सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 485

४४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जीव दया अरु शीलता नखशिख सों धारैं ।
पांचौ चेले वश करें मन सों नहिं हारैं ॥
दुख सुख दोनों के परे आनँद दरसावै ।
जहां जाय अस्थल करें माया पवन न जावै ॥
हरिजन हरिके लाड़िले कोइ लहै न भेवा ।
शुकदेव कही चरणदाससों करि तिनकी सेवा ॥
( फुटकर पद )
राग परभाती ॥
और ख्याल सब छाड बावरे गोविंद के गुन गावरे ॥
श्रीहरिकथा सुनी नहिं कबहीं चाले जन्म गुमावरे ।
बिनाभक्ति चौरासी लखमें फिर फिर गोते खावरे ॥
सत्संगत की नाव बैठके उतर चलो दरियावरे ।
पैली पार मिलें हरि प्रीतम ज्ञानकी बल्ली लगावरै ॥
नौधाभक्ती करो कृष्णकी अनहद ताल बजावरै ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं जोतिमें जोति मिलावरै ॥
गज़ल ॥
मुझे कृष्ण के मिलने की आरज़ू है ।
शबो रोज दिल में यही जुस्तजू है ॥
नहीं भाती है मुझको बातें किसी की ।
सुनी जब से उस यार की गुफ्तगू है ॥
नहीं मुजको मतलब जहाँ में किसी से ।
चुभा जबसे दिलमें सनम खूबरू है ॥
जो आशक़ है उसका नहीं उस्से ग़ाफ़िल ।
तड़पता अज़ल से खड़ा रूबरू है ॥
शराबे मुहब्बत पिई जिसने, यारो ।