भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४४६
शुकदेव कहै चरणदास सों इनका मत कूराहो ।
ज्ञान मुक्ति जब पाइये मिलै सतगुरु पूराहो ॥ ॥
राग जैजैवन्ती ॥
गुरुबिन ज्ञान नाहीं तिमिर नशावै भाई ।
भरमत फिरै लोई जल और पाहन सोई बात नहीं बूझै
कोई तिनको बहधावै ॥ देवी और देव पूजै जहां कछु नाहीं
सूझै फेरि फेरि जावै दूजे तहां नहीं पावै । वैदकको भेद ठानै
जोतिष बिचारजाने काहूकी नाहि मानै करै मनभावै ॥ भूत
टोना जादू सेवै प्रभुका न नाम लेवै भक्ति में ना चित्त देवै गुण
नहिं गावै । श्रीशुकदेव कहै चरणदास होय रहै सोई मुक्तिधाम
लहै आपा जो उठावै ॥
राग गौरी ॥
सब जग भर्म भुलाना ऐसे ।
ऊंट कि पूंछसों ऊंट बँध्यो ज्यों भेड़ चालहै जैसे ॥
खरका शोक भूंस कूकुरकी देखा देखी चाली ।
तैसे कलुआ जाहिर भैरौ सेढ़ मशानी काली ॥
गाँवभूमि या हितकरि धावैं जाय बटाही दौरे ।
सद्दौ सरवर इष्ट धरतहैं लोग लुगाई बौरे ॥
राखै भाव श्वान गर्दभ को उनको ल्याय जिमावैं ।
ढेढ चमारन को शिरनावैं ऊंची जाति कहावैं ॥
दूध पूत पाथरसो मांगैं जाके मुख नहि नासा ।
लपसी पपड़ी ढेर करतहैं वह नहिं खावै मासा ॥
वाके आगे बकरा मारैं ताहि न हत्या जानैं ।
लै लोहू माथेसों लावैं ऐसे मूढ़ अयानैं ॥