भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४५१
साखि सुदामा की सुनौ दइ विभव अपारी ॥
जगत बड़ाई जो चहै सुमिरौ यदुनाथा ।
नीच बहुत ऊंचे भये जगनायो माथा ॥
जो सिधहू वोही चहै करि-हरि हिय ध्याना ।
सिद्धि परापत होहिगी चढ़ि है परमाना ॥
चरणदास हूवो चहै भजिले भगवाना ।
कहैं गुरू शुकदेवजी होय मुक्त निदाना ॥
राग विहागरा ॥
साधो निन्दक मित्र हमारा ।
निन्दकको निकटे ही राखौं होन न देऊं न्यारा ॥
पाछे निन्दाकरि अघधोवैं सुनिमन मिटै विकारा ।
जैसे सोना तापि अग्निमें निर्मल करै सोनारा ॥
घन अहरन कसहीरा निबटै कीमत लक्ष हजारा ।
ऐसे यांचत दुष्टसन्तको करन जगत उजियारा ॥
योग यज्ञ जप पाप कटनहित करै सकल संसारा ।
बिन करणी मम कर्म्म कठिन सब मेटै निन्दक प्यारा ॥
सुखीरहौ निन्दक जगमाहीं रोग न हो तनसारा ।
हमरी निन्दा करनेवाला उतरै भवनिधि पारा ॥
निन्दक के चरणों की अस्तुति भाषौं वारंवारा ।
चरणदास कहैं सुनियो साधौ निन्दक साधक भारा ॥
राग सारंग ॥
अरे नर कहाकियो तुम ज्ञान ।
गई न हिंसा कुबुधि बड़ाई राग द्वेष की आन ॥
प्रभुताई को क्षण क्षण दौरै प्रभुको ना क्षण एक ।
अन्तर भोग जगतके प्यारे बाहर साधूवेष ॥