भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४३६
नेम नोन सेंधकी नीकी सी डलीं ॥
हित के बर्तन माहीं तिन्हें भिजोयके ।
परमप्रेम जल तामें डारि समोयदे ॥
शील शिलापर पीसो छानि उमंगसों ।
पीवतही सब रोग नशेंगे अंगसों ॥
शुद्ध सुदर्शन चूर्ण हैगो स्वादही ।
ताके पाये जाय जगत की ब्याधही ॥
दया क्षमा सन्तोष यही माजून है।
होय अधिक आनन्द तत्त्व पदको लहै ॥
गुरु शुकदेव बतावैं औषध सार है।
चरणदास जो खाय कष्ट कोइ ना रहै ॥
राग धनाश्री ॥
मन में दीरघ भये विकारा ।
सतगुरु साहव वैद मिले बिनु कटै न रोग अपारा ॥
त्रैगुण के त्रैदोष पगो है काम क्रोध ज्वर जारा ।
तृष्णा वायु उठी उर अन्तर डोलत द्वारहि द्वारा ॥
विषय वासना पित कफ लागो इन्द्रिन के सुखसारा ।
सत्संगति रस करवा लागे करत न अङ्गीकारा ॥
सत पुरुषन को कहा न मानै शील क्षमा नहि धारा ।
रसना स्वाद तजौ नहिं मूरुख आपन पौ न सँभारा ॥
चरणदास शुकदेव मिले जब औषध ज्ञान विचारा ।
तनमनको सब रोग मिटायो आवागमन निवारा ॥
राग केदारा ॥
भाई रे विषमज्वर जग व्याधि ।
गुरू हमारे दई औषध खाय रहनी साधि ॥
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