भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४४७
शुकदेव कही चरणदास सों पावै पद ऊंचा ॥
वह वैरागी जानिये जाके राग न द्वेष ।
निर्द्वध ह्वै जग में फिरै चाहै सिद्ध न मोक्ष ॥
पांचन को एकै कर आनँद में रोक ।
त्रैगुण ते ऊपर बसै जहां हर्ष न शोक ॥
मन मूड़ै तन साध कै बाधा सब डार ।
तत्त्व तिलक माथे दिये शोभा अपरम्पार ॥
माला श्वास उसासकी हिरदय अस्थान ।
अलख पुरुषसों नेहरा त्रिकुटी मध्ये ध्यान ॥
काम क्रोध मोह लोभ ना यही नेम अचार ।
शुकदेव कही चरणदास सों करै ब्रह्मविचार ॥
राग सोरठ व बिलावल ॥
जो नर इतके भये न उतके ।
उतको प्रेम भक्ति नहिं उपजी इत नहिं नारी सुतके ॥
घरसों निकसि कहा उन कीन्हो घर घर भिक्षा मांगी ।
बाना सिंह चाल भेंड़नकी साधु भये अकि स्वांगी ॥
तन मूड़ा पै मन नहिं मूड़ा अनहद चित नहिं दीन्हा ।
इन्द्री स्वाद मिले विषयनसों बकबक बकबक कीन्हा ॥
माला करमें सुरति न हरिमैं यह सुमिरण कहु कैसा ।
बाहर वेष धारके बैठे अन्तर पैसा पैसा ॥
हिंसा अकस कुबुधि नहि छोड़ी हिरदय सांच न आया ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं बाना पहिरि लजाया ॥
राग मंगल ॥
महामूढ़ अज्ञान भक्ति में क्या करा ।
गुरु सों बेमुख होय बड़ापन चितधरा ॥