भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
शब्दवर्णन । ४४५
हुआ दो जहाँ में वोही सुर्खरू है ॥
सभी आशकों पे किया कर्म तूने ।
मुआसी पे तेरा नहा दिल रजू है ॥
जहाँ देखे रनजीत वहीं हे वो हाज़िर ।
हर एकगुल में उसकी मिली मुश्कबू है ॥
पद ॥
पीले प्यालाहो मतवाला प्याला प्रेम हरी रसकारे ॥
जो दमजीवे हरि गुन गाले धन जोबन सुपना निशिकारे ।
पाप पुन्यको को भोगन आया कोन तेरा और तू किसकारे ।
बालापन खेलनमें खोया तरुण भये त्रियके बसकारे ।
वृद्धभया कफ वायु ने घेरा खाट पड़ा मारे मसकारे ॥
नाभि कमल में है कस्तूरी कैसे भरम मिटे पशुकारे ।
बिन सतगुरु इतना दुखपाया जैसे मृग भटके बनकारे ॥
भवसागर जो उतरा चाहै छाड़ कामिनी का चसकारे ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं नखशिख सर्प भरा विषकारे ॥
शब्द ॥
मुरशद मेरा दिल दरियाह दिलगह अन्दर खोजा ।
जिसके अन्दर सत्तर काबा मक्का तीसों रोज़ा ॥
चौदह तबक़ औलिया तिसमें भेद न होय जुदाई ।
सहस कमाल नमाज़ में ठाड़े दरशन जहाँ खुदाई ॥
हवा न हिर्स खुदी नहिं खूबी अनलहक़ जहाँ बानी ।
बिन चराग़ खाने सब रौशन जिसमें तख़्त सुबानी ॥
बिना अबर जहां बहु गुल फूले बिन अम्बर जहां बरसैं ।
बिन सरोद तम्बूर बजें जहां चशमे होम न दरसैं ॥
तिस दरगाह मसल्ला डारे बैठे क़ादर क़ाजी ।
४४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
न्याव करें सीने की पूछें रक्खें सबको राजी ॥
जिसके फल दीदार कियेसे नादिर होय फ़कीर ।
मारे काल कलन्दर जबलो मनवा धरे न धीर ॥
ऐसा हो जब कमला होई तब कमाल पद पावे ।
साहब मिल साहब को दरसे ज्यों जलबूँद समावे ॥
ऐसा हो सोइ पीर कहावे मनी मान सब खोवे ।
चरणदास ज़मींपर रोशन पाय पसारे सोवे ॥
शब्द ॥
जीवत मरजाय उलट आपमें समाय मन कहीं को न
जाय जिन्ह ऐसी दिलगीरी है । करे बन बाग बास जानत जे
भूख प्यास मेटे पर आस उन्हें अतिहि सबूरी है ॥ परम तत्त्व
को विचार चिन्ता सब डार हरि रस मतवार पाई ऐसी
अमीरी है। कहै चरणदास दोऊ दीन में पुकार यार सबही
आसान एक मुशकिल फ़कीरी है ॥
राग बिलावल ॥
ऐसा हो दरवेशही जगको बिसरावै ।
ईमान सबूरी सांच सों सोई बकसा जावै ॥
ज़न ज़र और ज़मीन को दिलमें नहिं लावै ।
फ़िक्र फ़कीरी को बुरा वह ज़िक्र छुटावै ॥
फ़ेफ़ाकेका गुण यही राज़क करै यादा ।
काफि कनाअत सुखघना आनन्द अगाधा ॥
रे रीयाज़त वलवान है हरि को अपनावै ।
आखिर को दीदार ही निश्चय करि पावे ॥
एज्ज़द को धारेरहै रहै सब सों नीचा ।
शब्दवर्णन । ४४७
शुकदेव कही चरणदास सों पावै पद ऊंचा ॥
वह वैरागी जानिये जाके राग न द्वेष ।
निर्द्वध ह्वै जग में फिरै चाहै सिद्ध न मोक्ष ॥
पांचन को एकै कर आनँद में रोक ।
त्रैगुण ते ऊपर बसै जहां हर्ष न शोक ॥
मन मूड़ै तन साध कै बाधा सब डार ।
तत्त्व तिलक माथे दिये शोभा अपरम्पार ॥
माला श्वास उसासकी हिरदय अस्थान ।
अलख पुरुषसों नेहरा त्रिकुटी मध्ये ध्यान ॥
काम क्रोध मोह लोभ ना यही नेम अचार ।
शुकदेव कही चरणदास सों करै ब्रह्मविचार ॥
राग सोरठ व बिलावल ॥
जो नर इतके भये न उतके ।
उतको प्रेम भक्ति नहिं उपजी इत नहिं नारी सुतके ॥
घरसों निकसि कहा उन कीन्हो घर घर भिक्षा मांगी ।
बाना सिंह चाल भेंड़नकी साधु भये अकि स्वांगी ॥
तन मूड़ा पै मन नहिं मूड़ा अनहद चित नहिं दीन्हा ।
इन्द्री स्वाद मिले विषयनसों बकबक बकबक कीन्हा ॥
माला करमें सुरति न हरिमैं यह सुमिरण कहु कैसा ।
बाहर वेष धारके बैठे अन्तर पैसा पैसा ॥
हिंसा अकस कुबुधि नहि छोड़ी हिरदय सांच न आया ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं बाना पहिरि लजाया ॥
राग मंगल ॥
महामूढ़ अज्ञान भक्ति में क्या करा ।
गुरु सों बेमुख होय बड़ापन चितधरा ॥
४४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
मुक्त पंथकी ओरहि सूबीको चला ।
तैसे व्रत परिजाय जु नट भूला कला ॥
गिरा धरणि पर आय भया तन चूर है ।
जो कोई ऐसा होय बड़ाही कूर है ॥
जैसे वृक्ष ते टूटि' बिगड़ि फल जात है ।
ऐसे गुरुते छूटि कछू न रहात है ॥
द्रुमहीं सों लगि रहा जु फल नीको भया ।
पका भलीही भांति धनी के कर गया ॥
यहीं समझ गुरु संग कबौं नहिं त्यागिये ।
मनमें निश्चय लाय शरणहीं लागिये ॥
सब तन अंगन माहिं दीनता छाइये ।
गुरुके चरण निहारिकै शीश नवाहिये ॥
दोनों करको जोरिकै अस्तुति कीजिये ।
दर्शनकरि सुखपायकै शिक्षा लीजिये ॥
श्रीशुकदेव दयाल ने मोसों यों कही ।
चरणदास शिष जानिकै ऐसा हो सही ॥
राग सोरठ ॥
समझ रस कोइक पावै हो ।
गुरु बिन तपन बुझै नहीं प्यासा नर जावैहो ॥
बहुत मनुष ढूंढ़त फिरैं अँधरे गुरु सेवैहो ।
उनहूं को सूझै नहीं औरन कहँ देवैहो ॥
अँधरेको अधरा मिला नारी को नारीहो ।
ह्वां फल कैसे होयगा समझैं न अनारीहो ॥
गुरू शिष्य दोउ एक से एकै व्यवहाराहो ।
गये भरोसो डूबिकै वे नरक मँझाराहो ॥
शब्दवर्णन । ४४६
शुकदेव कहै चरणदास सों इनका मत कूराहो ।
ज्ञान मुक्ति जब पाइये मिलै सतगुरु पूराहो ॥ ॥
राग जैजैवन्ती ॥
गुरुबिन ज्ञान नाहीं तिमिर नशावै भाई ।
भरमत फिरै लोई जल और पाहन सोई बात नहीं बूझै
कोई तिनको बहधावै ॥ देवी और देव पूजै जहां कछु नाहीं
सूझै फेरि फेरि जावै दूजे तहां नहीं पावै । वैदकको भेद ठानै
जोतिष बिचारजाने काहूकी नाहि मानै करै मनभावै ॥ भूत
टोना जादू सेवै प्रभुका न नाम लेवै भक्ति में ना चित्त देवै गुण
नहिं गावै । श्रीशुकदेव कहै चरणदास होय रहै सोई मुक्तिधाम
लहै आपा जो उठावै ॥
राग गौरी ॥
सब जग भर्म भुलाना ऐसे ।
ऊंट कि पूंछसों ऊंट बँध्यो ज्यों भेड़ चालहै जैसे ॥
खरका शोक भूंस कूकुरकी देखा देखी चाली ।
तैसे कलुआ जाहिर भैरौ सेढ़ मशानी काली ॥
गाँवभूमि या हितकरि धावैं जाय बटाही दौरे ।
सद्दौ सरवर इष्ट धरतहैं लोग लुगाई बौरे ॥
राखै भाव श्वान गर्दभ को उनको ल्याय जिमावैं ।
ढेढ चमारन को शिरनावैं ऊंची जाति कहावैं ॥
दूध पूत पाथरसो मांगैं जाके मुख नहि नासा ।
लपसी पपड़ी ढेर करतहैं वह नहिं खावै मासा ॥
वाके आगे बकरा मारैं ताहि न हत्या जानैं ।
लै लोहू माथेसों लावैं ऐसे मूढ़ अयानैं ॥
४५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
कहैं कि हमरे बालक ज्यावो बड़ी आयुबल दीजै ।
उनके आगे बिनती करतैं अँसुवन हिरदय भीजै ॥
भोपे भरड़े के पग लागैं साधुसन्त की निन्दा ।
चेतन को तजि पाहन पूजैं ऐसा यह जग अन्धा ॥
सतसंगतिकी ओर न झांकैं भक्ति करत सकुचावैं।
चरणदास शुकदेव कहत हैं क्यों न नरक को जावैं ॥
अरे नर क्या भूतन की सेवा ।
दृष्टि न आवै मुख नहिं बोलै ना लेवा ना देवा ॥
ज्यहि कारण घीज्योति जलावैं बहु पकवान बनावैं।
सो खच्चैं तू अधिक चावसों वह स्वप्ने नहिं खावैं ॥
राति जगावैं भोपा गावैं झूंठै मूड़ हलावैं ।
कुटुंब सहित तोहिं पैर परावैं मिथ्या वचन सुनावैं ॥
ताहि भरोसे जन्म गवाँवैं जीवत मरत न साथा ।
बड़भागन नर देही पाई खोवैं अपने हाथा ॥
चारि वरण में मैली बुधिका ऊंचनीच किन होई ।
जो कोइ झूंठी आशाराखै अगत जायगा सोई ॥
ताते सत विश्वास टेकगहु भक्ति करौ हरिकेरी ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं होय मुक्तिगति तेरी ॥
राग बिलावल ॥
सब सुखदायकहैं हरी मूरख नहिं जानै ।
मनमें धरि धरि कामना औरनको मानै ॥
जौ चाहै सन्तान को जप लालविहारी ।
सुन्दर बालक होहिंगे घरके उजियारी ॥
जो चाहै तू धनधना सेव कृष्ण मुरारी ।
शब्दवर्णन । ४५१
साखि सुदामा की सुनौ दइ विभव अपारी ॥
जगत बड़ाई जो चहै सुमिरौ यदुनाथा ।
नीच बहुत ऊंचे भये जगनायो माथा ॥
जो सिधहू वोही चहै करि-हरि हिय ध्याना ।
सिद्धि परापत होहिगी चढ़ि है परमाना ॥
चरणदास हूवो चहै भजिले भगवाना ।
कहैं गुरू शुकदेवजी होय मुक्त निदाना ॥
राग विहागरा ॥
साधो निन्दक मित्र हमारा ।
निन्दकको निकटे ही राखौं होन न देऊं न्यारा ॥
पाछे निन्दाकरि अघधोवैं सुनिमन मिटै विकारा ।
जैसे सोना तापि अग्निमें निर्मल करै सोनारा ॥
घन अहरन कसहीरा निबटै कीमत लक्ष हजारा ।
ऐसे यांचत दुष्टसन्तको करन जगत उजियारा ॥
योग यज्ञ जप पाप कटनहित करै सकल संसारा ।
बिन करणी मम कर्म्म कठिन सब मेटै निन्दक प्यारा ॥
सुखीरहौ निन्दक जगमाहीं रोग न हो तनसारा ।
हमरी निन्दा करनेवाला उतरै भवनिधि पारा ॥
निन्दक के चरणों की अस्तुति भाषौं वारंवारा ।
चरणदास कहैं सुनियो साधौ निन्दक साधक भारा ॥
राग सारंग ॥
अरे नर कहाकियो तुम ज्ञान ।
गई न हिंसा कुबुधि बड़ाई राग द्वेष की आन ॥
प्रभुताई को क्षण क्षण दौरै प्रभुको ना क्षण एक ।
अन्तर भोग जगतके प्यारे बाहर साधूवेष ॥
४५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैसे सिंह गऊतन धारो कपटरूप प्रकटायो ।
धोखाखाय पशू आ निकसो पंजा ताहि चलायो ॥
सुन्दररूप महा बगलेको एक टांग जल ध्यान ।
मनमें आशा मीन गहनकी कहां मिलैं भगवान ॥
गुरु शुकदेव बतायो मोको भीतर बाहर शुद्धि ।
चरणदास वा हरि जन जानौ ताकी है ब्रह्म बुद्धि ॥
राग केदार ॥
छले सब कनक कामिनि रूप ।
सुर असुर अरु यक्ष गंध्रब इन्द्र आदिक भूप ॥
सावित्री वश कियो ब्रह्मा पार्व्वती त्रिपुरारि ।
लीला कारण लक्ष्मी संग हरि लियो अवतार ॥
रावणसे अति बली मारे मौत जिन वश कीन ।
पशु नरनकी कौ चलावै एतौ अति आधीन ॥
रूप रस में दे धतूरा मोह फांसी डार ।
तप कि पूंजी छीनिकै कियो श्रृङ्गीऋष को ख्वार ॥
माया ठगिनी ठगे सबही बचे गुरु शुकदेव ।
रणजिता कोइ ऊबरो करि दास चरणन सेव ॥
राग सोरठ ॥
साधौ होनहार की बात ।
होत सोई जो होनहार है कापै मेटी जात ॥
कोटि सयानप बहुविधि कीन्हे बहुत तके कुशलात ।
होनहार ने उलटी कीन्ही जल में आगि लगात ॥
जो कछु होय होतव्यता भोंड़ी जैसी उपजै बुद्धि ।
शब्दवर्णन । ४५३
होनहार हिरदय मुख बोलै बिसरि जाय सब शुद्धि ॥
गुरुशुकदेव दयासों होनी धारि लई मन माहिं ।
चरणदास शोचे दुख उपजै समझेसों दुख जाहिं ॥
राग सीठना ॥
टुक रँग महल में आवकि निर्गुण सेज बिछी ।
जहाँ पवन गवन नहिं होय जहां जाय सुरति बसी ॥
जहाँ त्रय गुण बिन निर्वाण जहाँ नहिं सूर शसी ।
जहाँ हिलि मिलिकै सुखमान मुक्तिकी होय हँसी ॥
जहाँ पिय प्यारी मिलि एक कि आशा दुई नसी ।
जहाँ चरणदास गलतान कि शोभा अधिक लसी ॥
सुनु सुरत रँगीली हे कि हरिसा यार करौ ।
जब छूटै विघ्न विकार कि भव जल तुरत तरौ ॥
तुम त्रै गुण छैल बिसारि गगन में ध्यान धरौ ।
रस अमृत पीवो हे कि विषया सकल हरौ ॥
करि शील संतोष शिंगार क्षमाकी मांग भरौ ।
अब पांचौ तजि लगवार अमर घर पुरुष बरौ ॥
कहै चरणदास पिय देखि गुरु के पावँ परौ ।
जिव आतम बिगड़ी हे पुरुष को भूलि रही ॥
जब पिय बिसराई हे जने जन बाहँ गही ॥
तैं लाज गवांई हे कि पांचन पकड़ि लई ।
तेरे तीन लगे लगवार पचीसौ संग भई ॥
तैं जनम जनम रहि चूक कि यमकी मार सही ।
कहैं चरणदास बिन लाल कि भवजल जात बही ॥
टुक निर्गुण छैला सों कि नेह लगावरी ।
जाको अजर अमर है देश महल बेगमपुररी ॥
४५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
जहाँ सदा सोहागिनि होय पिया सों मिलि रडुरि ।
जब आवागमन न होय मुक्ति चेरी तेरी ॥
कहैं चरणदास गुरु मिले सोई हां रहु बौरी ।
तब सुखसागर के बीच कि लहरि है रहरी ॥
तू सुन हे लंगर बौरी ।
तूपांचौ घेरि पचीसौ घेरी विषयवासना की है चेरी बारी
वारी दौरी । तैं पियभूली चौरासी डोली अङ्ग अङ्ग के सुखमें
फूली मायालाई डौरी ॥ तैं काम क्रोध सों नेह लगायो मन
माता सब जग भर्मायो मोह यार बांकोरी । चरणदास शुक-
देव बतावैं निर्गुण छैला तोहिं मिलावैं जो टुक चेतन होरी ॥
पर आशाहै दुखदाई ।
जिन धीरजसों पति रसिया छांड़ौ बांको मोह यार कियो
गाढ़ो क्रोधसों प्रीति लगाई ॥ जिन जतसत देवर सों मुख
मोड़ा दया बहिन सों नाता तोड़ा सुमति सौकि बिसराई ।
जो धर्म पिता के घरसों छूटी क्षमा मायसों योंहीं रूठी कुमति
परोसिन पाई ॥ सन्तोष चचाको कहा न माना चची दीनता
सों रिसठाना माया मधि बौराई । चरणदास कहै जब निज
पतिपावै श्रीशुकदेव शरण सो आवै शील शिंगार बनाई ॥
राग सीठना ॥
टुकदरशन दे हरि प्यारे ।
बिनदेखेमोहिंकलन परति यह देह जरतिहै व्याकुल प्राण हमारे ॥
तेरी भौंहें मटक और प्रेम लटक हिय अटकी नंददुलारे ।
तेरी सुन्दर सूरति मोहनि मूरति नैना अति मतवारे ॥
तुमसो को छैला सदा नवेला अलबेला बांकारे ।
मैंहूं चरणदासा तुम सुख रासा आसा पुरवो आरे ॥
शब्दवर्णन । ४५५
कहा बाजत करत गुमान मुरलिया रंग भरी ॥
तैं मोहे मोहन छैल कि बांके कृष्णहरी ।
सुन बाँस सुता बड़ भाग तनकसी वन लकरी ॥
कछु टोना कीन्हो है विचित्तर सुघर खरी ।
निशि बासर लागी रहै पिया के अधर धरी ॥
ब्रज सगरो दियो नचाय हाथ भर की बसरी ।
तेरी तान मधुर सुर हे बरषावत प्रेम भरी ॥
सुनिकै धुनि सुर ऋषि मुनि देव महेश समाधितरी ।
चरणदास भई सखि हे तुही शुकदेव बरी ॥
तुम देखो हरिकी लीला साधौ कहन सुनन गम नाहीं ।
वह आप सकल बिस्तारै अरु आप करै प्रतिपारै जब चाहै
तबही मारै या जगमें धूम मचाई ॥ वह अद्भुत कौतुक लावै
रंकहिको राज्य दिलावै राजाको रंक करावै यह गति किनहुं
नहिं पाई । वह अचरज खेल मचावै पाप पुण्य के न्याव
चुकावै आप देखै और दिखावै इक इकसों देइ भिराई ॥ जब
पाप बढ़नको आवै हरि आपहि धोय बहावै दुष्टन को मारि
भगावै संतनकी करै सहाई । चरणदास कहै जो चाहौ शुकदेव
शरण अब आवो तुम सांईं सों लवलावो वै दैहैं दुःख मिटाई ॥
तेरी क्षण क्षण छीजत आयु समझ अजहूं भाई ॥
दिन दोका जीवन जानि छांड़ि दे गुमराहौ ।
सुन मूरख नर अज्ञान चेतता क्यों नाहीं ॥
कहा फूला फिरत गवांर जगत झूठे माँहीं ।
कियो काम क्रोध सों नेह गही है अकड़ाई ॥
मतवारा मायामाहिं करत है कुटिलाई ।
तेरो संगी कोई नाहिं गहैं जब यम बाँहीं ॥
३१
४५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुकदेव चेतावै तोहिं त्यागदे मचलाई ।
चरणदास कहैं भजु राम यही है सुखदाई ॥
अथ वसंत होरी प्रारम्भः ॥
राग वसंत ॥
ऐसे कृष्ण कुँवर खेलत वसंत । जाको सुर नर मुनिपावे न अन्त ॥
संग लिये बहु ग्वाल बाल । अरु फेंटन में भरि भरि गुलाल ॥
सब वस्त्र पहिरे लाल लाल । गल सोहत सुन्दर गुंजमाल ॥
कोउ डफरवाव मौहरि मुहचंग । कोउ ताल बजावत है मृदंग ॥
कोउ ढोल तँबूरा वीण चंगँ । कोउ गावत स्वर दै दै उमंग ॥
कोउ केशरि गागरि लिये हाथ । गहि छिरके तबहीं गोपिनाथ ॥
काहू वेंदी दई हरिजू के माथ । जब आईं राधिका सखिन साथ ॥
इक काजर नैनन आंजो आय । मुख चोवा चँदन अबीर लाय ॥
नीलाम्बर प्रभुको दियो ओढ़ाय । हँसिकरत परस्पर मनके भाय ॥
यह कौतुक ब्रज बाढ़ो अपार । मिलि नाचत कूदत गोपी ग्वार ॥
लखि मोहिरहीं बहु देवनारि । ऐसो अद्भुत अचरज रस विहारि ॥
यह सुख अब कापै कहोजाय । सनकादिक नारद रहे लोभाय ॥
शुकदेव गुरू ने दियो दिखाय । चरणदास ध्यानमें रहो समाय ॥
ऐसे पारब्रह्म खेलत वसंत । कबहूं एक कबहूं अनन्त ॥
जैसे हाटक¹ एक भूषण अनेक । वरण वरण के धरत वेष ॥
टूटै गहना गल जो जाय । फिरि चाहै तौ फिरि बनाय ॥
आपही विष्णु ब्रह्मा महेश । आपहि धरती आप शेष ॥
आपहि सुर नर मुनिहिं जान । आप धरत अवतार आन ॥
आपहि रावण आपहि राम । आपहि कंसा आपहि श्याम ॥
आपन को चढ़िमारे आप । आप आपनको जपतजाप ॥
१ स्वर्णनाम ॥
शब्दवर्णन । ४५७
चरणदास इकंगी आपा देख । हरि कहियत हैं तेरे भेख ॥
शुकदेव दया ते पायो भेव । ताते आप अपन की लागो सेव ॥
वह वसन्तरै वह वसन्त ।
कोइ बिरला पावै वह वसन्त । जाकी अद्भुत लीला रँग अनन्त ॥
जहाँ झिलमिल झिलमिलहै अपार । जहाँ मोती बरषै निराधार ॥
जहाँ फूलन की लागी फोहार । जहाँ अनहद बाजै बहु प्रकार ॥
जहाँ ताल जु बाजै बिना हाथ । जहाँ शंख पखावज एक साथ ॥
जहाँ बिन पग घुंघुरूकी टकोर । जहाँ बिन मुख मुरली घनाघोर ॥
जहाँ अचरज बाजे और और । जहाँ चन्द सूर नहिं सांझ भोर ॥
जहाँ अमृत दरवै कामधेनु । जहाँ मान क्रोध नहिं मोह मैन ॥
जहाँ पांचौ इन्द्री एक रूप । जहाँ थकित भये हैं मन से भूप ॥
शुकदेव बतावैं ऐसो खेल । चरणदास करौ क्यों न वासों मेल ॥
खेलो राम नाम लै लै वसन्त । भक्ति करौ मिलि साधुसन्त ॥
मात पिता सुत दारा जान । सब स्वारथ के संगी पिछान ॥
तोहिं जनमत सबहिन घेरो आय । तैं आप अपनपौ दियो बँधाय ॥
श्वास निकसि रहिजाय देह । सब कुटुँब संघाती भरो गेह ॥
जब सबही मिलिकै तजैं नेह । कहैं वेगि निकासौ रही खेह ॥
कहैं खाट बिछौना द्यो निकास । अरुजारि देहु मुख लै हुतास ॥
ऐसे झूठे संग की कौन आस । ताते हरि भजिले तू हर¹ उसास ॥
इनसों पगो तजो हरिसों मीत । अपने भलेकी न करी चीत ॥
शुकदेव कहैं नर अजहुँ चेत । चरणदास तजौ क्यों न जगसों हेत ॥
मेरेसतगुरु खेलत निजवसन्त । जाकी महिमा गावत साधुसंत ॥
ज्ञान विवेक के फूले फूल । जहाँ शाखा योग अरु भक्ति मूल ॥
प्रेमलता जहँ रही झूल । सतसंगति सागर के कूल ॥
१ अर्थात् हर श्वास में ॥
४५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जहाँ भर्म उड़त है ज्यों गुलाल । अरु चोवा चरचै निश्चय बाल ॥
शील क्षमा को बरषै रंग । काम क्रोध को मान भंग ॥
हरि चरचा जित है अनन्त । सुनि मुक्त होत सब जीव जन्त ॥
आन धर्म सब जाहिं खोय । राम नाम की जै जै होय ॥
जहाँ अपने पिय को ढूंढ़ि लेव । अरु चरण कमल में सुरति देव ॥
कहैं चरणदास दुख द्वंद्व जाहिं । जब प्रियतम शुकदेव गहैं बाहिं ॥
खेलौ नित वसंत खेलौ नित वसंत । मिलि साधु संगमें नित वसंत
जहाँ फूल जु फूले चारि रंग । भक्ति ज्ञान अरु योग अंग ॥
रंग जु चौथा है विराग । विषय वासना देहु त्याग ॥
भँवर होय सूंघै जु कोय । जीवनमुक्ता कहिये सोय ॥
भय औ भ्रम सब छूटि जाय । आनँद पदमें रहे समाय ॥
चन्दन चरचा अति सुबास । महकरही हाँ आस पास ॥
जिहि सुगन्ध शीतलता होय । ताप तपन सबजाहिं खोय ॥
चरणदास हरिचरण माहिं । शीश दिये बहु पाप जाहिं ॥
प्रीतम सुख देवैं अनन्द । अरु काट निवारै सकल फन्द ॥
वह देश अटपटा बिकटपन्थ । कोइ गुरुमुख पहुँचे होय सन्त ॥
बहुत चले मग चाव चाव । औरन सों कहि आव आव ॥
हमहूं पहुंच तुम्हें दे बसाय । ऐसो जान्यो सुलभ दाय ॥
बहुतक तपसी कष्ट साध । बहुतक पण्डित पोथी लाद ॥
बहुतक झुण्डिते जटा धारि । चहुं ओर पावक जारि जारि ॥
बहुतक मुण्डित पूजा राखि । बहुतक भक्ता पिछली शाखि ॥
बहुतक योगी पवन जीति । हरि मिलिबे की करैं रीति ॥
कायर थाके बाट माहिं । कछु इक आगे चले जाहिं ॥
वे कनक कामिनी लिये घेरि । सो भी उनके पड़े फेरि ॥
१ झूठा वेष बनाने वाले ॥
शब्दवर्णन । ४५६
कोइ उनसे छुटकरि आगेजाय । जहाँ ऋद्धि सिद्धिलेवैं लगाय ॥
शुकदेव कहैं सब डारि आस । ह्वां प्रेमी पहुँचै चरणदास ॥
साधौ आतम पूजा करै कोय । जोई करै सोइ मुक्ता होय ॥
नेह नगर में बसै जाय । भवन सँवारै हित लगाय ॥
तामें सेवा धारै धार । आठ पहर करैं बारम्बार ॥
तन मन वचन सँभारि लेव । सम्मुख देखो अपना देव ॥
दया पुष्प माला बनाव । क्षमा शील चन्दन चढ़ाव ॥
लिये दीनता हाथ जोरि । सांचे रंग मन को बोरि ॥
घट घट प्रीतम राख मान । रस भंग न होवै सावधान ॥
प्रसन्नता सोइ धूप दीप । शुकदेव कहैं यों रहु समीप ॥
चरणदास हो सँग न छोर । कृष्णमयी लखु चहुँ ओर ॥
होरी राग धमारि ॥
मोहन चतुर सुजान मेरे घर होरी खेलन आयो हो ।
सखीरी पीत बसन पियरे आभूषण पीरो तिलक बनायो हो ॥
सखीरी लाल हिलाल गुलाल उड़ावत ग्वाल बाल सँग लायो हो ।
सखीरी करन अनेक सबके पिचकारी गावत नाचत धायो हो ॥
सखीरी आनि अचानक हरिने मेरे मुख चोवा लपटायो हो ।
सखीरी केशरि माहीं घोरि अरगजा मो तनपै ढरकायो हो ॥
सखीरी अपने हाथ सवाँरि पानदै हार हिये पहिरायो हो ।
सखीरी रीझ रिझा अरु भीज भिजाकर उर आनन्द बढ़ायोहो ॥
सखीरी मैं हूँ वाके जाय अचानक काजर नैन लगायो हो ।
सखीरी मुरली गहि पीताम्बर लैके नीलाम्बर जो ओढ़ायो हो ॥
सखीरी जासुखको ब्रह्मादिक तरसैं शेष पार नहिं पायो हो ।
सखीरी गोपी कहैं चरणदास श्यामकी सो सुख हमें दिखायो हो ॥
साध चलौ तुम संभारी । जग होरी मचि रही है भारी ॥
४६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दम्भ पाखण्ड गहे करमें डफ डूबड़ डूबड़की तारी ।
त्रैगुण तार तंबूरा साजे आशा तृष्णा गति धारी ॥
पाप पुण्य दोउ लै पिचकारी छूटत हैं बारी वारी ।
सम्मुख ह्वै करि जो नर खेलौ ताके चोट लगी 'कारी ॥
लोभ मोह अभिमान भरो है ले माया गागरि डारी ।
राजा परजा भोगी तपसी भीजि रहे हैं संसारी ॥
कुबुधि गुलाल डारि मुख मींजो काम कला पुटली मारी ।
युग युग खेलत यों चलि आई काहू ते नाहीं हारी ॥
जड़ चेतन दोउ रूप सवाँरे एक कनक दूजी नारी ।
पांच पचीसलिये सँग अबला हँसि हँसि मिलि गावत गारी ॥
चतुरा फगुवा दै दै छूटे मूरख को लागी प्यारी ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निर्गुण ज्ञान गली न्यारी ॥
होरी राग काफी ॥ ''
ज्ञानरंग हो हो हो होरी ॥
निहरूपी बहुरूप धरे हैं नाना भेष करोरी ।
देखन निकसी अपने पियाको समझ भवन की पौरी ॥
बुद्धि विचार शिंगार सजो है निश्चय माथे रोरी ।
जीवन्मुक्त हुलास बढ़ो है परगट खेल मचोरी ॥
खेलत खेलत आपन बिसरो लागी कौन ठगोरी ।
आपा खोजि रामहीं पाये मैं नाहीं निकसोरी ॥
चरणदास नहिंहरिही हरि हैं आपहि आप रहोरी ।
उपजै कौन कौन अब बिनशै बंध मुक्त केहि ठौरी ॥
होरी राग धनाश्री ॥
साधौ घूंघुट भर्म उठाय होरी खेलिये ॥
वेद पुराण लाज तजिबारी इनमें ना उरझैये ।
१ असर कर जानेवाली ॥
शब्दवर्णन । ४६१
शिर सों सकुच उतारि चदरिया पियसों रंग बढ़इये ॥
रूप न रेख न सूरति मूरति ताके बलि बलि जइये ।
अचल अजर अविनाशी सोई सम्मुख दरशन पइये ॥
सत चेतन आनन्द सदाही निर्भय ताल बजइये ।
पाप पुण्य की शंका त्यागो जहां मर्याद न पइये ॥
ओलो नीर विचारौ जैसे यों आपन विसरइये ।
चरणदास वासना तजिकै सागर बूंद समइये ॥
राग सोरठ ॥
हिलिमिलि होरी खेलि लईहो बालमां घर पाइया ।
पांच सखी पच्चीस सहेली आनंद मंगल गाइया ।
समझ बूझका चोवा चरचा भर्भगुलाल उड़ाइया ॥
दुई गई जब इच्छा कैसी खेलन सकल बहाइया ।
चरणदास बासना तजिकै सागर लहर समाइया ॥
होरी राग सोरठ ॥
कांसू खेलै को होरियां हो बालमनाहीं मैं नहीं ॥
अबिर गुलाल अरगजा नाहीं रंग नहीं गागर नहीं ।
ताल मृदंग झाँझ डफ नाहीं राग नहीं रागिनि नहीं ॥
फाग महीना वा घर नाहीं कन्थ नहीं कामिनि नहीं ।
चरणदास नहीं तब हरिकहुकैसो सबकुछ है और कुछ नहीं ॥
होरी राग धमारि ॥
आदिपुरुष अविगत अविनाशी नाना कौतुकै लावैरे ।
आपहि आप और नहिं कोई बहुतक रूप बनावैरे ॥
आपहि मोहनलाल ग्वालहो मुरली आनि बजावैरे ।
आपहि ब्रजकी बनिता होकर वनको दौरी आवैरे ॥
१ बर्फ २ खेल ॥
४६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आपहि गोपी कान्ह विराजै आपहि रासरचावैरे ।
अन्तर्द्धान होय फिर आपहिआपहि ढूंढ़न धावैरे ॥
आपहि व्याकुल अप देखनकूं लीला प्रेम बनावैरे ।
परगट होय सबन सुख देवै आपहि रंग बढ़ावैरे ॥
भोर भये जब खेल मचावै आप आप रहजावैरे ।
कबहुँ एक अनेक कभी हैं विधि निषेध गति भावै रे ॥
सत चित आनंद रूप सदाही शुकदेव हो समुझावैरे ।
चरणदास हो समझि समझिकरि आपहिआनंदपावैरे ॥
होरी राग धनाश्री ॥
साधौ बुद्धि विवेक सँभारि होरी खेलिये ॥
सांख्ययोग की युक्तिसों कीजै नित्यअनित्य विचार ।
माया सकल निवारिकैरे आतम रूप निहार ॥
पांचतत्त्व तीनों गुण परगट इनको दो दिन फाग ।
इकरस सत पद जानि लेरे ताहीसों मन पाग ॥
निश्चय चोवा लाइयेरे भर्म गुलाल उड़ाय ।
देह करमके रंगकीरे गागर दे ढरकाय ॥
जीवन मुक्त जु फगुवा पइये गुरुके चरणन लाग ।
जो कोई ऐसी होरी खेलै जाके ऊंचे भाग ॥
चरणदास कहैं शुकदेव बताई हमहूँ खेलैं जाग ।
प्रियतम प्रियतम जित तित देखे द्वेष गयो अरु राग१ ॥
सखीरी ततम२तले संग खेलिये रस होरी हो ।
निर्गुण निज निर्धार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी शील शृङ्गार सवांरिये रस होरी हो ।
दुविधा मानि निवार सरस रस होरी हो ॥
१ प्रेम २ ओंकार ॥
शब्दवर्णन । ४६३
सखीरी रहनी केसर घोरिये रस होरी हो ।
बहुरि न ऐसों बार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी सतगुण करि पिचकारि ले रस होरी हो
तमरजके भर मार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी गर्बगुलाल उड़ाइये रस होरी हो ।
मोह मटुकिया डारि सरस रस होरी हो ॥
सखीरी मिल मिल रंग लगाइये रस होरी हो ।
चंदन चरच विचार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी निश्चल सिन्धु समाइये रस होरी हो ।
रिमझिम झमक फुहार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी शून्य नगर में नृत्तिये रस होरी हो ।
अनहद झनक झिंगार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी सैन सुरति सों समझिये रस होरी हो ।
सोहंब्रह्म खिलार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी पांच पचीसौ रल मिले रस होरी हो ।
मंगल शब्द उचार सरस रस होरी हो ॥
सखीरी अलख पुरुष फगुवा लहो रस होरी हो ।
आपा आप बिसारि सरस रस होरी हो ॥
चरणदास रमइया रमि रह्यो रस होरी हो ।
दर्शो है फाग अपार सरस रस होरी हो ॥
गुरु दूती बिना सखी पीव न देखो जाय ।
भावै तुम जप तप करि देखो भावै तीरथ न्हाय ॥
पांच सखी पचीस सहेली अति चतुर अधिकाय ।
मोहिं अयानी जानिकै मेरो बालम लियो लुकाय ॥
वेद पुराण सबै जो ढूंढ़े सुरति स्मृति सब धाय ।
४६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आनि१ धर्म और क्रिया कर्म में दीन्हों मोहिं भर्माय ॥
भटकत भटकत जब मैं हारी चरण सखी गहे आय ।
शुकदेव साहब किरपा करिकै दीन्हो अलख लखाय ॥
देखतही सब भ्रम भय भागे शिरसूं गई बलाय ।
चरणदास जब प्रीतम पायो दर्शन किये अघाय ॥
हरि पीव पाइया सखी पूरण मेरे भाग ।
सुखसागर आनन्द में मैं नित उठि खेलूं फाग ॥
चोवा चन्दन प्रीतिकै सखी केशरि ज्ञान घसाय ।
पुहुप वाससूं जो वह झीनो ताके अंग लगाय ॥
बेरंगी के रंगसूं सखी गागर लई भराय ।
शून्य महल में जायकै सखी पियपर दई ढरकाय ॥
भरम गुलालजब कर लियो सखी बालम गयो दुराय ।
सतगुरुने अंजन दियो तब सम्मुख दरशे आय ॥
ताली लाई प्रेमकी सखी अनहद नाद बजाय ।
सर्वमयी पिय पायकै हम आनँद मंगल गाय ॥
रलमिल प्रियतम द्वै गये सखी दुईगई सब भाग ।
चरणदास शुकदेव दयासूं पायो अचल सुहाग ॥
मैं तो ह्वां खेलूंगी जाय जित मेरो पिया बसै ।
व्याधि उपाधि न संशयकोई आनंदहि आनंद लसै ॥
नितही फागुन एकरस होरी खंडित कबहुं न होय ।
मुक्ति पदारथ फगुवा पइये आपा सरवस खोय ॥
जिनके रसिया शिव ब्रह्मादिक खेलत चावहिचाव ।
ऋषिमुनिदेवत खेलत निशिदिन करिकरिबहुतकभाव॥
भाग बड़े उन्हीं के जानो वा पदलागे धाय ।
१ शपथ ॥