भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
कहैं कि हमरे बालक ज्यावो बड़ी आयुबल दीजै ।
उनके आगे बिनती करतैं अँसुवन हिरदय भीजै ॥
भोपे भरड़े के पग लागैं साधुसन्त की निन्दा ।
चेतन को तजि पाहन पूजैं ऐसा यह जग अन्धा ॥
सतसंगतिकी ओर न झांकैं भक्ति करत सकुचावैं।
चरणदास शुकदेव कहत हैं क्यों न नरक को जावैं ॥
अरे नर क्या भूतन की सेवा ।
दृष्टि न आवै मुख नहिं बोलै ना लेवा ना देवा ॥
ज्यहि कारण घीज्योति जलावैं बहु पकवान बनावैं।
सो खच्चैं तू अधिक चावसों वह स्वप्ने नहिं खावैं ॥
राति जगावैं भोपा गावैं झूंठै मूड़ हलावैं ।
कुटुंब सहित तोहिं पैर परावैं मिथ्या वचन सुनावैं ॥
ताहि भरोसे जन्म गवाँवैं जीवत मरत न साथा ।
बड़भागन नर देही पाई खोवैं अपने हाथा ॥
चारि वरण में मैली बुधिका ऊंचनीच किन होई ।
जो कोइ झूंठी आशाराखै अगत जायगा सोई ॥
ताते सत विश्वास टेकगहु भक्ति करौ हरिकेरी ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं होय मुक्तिगति तेरी ॥
राग बिलावल ॥
सब सुखदायकहैं हरी मूरख नहिं जानै ।
मनमें धरि धरि कामना औरनको मानै ॥
जौ चाहै सन्तान को जप लालविहारी ।
सुन्दर बालक होहिंगे घरके उजियारी ॥
जो चाहै तू धनधना सेव कृष्ण मुरारी ।