भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुकदेव चेतावै तोहिं त्यागदे मचलाई ।
चरणदास कहैं भजु राम यही है सुखदाई ॥
अथ वसंत होरी प्रारम्भः ॥
राग वसंत ॥
ऐसे कृष्ण कुँवर खेलत वसंत । जाको सुर नर मुनिपावे न अन्त ॥
संग लिये बहु ग्वाल बाल । अरु फेंटन में भरि भरि गुलाल ॥
सब वस्त्र पहिरे लाल लाल । गल सोहत सुन्दर गुंजमाल ॥
कोउ डफरवाव मौहरि मुहचंग । कोउ ताल बजावत है मृदंग ॥
कोउ ढोल तँबूरा वीण चंगँ । कोउ गावत स्वर दै दै उमंग ॥
कोउ केशरि गागरि लिये हाथ । गहि छिरके तबहीं गोपिनाथ ॥
काहू वेंदी दई हरिजू के माथ । जब आईं राधिका सखिन साथ ॥
इक काजर नैनन आंजो आय । मुख चोवा चँदन अबीर लाय ॥
नीलाम्बर प्रभुको दियो ओढ़ाय । हँसिकरत परस्पर मनके भाय ॥
यह कौतुक ब्रज बाढ़ो अपार । मिलि नाचत कूदत गोपी ग्वार ॥
लखि मोहिरहीं बहु देवनारि । ऐसो अद्भुत अचरज रस विहारि ॥
यह सुख अब कापै कहोजाय । सनकादिक नारद रहे लोभाय ॥
शुकदेव गुरू ने दियो दिखाय । चरणदास ध्यानमें रहो समाय ॥
ऐसे पारब्रह्म खेलत वसंत । कबहूं एक कबहूं अनन्त ॥
जैसे हाटक¹ एक भूषण अनेक । वरण वरण के धरत वेष ॥
टूटै गहना गल जो जाय । फिरि चाहै तौ फिरि बनाय ॥
आपही विष्णु ब्रह्मा महेश । आपहि धरती आप शेष ॥
आपहि सुर नर मुनिहिं जान । आप धरत अवतार आन ॥
आपहि रावण आपहि राम । आपहि कंसा आपहि श्याम ॥
आपन को चढ़िमारे आप । आप आपनको जपतजाप ॥
१ स्वर्णनाम ॥