भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४४५
राग बरवा ॥
साधौरी संगत भवँरा दुर्लभ पइये लीजैजी तन मन
भौँराजी । जी मानै साधौरी संगत भवँरा प्यारीही लागै
आदि अनादी भवँरा कौने लखावै अपने सतगुरुजी संतोष
भवँराजी । जी मानै नरक निवारण सतगुरु प्यारोही लागै ॥
आपसकी चर्चा भवँरा कौने सुनावै अपने गुरु भाईजी संतोष
भवँराजी । जी मानै गुरुका तौ छोना भई या प्यारोही लागै ॥
आछे आछे लक्षण भवँरा कौने जुलावै अपने रहनीजी
संतोष भवँराजी । जी मानै कर्म छुटावन रहनी प्यारीही
लागै ॥ आछे आछे परचा भवँरा कौने दिखावै अपनी मुक्ति
संतोष भवँराजी । जी मानै काया जीतावन करणी प्यारीही
जागै ॥ आछी आछी वाणी भवँरा कौने उठावै अपने अन-
भैजी संतोष भवँराजी । जी मानै बुधिकी तौ मांजन अनभै
प्यारीही लागै ॥ चरणदास को तुरिया भवँरा कौने बसावै
अपने शुकदेवजी संतोष भवँराजी । जी मानै सिरका तौ
छत्तर शुकदेव प्यारोहो ॥
राग बिलावल ॥
अजब फकीरी साहबी भागनसौं पइये ।
प्रेमलगा जगदीश का कछु और न चहिये ॥
राव रंककौ सम गिनै कछु आशा नाहीं ।
श्राठ पहर सिमटे रहैं अपनेही माहीं ॥
वैर प्रीति उनके नहीं नहिं वाद विवादा ।
रूठे से जगमें रहें सुनैं सु अनहद नादा ॥
जो बोलै तौ हरिकथा नहिं मौनै राखैं ।
मिथ्या करुवा दुर्वचन कबहूं नहिं भाखैं ॥