भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सखी सजनी हे गगन मण्डल पगधार ।
अरी बौरी पीय मिलै दुख सब हरैंजी ॥
सखी सजनी हे निर्गुण सेज विछाव ।
अरी बौरी हिलि मिलिकै रँगमानिये जी ॥
सखी सजनी हे पावैगी अटल सुहाग ।
अरी बौरी अजर अमर घर निर्मलेजी ॥
सखी सजनी हे गुरु शुकदेव अशीश ।
अरी बौरी चरणदास मनसा फलै जी ॥
भागीसाथन हे इह भूलैरी मतभूल ।
अरी हेली भर्म भूमि या देशकीजी ॥ भागीसाथनहे ।
बदला मायाकोरी रूप अरी हेली कुमति बूंदजित तित परैंजी ॥
भागीसाथनहे । कर्म वृक्षकीरी बेलि अरी हेली बारी फल लगि
विष भरेजी ॥ भागीसाथनहे । दुर्मति हरी हरी दूब अरी हेली
छलरूपी फूले फूल हैं जी ॥ भागीसाथनहे । त्रैगुण बोलत मोर
अरी हेली दम्भ कपटबकुला फिरैंजी ॥ भागीसाथनहे । पाप
पुण्य दोउ खम्भ अरी हेली नाग¹ स्वर्ग झोटा लगैजी ॥ भागी
साथनहे । मैं मेरी बँधी डोर अरी हेली तृष्णापटरी जित धरी
जी ॥ भागीसाथनहे । झूलत चावहि चाव अरी हेली नर नारी
सब भुलईंजो ॥ भागीसाथनहे । तपसी योगी गये झूल अरी
हेली फल चाहत अरु कामनाजी ॥ भागीसाथनहे । आशा
झुलावत नारि अरी हेली पांच पचीस मिलि गावईंजी ॥ भागी
साथनहे । या जगमें ऐसी भूल अरी हेली चरणदास झूलत
बचैजी ॥ भागीसाथनहे । इत तजि उतकोरी चाल अरी हेली
अमरनगर शुकदेव के जी ॥
१ पाताल ॥