भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
न्याव करें सीने की पूछें रक्खें सबको राजी ॥
जिसके फल दीदार कियेसे नादिर होय फ़कीर ।
मारे काल कलन्दर जबलो मनवा धरे न धीर ॥
ऐसा हो जब कमला होई तब कमाल पद पावे ।
साहब मिल साहब को दरसे ज्यों जलबूँद समावे ॥
ऐसा हो सोइ पीर कहावे मनी मान सब खोवे ।
चरणदास ज़मींपर रोशन पाय पसारे सोवे ॥
शब्द ॥
जीवत मरजाय उलट आपमें समाय मन कहीं को न
जाय जिन्ह ऐसी दिलगीरी है । करे बन बाग बास जानत जे
भूख प्यास मेटे पर आस उन्हें अतिहि सबूरी है ॥ परम तत्त्व
को विचार चिन्ता सब डार हरि रस मतवार पाई ऐसी
अमीरी है। कहै चरणदास दोऊ दीन में पुकार यार सबही
आसान एक मुशकिल फ़कीरी है ॥
राग बिलावल ॥
ऐसा हो दरवेशही जगको बिसरावै ।
ईमान सबूरी सांच सों सोई बकसा जावै ॥
ज़न ज़र और ज़मीन को दिलमें नहिं लावै ।
फ़िक्र फ़कीरी को बुरा वह ज़िक्र छुटावै ॥
फ़ेफ़ाकेका गुण यही राज़क करै यादा ।
काफि कनाअत सुखघना आनन्द अगाधा ॥
रे रीयाज़त वलवान है हरि को अपनावै ।
आखिर को दीदार ही निश्चय करि पावे ॥
एज्ज़द को धारेरहै रहै सब सों नीचा ।