सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 499

४५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जहाँ भर्म उड़त है ज्यों गुलाल । अरु चोवा चरचै निश्चय बाल ॥
शील क्षमा को बरषै रंग । काम क्रोध को मान भंग ॥
हरि चरचा जित है अनन्त । सुनि मुक्त होत सब जीव जन्त ॥
आन धर्म सब जाहिं खोय । राम नाम की जै जै होय ॥
जहाँ अपने पिय को ढूंढ़ि लेव । अरु चरण कमल में सुरति देव ॥
कहैं चरणदास दुख द्वंद्व जाहिं । जब प्रियतम शुकदेव गहैं बाहिं ॥
खेलौ नित वसंत खेलौ नित वसंत । मिलि साधु संगमें नित वसंत
जहाँ फूल जु फूले चारि रंग । भक्ति ज्ञान अरु योग अंग ॥
रंग जु चौथा है विराग । विषय वासना देहु त्याग ॥
भँवर होय सूंघै जु कोय । जीवनमुक्ता कहिये सोय ॥
भय औ भ्रम सब छूटि जाय । आनँद पदमें रहे समाय ॥
चन्दन चरचा अति सुबास । महकरही हाँ आस पास ॥
जिहि सुगन्ध शीतलता होय । ताप तपन सबजाहिं खोय ॥
चरणदास हरिचरण माहिं । शीश दिये बहु पाप जाहिं ॥
प्रीतम सुख देवैं अनन्द । अरु काट निवारै सकल फन्द ॥
वह देश अटपटा बिकटपन्थ । कोइ गुरुमुख पहुँचे होय सन्त ॥
बहुत चले मग चाव चाव । औरन सों कहि आव आव ॥
हमहूं पहुंच तुम्हें दे बसाय । ऐसो जान्यो सुलभ दाय ॥
बहुतक तपसी कष्ट साध । बहुतक पण्डित पोथी लाद ॥
बहुतक झुण्डिते जटा धारि । चहुं ओर पावक जारि जारि ॥
बहुतक मुण्डित पूजा राखि । बहुतक भक्ता पिछली शाखि ॥
बहुतक योगी पवन जीति । हरि मिलिबे की करैं रीति ॥
कायर थाके बाट माहिं । कछु इक आगे चले जाहिं ॥
वे कनक कामिनी लिये घेरि । सो भी उनके पड़े फेरि ॥
१ झूठा वेष बनाने वाले ॥