भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४४१
अरी बौरी नीर गरम करि न्हाइयेजी ॥
सखी सजनी हे योग उबटनो लगाव ।
अरी बौरी कर्म को मैल उतारियेजी ॥
सखी सजनी हे करणी कंगही बहाव ।
अरी बौरी वेणी मुक्ति गुंधाइये जी ॥
सखी सजनी हे गुरूके चरण चितलाव ।
अरी बौरी सतसंगति पग लागियेजी ॥
सखी सजनी हे लाज सिंदुर निकासि ।
अरी बौरी खोलि शिंगार बनाइयेजी ॥
सखी सजनी हे नवधा भूषण धार ।
अरी बौरी जासों पिया रिझाइयेजी ॥
सखी सजनी हे प्रीति को काजल आंज ।
अरी बौरी प्रेम की मांग सँवारियेजी ॥
सखी सजनी हे बुधि बेसरि सजिलेहि ।
अरी बौरी पान विचारि चबाइयेजी ॥
सखी सजनी हे दया कर मेहँदी लगाव ।
अरी बौरी सांचो रंग न उतरैजी ॥
सखी सजनीं हे धीरज चूनरि लाल ।
अरी बौरी नख शिख शील शिंगारियेजी ॥
सखी सजनी हे काम क्रोध तजि लोभ ।
अरी बौरी मोह पीहर सों जिन करौजी ॥
सखी सजनी हे पांच सहेली साथ ।
अरी बौरी इनको संग न लीजियेजी ॥
सखी सजनी हे चालौ पियाकेरे पास ।
अरी बौरी सुपमन बाट सोहावनीजी ॥