भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैसे सिंह गऊतन धारो कपटरूप प्रकटायो ।
धोखाखाय पशू आ निकसो पंजा ताहि चलायो ॥
सुन्दररूप महा बगलेको एक टांग जल ध्यान ।
मनमें आशा मीन गहनकी कहां मिलैं भगवान ॥
गुरु शुकदेव बतायो मोको भीतर बाहर शुद्धि ।
चरणदास वा हरि जन जानौ ताकी है ब्रह्म बुद्धि ॥
राग केदार ॥
छले सब कनक कामिनि रूप ।
सुर असुर अरु यक्ष गंध्रब इन्द्र आदिक भूप ॥
सावित्री वश कियो ब्रह्मा पार्व्वती त्रिपुरारि ।
लीला कारण लक्ष्मी संग हरि लियो अवतार ॥
रावणसे अति बली मारे मौत जिन वश कीन ।
पशु नरनकी कौ चलावै एतौ अति आधीन ॥
रूप रस में दे धतूरा मोह फांसी डार ।
तप कि पूंजी छीनिकै कियो श्रृङ्गीऋष को ख्वार ॥
माया ठगिनी ठगे सबही बचे गुरु शुकदेव ।
रणजिता कोइ ऊबरो करि दास चरणन सेव ॥
राग सोरठ ॥
साधौ होनहार की बात ।
होत सोई जो होनहार है कापै मेटी जात ॥
कोटि सयानप बहुविधि कीन्हे बहुत तके कुशलात ।
होनहार ने उलटी कीन्ही जल में आगि लगात ॥
जो कछु होय होतव्यता भोंड़ी जैसी उपजै बुद्धि ।