भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४५७
चरणदास इकंगी आपा देख । हरि कहियत हैं तेरे भेख ॥
शुकदेव दया ते पायो भेव । ताते आप अपन की लागो सेव ॥
वह वसन्तरै वह वसन्त ।
कोइ बिरला पावै वह वसन्त । जाकी अद्भुत लीला रँग अनन्त ॥
जहाँ झिलमिल झिलमिलहै अपार । जहाँ मोती बरषै निराधार ॥
जहाँ फूलन की लागी फोहार । जहाँ अनहद बाजै बहु प्रकार ॥
जहाँ ताल जु बाजै बिना हाथ । जहाँ शंख पखावज एक साथ ॥
जहाँ बिन पग घुंघुरूकी टकोर । जहाँ बिन मुख मुरली घनाघोर ॥
जहाँ अचरज बाजे और और । जहाँ चन्द सूर नहिं सांझ भोर ॥
जहाँ अमृत दरवै कामधेनु । जहाँ मान क्रोध नहिं मोह मैन ॥
जहाँ पांचौ इन्द्री एक रूप । जहाँ थकित भये हैं मन से भूप ॥
शुकदेव बतावैं ऐसो खेल । चरणदास करौ क्यों न वासों मेल ॥
खेलो राम नाम लै लै वसन्त । भक्ति करौ मिलि साधुसन्त ॥
मात पिता सुत दारा जान । सब स्वारथ के संगी पिछान ॥
तोहिं जनमत सबहिन घेरो आय । तैं आप अपनपौ दियो बँधाय ॥
श्वास निकसि रहिजाय देह । सब कुटुँब संघाती भरो गेह ॥
जब सबही मिलिकै तजैं नेह । कहैं वेगि निकासौ रही खेह ॥
कहैं खाट बिछौना द्यो निकास । अरुजारि देहु मुख लै हुतास ॥
ऐसे झूठे संग की कौन आस । ताते हरि भजिले तू हर¹ उसास ॥
इनसों पगो तजो हरिसों मीत । अपने भलेकी न करी चीत ॥
शुकदेव कहैं नर अजहुँ चेत । चरणदास तजौ क्यों न जगसों हेत ॥
मेरेसतगुरु खेलत निजवसन्त । जाकी महिमा गावत साधुसंत ॥
ज्ञान विवेक के फूले फूल । जहाँ शाखा योग अरु भक्ति मूल ॥
प्रेमलता जहँ रही झूल । सतसंगति सागर के कूल ॥
१ अर्थात् हर श्वास में ॥