भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो कछु तेरे रोग सो देहुं बतायकै ॥
महापाप की ताप चढ़ी तोहिं धायकै ।
संशयको सनिपात मिल्यो है जायकै ॥
विषय विषय ज्वर रह्यो जु हिये समायकै ।
तृष्णाकी बहु प्यास रही मन भायकै ॥
सतसंगति को पक्ष कबौं नाहीं कियो ।
इन्द्रिन के रस रोग बिगरि सबही गयो ॥
कुसतसंग संग्रहणी जियमाहीं भई ।
ममताको मल बढ़ो भूख ताते गई ॥
काम क्रोधकौं कुष्ठ सकल तन छायकै ।
शोक शूलको मूल करेजे आयकै ॥
माया पवन झकोरसों सूजन बहुत है ।
त्रैगुणके त्रयदोष बात बहकी कहै ॥
चिन्ताही की चीस उठै दिन रातही ।
अतिनिन्दा से नींद गई ता साथही ॥
शीश गुमान पिराय दरद हिंसा घनो ।
कलह कल्पना भर्मसों रहतो उनमनो ॥
औरौ बड़ी उपाधि बढ़ै तेरी देहमें ।
भीजि रह्यो है शरीर पसेव सनेह में ॥
इन रोगनकी औषध देहुँ सुनायकै ।
भिन्न भिन्न मैं कहौं तोहिं समुझायकै ॥
कर्म्म करेजवा तोड़िकै सत्य गिलोयले ।
जत्तही की अजवायन आनि मिलोयदे ॥
चित्त चिरायता न्याय पीत पीपर भली ।