
आप अकेलो रहै और ना मनुष निहारै ॥
चारिबारि नितकरै जाप ॐकार अराधै ।
सूक्ष्म करै आहार ओगरो पतली साधै ॥
आसन पद्म लगाय कै सीधी राखै मेर ।
ठोढ़ी हिये लगाइये पलक झांपकरि हेर ॥
दो० कुंभक आठ प्रकारके, तिनमें उत्तम एक ।

४६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
केवल कुंभक जानिये, साधै ताहि विशेख ॥
त्रिकुटी में तीरथ अगम, तिरवेणी जेहि नाम ।
न्हाय योगकी युक्ति सूं, पूरण हो सब काम ॥
रणजीत कहैं जहाँ न्हाइये, त्रिकुटी तीरथ धाम ।
नित परबी जहाँ होत है, भजनकरो निष्काम ॥
चौपाई ॥
जा तीरथ को पवन न लागै । जा तीरथ में जन अनुरागै ॥
जा तीरथ में रतन अनेका । पूरे गुरुसों मिलमिल देखा ॥
वा तीरथमें जो कोइ 'न्हावै । भवसागर में बहुरि न आवै ॥
जहां न चन्द सूर नहिं तारे । गुंरुगम पहुँचे अति मतवारे ॥
जा तीरथका बँधा जो नीर । उज्ज्वल निर्मल गहिर गँभीर ॥
ब्रह्मा विष्णु जहां त्रयदेवा । योग युक्ति में लावैं सेवा ॥
बारह मास दामिनी दमकै । सोन पटीला जुगुनू झमकै ॥
रणजित मीत बास जहाँ कीजै । नित अस्नान महासुख लीजै ॥
छप्पै ॥
अमरी वजरी साध बायु सरने नहिं पावै ।
द्वादश अंगुल प्राण सुरतदे ताहि घटावै ॥
मौन गहै नितरहै अल्प सूक्ष्म सो बोलै ।
एकबार आहार जँभाई कबहुँ न खोलै ॥
बांधैसो जाय दृढ़ छीकको अनहद धुनि अति गाजई ।
भन चरणदास शुकदेव बल सुयोग युक्ति इमि साजई ॥
दो० मन पवना वश कीजिये, ज्ञान युक्तिसों रोक ।
सुरति बांधि भीतर धसै, सूझै काया लोक ॥
मन हिरदे में रहत है, पवन नाभिके माहि ।
इन्द्री रोकै ये रुकें, और कछू बिधि नाहिं ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४६६
छप्पै ॥
सूक्ष्म करै अहार जीति धरणी जब लेई ।
नीर जीति जब लेय बिंद जाने नहिं देई ॥
मोह लोभ जब तजै अग्निको जीति मिलावै ।
पवनजीति जब लेय गगनको बाध चलावै ॥
अरु हर्ष शोक समकरि गनै पांच जीत एकैकरै ।
भन चरणदास साधनगहै होय प्रकाश कारजसरै ॥
दो० गगन मध्य जो कमल है, बाजत अनहद तूर ।
दलहजारको कमल है, पहुँचै गुरु मत शूर ॥
गगन मँडल के कमलमें, सतगुरु ध्यान निहार ।
चरणदास शुकदेव परसै, मिटै सकल विकार ॥
सहसदल के कमलमें, रूप अगम आपार ।
सोहं सोहं जाप सहजै, होत एक हजार ॥
छप्पै ॥
नौ नाड़ीकी खैंच पवन लै उरमें दीजै ।
बज्जर ताला लाय द्वार नौ बन्ध करीजै ॥
तीनौ बन्ध लगाय अस्थिर अनहद आराधै ।
सुरति निरतिका काम राह चल गगन अगाधै ॥
शून्य शिखर चढ़िरहै दृढ़ जहां जाय आसन करै ।
भने चरणदास ताड़ीलगै सो रामदरश कलिमल हरै ॥
चौथा पद निर्वाण धाम बेगमपुर कहिये ।
गुण अतीत जहाँ रामनिरखि नैनन सुख लहिये ॥
अद्वै रूप अखण्ड मण्ड मण्डल बहु बंका ।
जहां काल नहिं ज्वाल शब्द अति उठत निशंका ॥
निज पारब्रह्म चौरी रची शिव सहित शक्ति फेरी करैं ।

४७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भन चरणदास चारों मुक्ति सो हाथ जोरि पायँनपरै ॥
मूल कमल में खेलि पिया कूं देखन चलिये ।
उलटि वेद षटचक्र जाइ सतवैंसे मिलिये ॥
प्राण अपान मिलाय राह पश्चिमकी लीजै ।
बंक नाल करि शुद्ध प्राण लै तामें दीजै ॥
मेरु दण्ड चढ़िजाय जब लोक लोक की गम परै ।
भन चरणदास ब्रह्माण्ड में ब्रह्मदर्शी दर्शन करै ॥
दोहा ॥
चरणदास यहि बिधिकही, चढ़िवे को आकास ।
शोधि साधि साधन अगम, पूर्ण ब्रह्म विलास ॥
छप्पै ॥
दल असंख्यको कमलरूप जहाँ सत्त बिराजै ।
अनंत भानु परकाश जहाँ अनहद धुनि गाजै ॥
सुन्दर छबि अति हंस सन्त जन आगे ठाढ़े ।
जहाँ पहुँचै कोइ शूरबीर नीशान जो गाड़े ॥
कमल मध्य जो तख्तहै सोभा अपार बरणूं कहा ।
कहैं चरणदास उसतख्तपर आदिपुरुष अद्भुतमहा ॥
छत्र फिरत नित रहत चँवर ढोरत जहँ हंसा ।
जहाँ दरशन कर शिष्य मिटै युग युगका संसा ॥
आवागमन है रहत मरण जीवन नहिं होई ।
आनि मिले जब चार मुक्ति कहियत है सोई ॥
जहाँ अमरलोक लीला अमरफल अनेक तहाँ पावई ।
भन चरणदास शुकदेव बल सु चौथापद इमि गावई ॥
जहां चन्द नहिं सूर जहां नहिं जगमग तारे ।
जहां नहीं त्रयदेव त्रिगुण माया नहिं लारे ॥

भक्तिसागरवर्णन । ४७१
जहाँ वेद नहिं भेद जहाँ नहिं योग यज्ञ तप ।
जहाँ पवन नहिं धरणि अगिनि नहिं जहाँ गगन अप॥
अरु जहाँ रात नहिं दिवस है पाप पुण्य नहिं व्यापई ।
आदि अन्त अरु मध्य है कहैं चरणदास ब्रह्म आपही ॥
जहाँ काल नहिं ज्वाल भर्म नहिं तिमि उजारा ।
जहाँ राग नहिं द्वेष जहाँ नहिं कर्म अचारा ॥
जहाँ काम नहिं क्रोध लोभ नहिं मोह नरेशा ।
जहाँ मित्र नहिं शत्रु जहाँ नहिं देश विदेशा ॥
अरु चरणदास इक ब्रह्म है और न दूजा कोइ तहाँ ।
भया जीव सों ब्रह्म जब योग युक्ति पहुँचे जहाँ ॥
जहाँ आतम देव अभेव सेव कबहूं न करावै ।
इच्छा दुई न द्रोह कर्म नहिं भर्म सतावै ॥
जहाँ जाप थाप नहिं आप तहाँ नहिं रूप न रेखा ।
जासु जाति नहिं पांति नारि नहिं पुरुष विशेखा ॥
अरु पारब्रह्म पूरणसदा है अखण्ड नहिं खण्डिता ।
भनै चरणदास ताड़ीलगै सो शून्य शिखरमें मण्डिता॥
चौपाई ॥
ब्राह्मण सो जो ब्रह्म पिछानै । बाहर जाता भीतर आनै ।
पांचौ बशकरि झूठ न भाखै । दया जनेऊ हिरदय राखै ।
आतम विद्या पढ़ै पढ़ावै । परमातम का ध्यानलगावै ॥
काम क्रोध मद लोभ न होई । चरणदास कहैं ब्राह्मण सोई ॥
छप्पै ॥
हुतो आपमें आप सृष्टि नहिं देत दिखाई ।
ज्यों पाला जलमाहिं धरणिपर लीक लिखाई ॥
३२

४७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भांड़े माटी माहिं कनक में भूषण राजैं।
तरवर बीरजमाहिं यथा फलफूल बिराजैं ॥
गुण रूप नाम सब ब्रह्म में ॐकार तासूं भई ।
चरणदास शुकदेव सो वही ब्रह्म माया वही ।
पांचतत्त्व तेहि माहिं तीनगुण जुदे न होई ॥
चित बुधि इन्द्री तहाँ पाप अरु पुण्य समोई ।
विष अमृत तेहि माहिं भूत अरु देव मुनीश्वर ।
फूल शूल तेहिमाहिं यमन अवतार ऋषीश्वर ॥
चरणदास शुकदेव भज ये सबदरशै दृष्टिअव ।
निराकार निरगुणकहत भूले भटके लोग सब ॥
सवैया ॥
जैसे जल में जलकुंभ बसै जल भीतर बाहर पूरिरह्यो है ।
तैसे जलमें जल पाला बँध्यो जब फूटिगयो जल आप भयो है ॥
ऐसे जगमें वह व्यापरह्यो किनहूं कर लोचन नाहिं गह्यो है ।
चरणदास कहैं दुइ दूरि करो सगरो जग एकहिडोरि गुह्यो है ॥
जैसे पट मैलकी संग कियो जु गयो सब श्वेत भयो तनकारो ।
श्यामस्वरूप अकाश भयो जब धूम धुवांजो भयो भौ भारो ॥
माया पिशाचिको संग कियो जब नीचभयो करता करतारो ।
शुकदेव कहैं दुइ दूरकरो चरणदास सभी इकसूत निहारो ॥
कवित्त ॥
दीसत न वारपार पूरि रह्यो जगतसार ऐसोही अटल नेक
टारो न टरत है। ताको तौ नहिं नाश ठौर ठौर रह्यो भास जैसे
रहत पुष्प वास पासही रहत है॥ लोचन रह्यो समाय वेदहू सकै न
गाय पुस्तक लिखो न जाय जारो ना जरतहै। शुकदेवजी की