भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 496, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४५५
कहा बाजत करत गुमान मुरलिया रंग भरी ॥
तैं मोहे मोहन छैल कि बांके कृष्णहरी ।
सुन बाँस सुता बड़ भाग तनकसी वन लकरी ॥
कछु टोना कीन्हो है विचित्तर सुघर खरी ।
निशि बासर लागी रहै पिया के अधर धरी ॥
ब्रज सगरो दियो नचाय हाथ भर की बसरी ।
तेरी तान मधुर सुर हे बरषावत प्रेम भरी ॥
सुनिकै धुनि सुर ऋषि मुनि देव महेश समाधितरी ।
चरणदास भई सखि हे तुही शुकदेव बरी ॥
तुम देखो हरिकी लीला साधौ कहन सुनन गम नाहीं ।
वह आप सकल बिस्तारै अरु आप करै प्रतिपारै जब चाहै
तबही मारै या जगमें धूम मचाई ॥ वह अद्भुत कौतुक लावै
रंकहिको राज्य दिलावै राजाको रंक करावै यह गति किनहुं
नहिं पाई । वह अचरज खेल मचावै पाप पुण्य के न्याव
चुकावै आप देखै और दिखावै इक इकसों देइ भिराई ॥ जब
पाप बढ़नको आवै हरि आपहि धोय बहावै दुष्टन को मारि
भगावै संतनकी करै सहाई । चरणदास कहै जो चाहौ शुकदेव
शरण अब आवो तुम सांईं सों लवलावो वै दैहैं दुःख मिटाई ॥
तेरी क्षण क्षण छीजत आयु समझ अजहूं भाई ॥
दिन दोका जीवन जानि छांड़ि दे गुमराहौ ।
सुन मूरख नर अज्ञान चेतता क्यों नाहीं ॥
कहा फूला फिरत गवांर जगत झूठे माँहीं ।
कियो काम क्रोध सों नेह गही है अकड़ाई ॥
मतवारा मायामाहिं करत है कुटिलाई ।
तेरो संगी कोई नाहिं गहैं जब यम बाँहीं ॥
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