भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जहाँ भर्म उड़त है ज्यों गुलाल । अरु चोवा चरचै निश्चय बाल ॥
शील क्षमा को बरषै रंग । काम क्रोध को मान भंग ॥
हरि चरचा जित है अनन्त । सुनि मुक्त होत सब जीव जन्त ॥
आन धर्म सब जाहिं खोय । राम नाम की जै जै होय ॥
जहाँ अपने पिय को ढूंढ़ि लेव । अरु चरण कमल में सुरति देव ॥
कहैं चरणदास दुख द्वंद्व जाहिं । जब प्रियतम शुकदेव गहैं बाहिं ॥
खेलौ नित वसंत खेलौ नित वसंत । मिलि साधु संगमें नित वसंत
जहाँ फूल जु फूले चारि रंग । भक्ति ज्ञान अरु योग अंग ॥
रंग जु चौथा है विराग । विषय वासना देहु त्याग ॥
भँवर होय सूंघै जु कोय । जीवनमुक्ता कहिये सोय ॥
भय औ भ्रम सब छूटि जाय । आनँद पदमें रहे समाय ॥
चन्दन चरचा अति सुबास । महकरही हाँ आस पास ॥
जिहि सुगन्ध शीतलता होय । ताप तपन सबजाहिं खोय ॥
चरणदास हरिचरण माहिं । शीश दिये बहु पाप जाहिं ॥
प्रीतम सुख देवैं अनन्द । अरु काट निवारै सकल फन्द ॥
वह देश अटपटा बिकटपन्थ । कोइ गुरुमुख पहुँचे होय सन्त ॥
बहुत चले मग चाव चाव । औरन सों कहि आव आव ॥
हमहूं पहुंच तुम्हें दे बसाय । ऐसो जान्यो सुलभ दाय ॥
बहुतक तपसी कष्ट साध । बहुतक पण्डित पोथी लाद ॥
बहुतक झुण्डिते जटा धारि । चहुं ओर पावक जारि जारि ॥
बहुतक मुण्डित पूजा राखि । बहुतक भक्ता पिछली शाखि ॥
बहुतक योगी पवन जीति । हरि मिलिबे की करैं रीति ॥
कायर थाके बाट माहिं । कछु इक आगे चले जाहिं ॥
वे कनक कामिनी लिये घेरि । सो भी उनके पड़े फेरि ॥
१ झूठा वेष बनाने वाले ॥