भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रेख जहाँ नहिं खिंचि सकैरे अरे हेला राई ना ठहराय ।
लेप जहाँ नहिं चढ़िसकै सकै नहिं कोइ पाय ॥
नहीं दूर निकटौ नहींरे अरे हेला नहीं प्रगट नहिं गूप ।
गुरु कृपा सो पाइये सुन्दर बहुत अनूप ॥
है अडोल डोलै नहीं रे अरे हेला है अबोल नहिं वोल ।
देशकाल सों रहित है और कहा कहूँ खोल ॥
जैसा था सोइ आज है रे अरे हेला नया पुराना नाहिं ।
जासों यह जग है भरो जग वाही के माहिं ॥
शक्ति घनी लीला घनी रे अरे हेला घने नाम बहुरूप ।
त्रै देवा से बहुत हैं इन्दर से बहु भूप ॥
चन्द्र घने सूरज घनेरे अरे हेला घने पिण्ड ब्रह्माण्ड ।
सब कुछ आपहि है रह्यो निर्मल अचल अखण्ड ॥
जनक दियो शुकदेवकोरे अरे हेला उनमोको कहिदीन ।
दरश भयो चरणदास को सदा रहौं लवलीन ॥
अचरज अलख अपार हेला वाकी गति नहिं पाइये ।
बहु निषेध जोपै करे रे अरे हेला तौ जावैगा हार ॥
बानीथकि बुधिहू थकैरे अरे हेला अनभय थकि थकि जाय ।
ब्रह्मादिक सनकादिकहू नारद थकि गुण गाय ॥
वेद थके अरु व्यासहुरे अरे हेला ज्ञानी थके अरु ज्ञान ।
शंकर से योगी थके करि करि निर्मल ध्यान ॥
बहुतक कथि कथिही गयेरे अरेहेला नेक न निबटी बूझ ।
वाचक ज्ञानी कहत हैं हमने पायो सूझ ॥
पांचौ इन्द्रियनसों लखैरे अरे हेला ताको सांच न मानि ।
जो जो इन सों देखिये तिनकी निश्चय हानि ॥
गुरु शुकदेव सुनावई रे अरे हेला समझ चरणहीं दास ।