भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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अपने ही परकाश में आप रहा परकास ॥
राग हिंडोलना ॥
झूलत गुरुमुख सन्त अलख हिंडोलने ।
नाभि भृकुटी खंभ रोपे सोहं डोरी लाय ।
सुरति पटरी बैठि सजनी क्षण आवै क्षण जाय ॥
मन मनसा दोउ लगे झूलन धारणालै संग ।
ध्यान झोटे देत सजनी भलो लागो रंग ॥
सखिसहेलीं सिमिटि आईं पींग पींगन नेह ।
बूंद आनंद सब भिगोई सघन बरसै मेह ॥
चार वाणी खड़ी गावें महारँगीली नार ।
मुक्तिचारौ मालिनी जहाँ गुहि गुहि लावैं हार ॥
त्रिगुण बकुला उड़न लागे देखि बादल लै ।
संग पियके सदा झूलैं ताते लागै न भै ॥
चरणदास को नित झुलावैं ईश झुलैं शुकदेव ।
शिवसनकादिक नारद झूलैं करि करि गुरुकीसेव ॥
अथ सर्वअंग ॥
राग मंगल ॥
मन रोगी भयो पिंग कि कुबुधि विकार सों ।
बढ़ी व्यथा अपार लोभ के भारसों ॥
कर्म्म भरो मतिहीन छील छलसों छयो ।
पांच पचीसौ घेरि मोह मदने दह्यो ॥
कैसे यह दुखजाय कि पूँछन को चल्यो ।
तब पूरण गुणवन्त वेद सतगुरु मिल्यो ॥
करगहि कियो विचार कह्यो समझायकै ।