भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
मुक्त पंथकी ओरहि सूबीको चला ।
तैसे व्रत परिजाय जु नट भूला कला ॥
गिरा धरणि पर आय भया तन चूर है ।
जो कोई ऐसा होय बड़ाही कूर है ॥
जैसे वृक्ष ते टूटि' बिगड़ि फल जात है ।
ऐसे गुरुते छूटि कछू न रहात है ॥
द्रुमहीं सों लगि रहा जु फल नीको भया ।
पका भलीही भांति धनी के कर गया ॥
यहीं समझ गुरु संग कबौं नहिं त्यागिये ।
मनमें निश्चय लाय शरणहीं लागिये ॥
सब तन अंगन माहिं दीनता छाइये ।
गुरुके चरण निहारिकै शीश नवाहिये ॥
दोनों करको जोरिकै अस्तुति कीजिये ।
दर्शनकरि सुखपायकै शिक्षा लीजिये ॥
श्रीशुकदेव दयाल ने मोसों यों कही ।
चरणदास शिष जानिकै ऐसा हो सही ॥
राग सोरठ ॥
समझ रस कोइक पावै हो ।
गुरु बिन तपन बुझै नहीं प्यासा नर जावैहो ॥
बहुत मनुष ढूंढ़त फिरैं अँधरे गुरु सेवैहो ।
उनहूं को सूझै नहीं औरन कहँ देवैहो ॥
अँधरेको अधरा मिला नारी को नारीहो ।
ह्वां फल कैसे होयगा समझैं न अनारीहो ॥
गुरू शिष्य दोउ एक से एकै व्यवहाराहो ।
गये भरोसो डूबिकै वे नरक मँझाराहो ॥