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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 690 में से

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पृष्ठ 494

शब्दवर्णन । ४५३
होनहार हिरदय मुख बोलै बिसरि जाय सब शुद्धि ॥
गुरुशुकदेव दयासों होनी धारि लई मन माहिं ।
चरणदास शोचे दुख उपजै समझेसों दुख जाहिं ॥
राग सीठना ॥
टुक रँग महल में आवकि निर्गुण सेज बिछी ।
जहाँ पवन गवन नहिं होय जहां जाय सुरति बसी ॥
जहाँ त्रय गुण बिन निर्वाण जहाँ नहिं सूर शसी ।
जहाँ हिलि मिलिकै सुखमान मुक्तिकी होय हँसी ॥
जहाँ पिय प्यारी मिलि एक कि आशा दुई नसी ।
जहाँ चरणदास गलतान कि शोभा अधिक लसी ॥
सुनु सुरत रँगीली हे कि हरिसा यार करौ ।
जब छूटै विघ्न विकार कि भव जल तुरत तरौ ॥
तुम त्रै गुण छैल बिसारि गगन में ध्यान धरौ ।
रस अमृत पीवो हे कि विषया सकल हरौ ॥
करि शील संतोष शिंगार क्षमाकी मांग भरौ ।
अब पांचौ तजि लगवार अमर घर पुरुष बरौ ॥
कहै चरणदास पिय देखि गुरु के पावँ परौ ।
जिव आतम बिगड़ी हे पुरुष को भूलि रही ॥
जब पिय बिसराई हे जने जन बाहँ गही ॥
तैं लाज गवांई हे कि पांचन पकड़ि लई ।
तेरे तीन लगे लगवार पचीसौ संग भई ॥
तैं जनम जनम रहि चूक कि यमकी मार सही ।
कहैं चरणदास बिन लाल कि भवजल जात बही ॥
टुक निर्गुण छैला सों कि नेह लगावरी ।
जाको अजर अमर है देश महल बेगमपुररी ॥