भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जीव दया अरु शीलता नखशिख सों धारैं ।
पांचौ चेले वश करें मन सों नहिं हारैं ॥
दुख सुख दोनों के परे आनँद दरसावै ।
जहां जाय अस्थल करें माया पवन न जावै ॥
हरिजन हरिके लाड़िले कोइ लहै न भेवा ।
शुकदेव कही चरणदाससों करि तिनकी सेवा ॥
( फुटकर पद )
राग परभाती ॥
और ख्याल सब छाड बावरे गोविंद के गुन गावरे ॥
श्रीहरिकथा सुनी नहिं कबहीं चाले जन्म गुमावरे ।
बिनाभक्ति चौरासी लखमें फिर फिर गोते खावरे ॥
सत्संगत की नाव बैठके उतर चलो दरियावरे ।
पैली पार मिलें हरि प्रीतम ज्ञानकी बल्ली लगावरै ॥
नौधाभक्ती करो कृष्णकी अनहद ताल बजावरै ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं जोतिमें जोति मिलावरै ॥
गज़ल ॥
मुझे कृष्ण के मिलने की आरज़ू है ।
शबो रोज दिल में यही जुस्तजू है ॥
नहीं भाती है मुझको बातें किसी की ।
सुनी जब से उस यार की गुफ्तगू है ॥
नहीं मुजको मतलब जहाँ में किसी से ।
चुभा जबसे दिलमें सनम खूबरू है ॥
जो आशक़ है उसका नहीं उस्से ग़ाफ़िल ।
तड़पता अज़ल से खड़ा रूबरू है ॥
शराबे मुहब्बत पिई जिसने, यारो ।