भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
अथ अमरलोकअखण्डधामवर्णन ॥
दो०-प्रणमों श्री शुकदेव को, सो हैं गुरू दयाल ।
काम क्रोध मोह लोभ से, काढ़े मेरे साल ॥
वाणी विमल प्रकाश दी, बुधि निर्मल की तात ।
मोहि मूरख अज्ञानको, नहिं आवत ही बात ॥
अमरलोक वर्णन करों, वेही करं सहाय ।
दृष्टिहिये मम खोलिकरि, सबही देहिं दिखाय ॥
भेद लियो गुरुदेव सों, अद्भुत रचौं ग्रन्थ ।
साखी वेद पुराण मैं, जानी सुनियो सन्त* ॥
भेद अगोचर कोइकोइ जानै । गुरू दिखावै तौ पहिंचानै ॥
पता कहैं कछु वेद पुराना । ज्योंका त्यों उनहूं न बखाना ॥
कछु कछु मत मारगहू भाखैं । फिरि भूलैं समुझैं नहिं साखैं ॥
हरि कृपा प्रकट मैं गाया । किया उजागर खोलिदिखाया ॥
दो०-महा कठिन दुर्लभ हुता, अमरलोक का भेद ।
ताको मैं बीजक कियो, भाषो भेद अभेद ॥
निराकार तौ ब्रह्म है, माया है आकार ।
दोनों पदही को लिये, ऐसा पुरुष निहार ॥
माया जीव दोउ ते न्यारा । सो निज कहिये पीव हमारा ॥
क्षर अक्षर निहअक्षर तीनो । गीता पढ़ि सुनि इनको चीन्हौं ॥
गीता अक्षर जीव बतावै । क्षरमाया सोइ दृष्टि दिखावै ॥
निहअक्षर है पुरुष अपारा । ज्ञानी पण्डित ल्योह विचारा ॥
जीवआतम परमातम दोऊ । परमातम जानत हैं कोऊ ॥
आतम चीन्हि परमातम चीन्हो । गीतामध्य कृष्ण कहि दीन्हो ॥
प्रथमपाठ *- सत्य ।
१६ स्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माया उपजै विनशै अतिही । चेतन ब्रह्म अमरहै नितही ॥
पारब्रह्म पुरुषोत्तम जानो । चरणदास के सो मन मानो ॥
दो०-अमरलोक बिच पुरुषहै, ब्रह्म जु सबके माहिं ।
माया दरशत है सबै, ब्रह्म दीखतै नाहिं ॥
अब सुन अमरलोक की वानी । त्रैगुण रहित परम सुखदानी ॥
तेज पुंजके ऊपर राजै । अहंविराट सो बाहर गाजै ॥
ताको ज्योति कहत नरलोई । तेजपुंज कहियत है मोई ॥
सूरज मण्डल ताहि बतावै । जोगी जोग जुगत सों पावै ॥
सूरज मण्डल जैहैं चीरा । वालोकै कोइ पैहैं वीरा ॥
कोटिभानु कोसो उजियारो । तेज पुंजको रूप विचारो ॥
तीनि लोकसों बाहर होई । सात भवन सों बाहर सोई ॥
ताके ऊपर अविचल लोका । पापपुण्य दुख सुख नहिं शोका ॥
काल न ज्वाल अवधि नहिं होई । रनजीतदास जहाँ सुरतिसमोई ॥
महाअगोचर¹ गुप्तसों गुप्ता । जहां विराजत हैं भगवंता ॥
अमरलोक गौ लोक कहावै । चौथा पद निर्वान बतावै ॥
अगमपुरी बेगमपुर ठाऊं । कहा बुद्धिसों सब गति गाऊं ॥
कंछुइक वरणि बताऊं वाको । ब्रह्मासुत सतजुग में भाषो ॥
पुहुपद्वीप है श्वेत अकारा । सब ब्रह्माण्डनसूं है न्यारा ॥
जो कोइ जाय बहुरि नहिं आवै । आवागमन सकल बिसरावै ॥
जो कोइ गयो बहुरि नहिं आयो । देही दिव्यरूप अति पायो ॥
सोलह बरष उमर नित रहै । अजर अमर निधि आनँद लहै ॥
बूढ़ा बाला होय न तरुणा । षोड़श भानुरूप जहाँ धरणा ॥
तत्त्वस्वरूपी काया पावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
१ देखने में न आवै ॥
अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १७
पांचतत्त्व विनहै थिरथायो । ना वह वन्यो न कृत्यवनायो ॥
ओर छोर कछु दीखत नाहीं । कवसौं है और कवसों नाहीं ॥
है अडोल मर्जाद न ताकी । वेपरमान वेद यों भाषी ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । कछू कछू धरिध्यान वतावै ॥
अनन्तभानु के सो उजियारो । पिण्ड ब्रह्माण्ड दोउते न्यारो ॥
लोकमध्य अविचल निजधामा । श्वेतरूप अगमपुर नामा ॥
अगमपुरी निरधारा सूची । हंसलहैं जिनकी मति ऊंची ॥
वेहद लोक वन्यो अतिभारी । असंख्यभानु कीसी उजियारी ॥
दो० हद्दकहूँ तौ है नहीं, वेहद कहूँ तौ नाहिं ।
ध्यान स्वरूपी कहतहौं, वैन सैन के माहि ॥
अतिउज्ज्वल रवि दृष्टिन ठहरे । मणि हीरा लागे जहाँ गहरे ॥
कई रङ्गके हीरा भाखे । कलश कँगूरा स्थिरराखे ॥
ताभीतर वहु द्रुम* अशोगा । अक्षयवृक्ष फललगे
१६ स्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माया उपजै बिनशै अतिही । चेतन ब्रह्म अमरहै नितही ॥
पारब्रह्म पुरुषोत्तम जानो । चरणदास के सो मन मानो ॥
दो०-अमरलोक बिच पुरुषहै, ब्रह्म जु सबके माहिं ।
माया दरशत है सबै, ब्रह्म दीखतै नाहिं ॥
अब सुन अमरलोक की बानी । त्रैगुण रहित परम सुखदानी ॥
तेज पुंजके ऊपर राजै । अहंविराट सो बाहर गाजै ॥
ताको ज्योति कहत नरलोई । तेजपुंज कहियत है सोई ॥
सूरज मण्डल ताहि बतावै । जोगी जोग जुगत सों पावै ॥
सूरज मण्डल जैहैं चीरा । वालोकै कोइ पैहैं वीरा ॥
कोटिभानु कोसो उजियारो । तेज पुंजको रूप विचारो ॥
तीनि लोकसों बाहर होई । सात भवन सों बाहर सोई ॥
ताके ऊपर अविचल लोका । पापपुण्य दुख सुख नहिं शोका ॥
काल न ज्वाल अवधि नहिं होई । रनजीतदास जहाँ सुरतिसमोई ॥
महाअगोचर¹ गुप्तसों गुप्ता । जहां विराजत हैं भगवंता ॥
अमरलोक गौ लोक कहावै । चौथा पद निर्वान बतावै ॥
अगमपुरी बेगमपुर ठाऊं । कहा बुद्धिसों सब गति गाऊं ॥
कछुइक बरणि बताऊं वाको । ब्रह्मसुत सतजुग में भाषो ॥
पुहुपद्वीप है श्वेत अकारा । सब ब्रह्माण्डनसूं है न्यारा ॥
जो कोइ जाय बहुरि नहिं आवै । आवागमन सकल बिसरावै ॥
जो कोइ गयो बहुरि नहिं आयो । देही दिव्यरूप अति पायो ॥
सोलह बरष उमर नित रहै । अजर अमर निधि आनँद लहै ॥
बूढ़ा बाला होय न तरुणा । षोडश भानुरूप जहाँ धरणा ॥
तत्त्वस्वरूपी काया पावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
१ देखने में न आवै ॥
अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १७
पांचतत्त्व विनहै थिरथायो । ना वह बन्यो न कृत्यबनायो ॥
ओर छोर कछु दीखत नाहीं । कबसों है और कबसों नाहीं ॥
है अडोल मर्याद न ताकी । वेपरमान वेद यों भाषी ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । कछू कछू धरिध्यान बतावै ॥
अनन्तभानु के सो उजियारो । पिण्ड ब्रह्मण्ड दोउते न्यारो ॥
लोकमध्य अविचल निजधामा । श्वेतरूप अगमपुर नामा ॥
अगमपुरी निरधारा सूची । हंसलहैं जिनकी मति ऊंची ॥
बेहद लोक बन्यो अतिभारी । असंख्यभानु कीसी उजियारी ॥
दो० हदकहूँ तौ है नहीं, बेहद कहूँ तौ नाहिं ।
ध्यान स्वरूपी कहतहौं, बैन सैन के माहि ॥
अतिउज्ज्वल रवि दृष्टिन ठहरे । मणि हीरा लागे जहाँ गहरे ॥
कई रङ्गके हीरा भाखे । कलश कँगूरा स्थिरराखे ॥
ताभीतर बहु द्रुम* अशोगा । अक्षयवृक्ष फललगे निरोगा ॥
कल्पवृक्ष बहुरंग विरङ्गा । फल ओर पात फूल इक सङ्गा ॥
कोमलदल शोभा अतिभारी । अजर पुरुप दर्शन अधिकारी ॥
चेतनरूप गहर अतिछाहीं । साधु रहत तिनकी परछाहीं ॥
षोड़श भानु सम देह स्वरूपा । हरिरस मदमाते निधिरूपा ॥
उन वृक्सनके निचनिच मंदिर । अनगिन महल महामठ सुन्दर ॥
महलमहलपर ध्वजा पताका । पुरुपोत्तमपुरुप†नामलिखिराखा॥
ध्वजा पाताका लहरत ऐसे । खिमत वीजुरी बहुतक जैसे ॥
रतन जटिल तिनकी अँगनाई । बैठत उठत चलत हरषाई ॥
काम क्रोध नहिं लोभ अधीरा । निर्मल दिशा शील गुणधीरा ॥
जहां न आलस नींद जँभाई । भूखप्यास मलता नहिं भाई ॥
मैल पसीना आंसू नाईं । दिव्य देहधरि रहे गुमाईं ॥
प्रथमपाठ* द्रुम बहुत †सु ॥
१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
एक रूप एकै गति पाई । एक बरण एकै सबदाई ॥
संशय शोक रोग नहिं दहै । मगनरूप मन आनँद लहै ॥
षोड़शवर्ष अवस्था नितही । गुण पौरुषहरिजनके अतिही ॥
दिव्यभूषण दिव्यवस्त्र अङ्गा । श्यामगात सुन्दर छवि अङ्गा ॥
जुलफैं लटकिरहीं कजियारी । कुण्डलछविसोहत अधिकारी ॥
नासामोती सुब्रक सुढारा । सुन्दरतिलक लगतअति प्यारा ॥
दीरघ दृग कछूक अरुणाई । माथे मुकुट जटित ललिताई ॥
घरघर दिव्य आसन सिंहासन । और महासुखहैं हरिदासन ॥
दो० भौ मेटन अरुतिम हरण, तुमहिं नवाऊं शीस ।
चरणदास चरणन पर्यो, भक्तिकरो बकसीस ॥
शुकदेव गुरु कृपाकरी, दीन्हो भेद लखाय ।
साधुनके पग पूजतैं, सकलव्याधि मिटिजाय ॥
आस पास हरिजन रहें, मध्य ईश दरबार ॥
रसिक केलि बहु कुंजहैं, ललित द्वारहैं चार ॥
राजमहल जनपति रहें, कापै बरण्यो जाय ।
गिनत शारदाछविअधिक, गौरीसुत थकिजाय ॥
अनन्त भानु* कोसोउजियारो । वा 'मण्डल को रूप विचारो ॥
समतुल और कास को लाऊं । बैन सैन दै ताहि बताऊं ॥
चन्द सूर² वह ठौर न चीन्हो । दृष्टान्त देन†को पटतर दीन्हो ॥
आदि अनादि पुरातम धामा । जैसे आदिपुरुष घनश्यामा ॥
श्वेत‡रूप स्वरूप सुगन्धा । सहज महक जहँ उठत सुगन्धा ॥
चार द्वार बहु बाजन बाजैं । अनहद शब्द महाध्वनिगाजैं ॥
दिव्यरूप जो लगे किवाँरा । तिनके आगे बाग सुढारा ॥
१ सुन्दर २ सूर्य ॥
*प्रथम पाठ भानु अनन्त भानुसरिस।हितदृष्टान्त सो।श्वेतहि रूप ॥
अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १६
हरो बाग अद्भूत है भाई । दूजे द्वार महा अरुणाई ॥
तीजे द्वार बाग पियराई । चौथे ऊदो है थिरथाई ॥
उन बागन के आसा पासा । बहुत भवन जहाँ साधुनिवासा ॥
मैड़ी* मण्डप बहुत सुढारी । श्वेत वरण सुन्दर अधिकारी ॥
साधु सन्त जहाँ हरिजन पूरे । दास भाव भावना झूरे ॥
षोड़श भानु की‡ सुन्दरताई । जगत जीति पहुँचै जो जाई ॥
सखाभाव पहुँचत वहि ठांई । सखीभाव भीतर को जांई ॥
धरै स्वरूप अनूपम भारी । सदा सुहागिनिहरिपिय प्यारी ॥
परमपुरुष पुरुषोत्तम पावैं । निकटरहैं नित केलि बढ़ावैं ॥
चारौ मुक्ति¹ जहां कर जोरैं । भाव बताय तान बहु तोरैं ॥
दरशन, कारणकी सुखदाई । धरे स्वरूप रहैं हरपाई ॥
रतनजटित जहँ भूमि सुहाई । कोटि भानु छवि रहतलजाई ॥
एकसमय नित ऋतु छवि पावत । शीत उष्ण पावस नहिंआवत ॥
ऋतु वसन्त पीरी छवि सोहैं । वनघन कुंजलता मनमोहैं ॥
निज वृन्दावन है वह ठाहीं । सदा बसो मेरे मनमाहीं ॥
दिव्य फूल फूले बहुरंगा । बिन ऋतु फूले रंगविरंगा ॥
सकल सखी विचरत हरिसंगा । गोरी सखी श्याम हरी अंगा ॥
दो०-पुहुप जु फूले नित रहें, मोरैं ना कुम्हिलायँ ।
कई वरण कइरंगसों, अति सुगन्ध हरपायँ ॥
उन पुहुपन को नाम न जानौं । कहा नाम लै ताहि बखानौं ।
बहुत वृक्ष कुंजन घनछाहीं । फल अरु फूल लगे उनमाहीं ॥
काहू द्रुम न फल नहिं फूला । पुहुपरूप ह्वै आपहि झूला ॥
कोऊ लाल रूप ह्वै छायो । कोऊ श्वेत रूप मन भायो ॥
१ सायुज्य सारूप्य सामीप्य सालोक्य ॥
प्रथमपाठ * मन्दिर † दाससुभाव ‡ कि ॥
२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रंग रंग के वृक्ष बखाने । सो पुरुषोत्तम के मनमाने ॥
वनके माहिं बहुत जहाँ क्यारी । पुहुप रंग छवि न्यारी न्यारी ॥
कई भांति को बास तरंगा । मगनरूप बोलत सुरभंगा ॥
वनबिच श्वेतरूप छविनाना । गोल चौतरो रूपनिधाना ॥
इकरस चेतन परम सढोला । कोटि भानु छवि अमरअडोला ॥
जहाँ परिकर्मा सखी सहेली । बारह भानु रूप अलबेली ॥
दिव्य दमक जहाँ हीरा लागे । सात रंगके झिलमिल ताके ॥
ऊदा लाल श्वेत अरु पीरा । हरित श्याम लहरी अतिधीरा ॥
तापर चौसठ खम्भा दमकै । मानों कोटि भानु छाव झमकैं ॥
खम्भन लगे लाल ओर मुक्ता । पन्ना लगे बेलि की जुगता ॥
मूंगा लाल फिरोजा भारी । ध्यान धरो ताको नर नारी ॥
ये सब लगे बखानों ऐमे । जैसी जुगत लगे हैं जैसे ॥
जड़ लालनको विद्रुम डारी । पन्ना पात वृक्ष गतिधारी ॥
चुन्नी पँचरँग फूल सुहाये । फल मुक्ताहल झुकत झुकाये ॥
और बनी बहु चित्तरकारी । बेलि बड़ बूटा अधिकारी ॥
हीरा मोती चेतन होई । जानै साधू बिरला कोई ॥
दो०-ताकी छवि अति ललित है, शोभा सरस सुजान ।
लगो चंदोवा दिव्य अति, चेतन करो बखान ॥
लगे चंदोवा झालरि मोती । मानौ उडुगणै झिलमिलज्योती ॥
झालर बनी चंदोवा केरी । दिव्य दृष्टि करि साधुन हेरी ॥
तापर रंगमहल की शोभा । चेतन आनँद सुखकी गोभा ॥
स्थिर इकरस भीत सुढारी । बने झरोखा अद्भुत बारी ॥
अजब कँगूरा सुबक सुढारे । चौंसठ कलश लगै अतिप्यारे ॥
१ आदित्य, दिवाकर, भास्कर, प्रभाकर, सहंसांशु, त्रैलोक्यलोचन,
हरिदश्व, विभावसु, दिनकर, द्वादशात्मक, त्रिमूर्ति, सूर्य. २ नक्षत्र ॥
अमरलोकअखण्डधामवर्णन । २१
रतनजटितकी खिड़की सोहैं। ताके आगे दिनकर कोहैं ॥
भीत झरोखा कलशन माहीं। नग पन्ना लागे सब ठाहीं ॥
दो० मणि हीरा माणिक लगे, रंगमहल के माहिं ।
बिन पहुंचे निज धामके, क्योंहूँ दीखत नाहिं ॥
आसपास बहु कुंज हैं, बीच लालको धाम ।
चरणदास को दीजिये, सखियन में विश्राम ॥
जैसे चौसठ खम्भ हैं, तैसे करों बखान ।
छत्र सिंहासन वर्णहूँ, ओर सखियन की आन ॥
तीस खम्भमें खम्भा बीस । तामें चौदह खम्भा ईस ॥
परम बिछौना है थिरथाये । मानौ सूरज लक्ष छवि छाये ॥
तापर सिंहासन बड़भागी । श्वेतरूप चेतन अनुरागी ॥
सिंहासन पर कछू बिछायो । शोभा ताकी कहत न लजायो ॥
धरो गेंदवा तकिया नीके। छत्तर सोहै ऊपर पियके ॥
पियकी शोभा कहा बखानूं । आदि अन्त ताको नहिं जानूं ॥
अक्षर पुरुष पुरुषोत्तम स्वामी । सब जीवनको अन्तरयामी ॥
पारब्रह्म अविचल अविनाशी । वायें अङ्ग रूपकी राशी ॥
गोरी राधा कृष्ण श्यामघन । सिंहासन पर ललितमुदितमन ॥
आसन जहाँ अखिलजगदीशा । मुकुट चन्द्रिका सोहै शीशा ॥
मकराकृत कुण्डल छवि ऐसी । जग में कहा बखानूं जैसी ॥
जुलफें श्याम भुवङ्गम कारी । कजियारी अरु घुंघुरवारी ॥
सहज सुगन्ध रहे महकाई । लांबी चिकनी अरु बलखाई ॥
बांकी भौंह कुटिल अनियारी । तिरछी पलकें लागें प्यारी ॥
रस के माते घूम घुमारे । ललचौंहैं दृग हैं कजरारे ॥
१ जो कभी जूदा न हो ॥
प्रथमपाठजल ॥
२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बांके दीरघ ओर ललचौहैं । चितवत सखियन के मन मोहैं ॥
सुवक बुलाक नाक में सोहै । ध्यान करत मेरो मन मोहै ॥
बिजुरीसी मुसकानि पियाकी । मनखैंचनि अरुभाल हियाकी ॥
वदन श्यामघन कहाबखानूं । कोटि भानु छवि मुखपर वारूं ॥
दिव्य नीमा* अंग माहीं सोहै । सूरज कोटि कला छवि मोहै ॥
कंठी कंठ धुकधुकी झमकै । तामधिकौस्तुभमणिअतिदमकै ॥
मोतियन की माला वनमाला । हुलसैं देखि धाम की बाला ॥
दिव्य बद्वि†गलजंद जड़ाऊ । नौरतनन के बाजू बाजू ॥
पहुँची कड़ा कहा छवि गाऊं । सम तुल ताकी कहा वताऊं ॥
दिव्य जहांगीरी दोउ‡करमाहीं । ताकी सम कछु कलमें नाहीं ॥
रतन चौक में लाल विराजैं । शोभा गावत मो मन लाजैं ॥
रतन चौकहै पीठ हथेली । लगी जँजीर मुँदरियन भेली ॥
चौकी सुघर हिये पर राजै । कटिकिंकिणिघुँघुरूध्वनि वाजै ॥
जुगलचरण पैंजनि झनकारैं । दिव्य टोरे तिनमें ठनकारैं ॥
कोटि चन्द्र दश नखपर वारूं । तलुअन चिह्न इक्कीस निहारूं ॥
वायें अंग राधिका प्यारी । कोटि चंद्रछवि मुखपर वारी ॥
जुगल सखी लै चँवर दुरावैं । हिये हरषि महासुख पावैं ॥
खंभ खंभ ढिग सखी सहेली । चौदहखड़ीं ईश अलबेली ॥
औरसखी बहुतक बहिठाऊं । शोभा जिनकी कहत लजाऊं ॥
नित्य किशोरी गोरी सारी । पांच तत्त्व त्रैगुणैँ तें न्यारी ॥
दिव्य वस्त्र दिव्यभूषण जाना । अधिकरूप छवि वारह भाना ॥
कजियारी कच लटकैं बैनी । मुतियन मांग भरैं छवि पैनी ॥
चूड़ामणि गहनो अति नीको । शीशफूल अरु बेनो टीको ॥
१ जोकि समुद्रमथन में समुद्रसे निकसी थीं २ सत्, रज, तम ॥
प्रथमपाठ *दिव्यप्रभा अंग अंगन †वैंधी ‡कर ॥
अमरलोकअखण्डधामवर्णन । २३
करणफूल सँग बन्दी लागी । झुमके थिरकें महा सुभागी ॥
अंजन आंजे नैन ढरारे । तीखे १ अनियारे पिय प्यारे ॥
घूंघुरवारी २ अलकैं लटकैं । वेसरिनासा छवि लिये मटकैं ॥
चम्पाकली नौलरी माला । चन्दनहार सुपहिरे बाला ॥
कठुला जैसे गले जनेऊ । ओर हियचौकी महा अभेऊ ॥
सखी शिंगार हार सब साधैं । बाजूवँद बाहुन पर बांधैं ॥
सदा सुहागिनि पहिरे चूरी । सुवक पछेली बँगरी रूरी ॥
कँगनी अरु पहिरे जहाँगीरी । रतनचौक छवि लगी जँजीरी ॥
छाप छला अरु पहिरें मुँदरी । नुहसत पहिरें सुन्दर अँगुरी ॥
पांवन में पगनेवरि बाजैं । नख शिखलों आभूषण साजैं ॥
और सखी विखरीं वन माहीं । सो काहू विधि गिनी न जाहीं ॥
दो० सुन्दर छवि पियरे वसन, झुण्ड सखिन के जान ।
कोउ पुञ्ज ऊदे वसन, सुघर सवारी आन ॥
लालवसन बहुतक सखी, श्वेत वसन बहुनार ।
नीलवसन बहु भामिनी, सबको रूप अपार ॥
हरे वसन नारी घनी, घनी गुलाबी वेष ।
बहुत झुण्ड कइ रंगसों, गायसकें नहिं शेष ॥
निज वन चौंसठि खंभे माहीं । होत अखण्ड रास वहिठाहीं ॥
झुण्ड सबैयों वनि वनि आवैं । हुलसिहुलसिलालन ढिग धावैं ॥
रासकेलि खेलें बहु रंगा । मदा विहार करें पिय संगा ॥
कवहूँक घुमरि घुमरि घुमरावैं । नैन सैन दै भाव बतावैं ॥
कवहूँक थेइ थेइथेइ थेइ करें । कवहूँक अँगुली नासा धरैं ॥
कवहूँक कर उठाय गति चालैं । मांग उपांग बनावत हालैं ॥
कवहूँक ठुमुक-ठुमुकपगधावैं । घुँघुरूकी गतिअधिक बजावैं ॥
होअनुराग रागनीगावैं । वाजेअद्भुत अधिक बजावैं ॥
१ तिरछे २ छल्लेकी समान लहरी जिनमें होती हैं ॥
४
२४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ
दो० कहा बुद्धि कहा कहिसकूं, रासकेलि को साज ।
अद्भुत लीला होय रही, वर्णत आवै लाज ॥
अखण्ड धाम लीला अमर, नित वृन्दावन रास ।
नित विहार जहाँ होत है, चरणदास को वास ॥
गौरीसुत नहिंगा सकैं, नहीं शारदा वाम२ ।
चरणदास कहा बुद्धि है, बरणि सकै निज धाम ॥
बड़ी दया मोपै करी, कृष्ण कुँवर सुन लाल ।
वाणी आप बनायकै, कीन्हो मोहिं निहाल ॥
मम हिरदय में आयकै, तुमही कियो प्रकास ।
जी कछु कहौ सो तुम कहौ, मेरे मुखसों भास ॥
आदि पुरुष परमातमा, तुमहिं निवाऊं माथ ।
चरणन पास निवास दै, कीजै मोहिं सनाथ ॥
तुम्हरी भक्ति न छांड़िहूँ, तनमनशिरक्यों न जाव ।
तुम साहिब मैं दासहूँ, भलो बनो है दाव ॥
शुकदेव गुरु कृपा करी, मूरुख भये प्रवीन ।
मम मस्तकपर कर
अथ श्रीगुरुचेलासंवादधर्मजहाजप्रारम्भ ॥
शिष्यवचन ॥
दो०-अर्ज करै कर जोरिकै, यह चरणनको दास ।
एहो श्रीशुकदेव जी, कछु पूंछन की आंस ॥
गुरुवचन ॥
पूंछौ मनको खोल करि, मेटौ सब सन्देह ।
अरु तुम्हरे हिरदय बिषे, सदा हमारो गेह ॥
शिष्यवचन ॥
मैंतो चरणहि दासहौं, तुम तौ परम दयाल ।
एकन पग पनहीं नहीं, एक चढ़ें सुखपाल ॥
यही जु मोहिं बताइये, एक मुक्ति को जाहिं ।
एक नरकको जाय करि, मार यमोंकी खाहिं ॥
एकदुखी इक अतिसुखी, एक भूप इक रंक ।
एकन को विद्या बड़ी, एक पढ़े नहिं अंक ॥
एकन को मेवा मिलै, एकन चनेभि नाहिं ।
कारण कौन दिखाइये, करि चरणनकी छाहिं ॥
यही मोहिं समझाइये, मनका धोखा जाइ ।
ह्वै करि निस्संदेह मैं, चरण रहौं लपटाइ ॥
गुरुवचन ॥
जिन जैसी करणी करी, तैसेही फल पाय ।
भुगतत हैं वे जगत में, ताको बदला आय ॥
शिष्यवचन ॥
कही तुम्हारी हिय धरी, व्यासपुत्र शुकदेव ।
सुगत कुगत करणीनको, भिन्न भिन्न कहु भेव ॥
२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुवचन ॥
अब मैं वर्णन करत हौं, एशिष धर्म जहाज ।
तामें बैठे विधि सहित, रहनी गहनी साज ॥
जो कोई करणी ना करै, बहुत करै बकवाद ।
रीता जानौ तासु को, छूटै ना जग व्याध ॥
कथनी कै पूजी नहीं, करणी है ततसार ।
तामें लाभहि लाभ है, बदला दे कर्तार ॥
सूरति कीन्ही साधु की, तन मन लागी आग ।
बिन करणी कैसे बुझै, हरिसों नाहीं लाग ॥
कथनी कथि दंभी भये, कहैं दूर की बात ।
अन्तरमें करणी नहीं, मनहीं माहिं लजात ॥
दंभी उनको जानिये, जगमें सिद्ध दिखात ।
तनमन बचन नसाधिया, तिहुँविधि रोपी घात ॥
तनमन साधै साधु सो, वचन साधि जो लेय ।
उज्ज्वल करणीकै सहित, रामभक्ति चितदेय ॥
तनसों करणीही करै, मनसों निश्चय लाय ।
वचन जो ऐसा बोलिये, जो सबहीको सुहाय ॥
बिन करणी १थोथी सब बातें । जैसे बिन चंदाकी रातें ॥
तातै समुझि करो तुम करणी । बिन बोये नहिं उपजै धरणी ॥
जैसा बोवै तैता लुनिये । जानत ज्ञानी पण्डित गुनिये ॥
कीकर नींव बवै सोइ पावै । अरु मेवा वोवै सोइ खावै ॥
पिछिली करणी अबकै पावै । ताहीको नर करम बतावै ॥
होनहार अरु भाग वही है । परालब्धै सोइ बड़ोकही है ॥
खोटी करणी से दुख भारी । होवै रंक पुरुष अरु नारी ॥
१ बेकार २ चन्दुर .३ भाग्य ॥
कहैं शुकदेव सांच यह जानौ । चरणदास लै मनमें आनौ ॥
दो० कोइ कोढ़ी कोइ आंधरा, कोई रोगी निर्धन ।
अंगहीन मांगत फिरै, कोइ भूखा बिन अन्न ॥
बिना बुद्धि कोइ वावरे, कोइ छोटेतन हान ।
कोइ कर्मों से अति दुखो, जीवै ना सन्तान ॥
कोई जगत अधीन है, कोई बिना प्रतीत ।
कोइ सब वस्तू हीन है, यह पापों की रीत ॥
जन्म मरण बहु भांतिके, नाना भवन निवास ।
करणीही से होत है, ऊँच नीच घर वास ॥
पशु पक्षी अरु चर अचर, सोभी छूटै नाहिं ।
कर्मोंही की चालसों, भुक्तै जग के माहिं ॥
भांति भांति के कष्ट घनेही । पावत हैं वै कर्म सनेही ॥
इनहीं आंखिन सौं तुम देखौ । अपने मनमें करि करि लेखौ ॥
तन छूटे पुनि नरक गहैं हैं । नाना विधि के त्रास सहैं हैं ॥
नरकनकी गति परघट जानौ । शास्त्र माहिंसबकियो बखानौ ॥
अरु इक नरक जगत के माहीं । कोतवाल हाकिम के ठाहीं ॥
खोंटे कर्मन सों हां जावै । त्रास सहै बहुतै विरलावै ॥
शुभकर्मी जो निकसै आगे । उठि हाकिम चरणनसेलागे ॥
कहि शुकदेव सांचहै करणी । सुनिरणजीत करैसो भरणी ॥
दो० शुभकरणी पिछली करी, उज्ज्वल पाई देह ॥
शोभा जिनके भागकी, चरणदास सुनिलेह ॥
तनसों सुखी और धनधारी । सुत नारी सुन्दर संभारी ॥
नानाविधि के भोग करत हैं । अरु बहुतन के दुःखहरत हैं ॥
ऊँचे महल महा सुखदाई । जहां विराजत हैं मनलाई ॥
तीनौ ऋतुमें वै सुखपावैं । बहुतक लोग टहलमें आवैं ॥
२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
पिछली करणी करम जुलाये । जैसे जैसेही सुख पाये ॥
काहू मिली तुरंग सवारी । काहू पालकी झालरदारी ॥
काहू गज पाये बहुतेरे । लाखों पुरुष रहत हैं चेरे ॥
श्रीशुकदेव कहै ये बैना । चरणदास लखु अपने नैना ॥
दो० लाखों पगसों लगिरहे, रहैं जीविका आस ।
ईश्वर तिनके जेइहैं, वे हैं चरणहिं दास ॥
ऐसी ईश्वर पदवी पाई । पुण्य प्रताप कहा नहिं जाई ॥
सुनिकै शुभकर मनको कीजो । खोंटे कर्म सभी तजि दीजो ॥
इनहीं आंखिनसों सब सूझै । बुद्धिमान प्रत्यक्ष जु बूझै ॥
कोई चढ़े जाहिं रथमाहीं । सूरज१मुखी तासुकी छाहीं ॥
कोइ किरोड़पति लाखन वारा । कोई हजारनको व्यवहारा ॥
कोई थोड़े में सुख पावै । ह्वैकर सुखी बहुत हरषावै ॥
पिछली जैसी करी कमाई । तैसी तैसीही निधि पाई ॥
शुकदेव कहियों आलस हरियो । चरणदास शुभकरणी करियो ॥
दो० सुर दानव अरु अप्सरा, मनुष यक्ष गण प्रेत ।
कर्मोंहीं से होत है, पाप पुण्य का हेत ॥
नहिंतो हरि द्वैद्रष्टा नाहीं । एक दृष्टि सब ऊपर छाहीं ॥
जो जैसी करणी करि लेवै । हरि तैसाही बदला देवै ॥
अपना किया आपही पावै । परालब्ध वह नाम कहावै ॥
घटै बढ़ै वह नेकु न क्योंहीं । पावै वही जु करणी ज्योंहीं ।
नारिपुरुष मिलिकरि व्यवहारा । करणी सों उपजै संसारा ॥
बाहे बोवै खेत किसाना । भांतिभांतिके उपजैं दाना ॥
बाग लगावै सींचै माली । जब फल लागैं डाली डाली ॥
पक्षी अरु मानुष सुख पावै । चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
१ घटाटोप
धर्मजहाजवर्णन । २६
दो० माली करणी जो तजै, सींचै ना षटमास ।
जैव वह बाग उदास हो, दिन दिन वाको नास ॥
दया धर्म पुण्य दानहीं, बड़ करणी है सांच ।
तीनलोक¹ चौदहैं² भुवन, माहिं न आवै आंच ॥
तीरथ बरत कछू जो कीजै । अरु काहूको दान जु दीजै ॥
याको भी फल नीको पावै । चरणदास शुकदेव दिखावै ॥
शुभकरणी करि भक्ति उपावै । ताते हरिके निकट रहावै ॥
करणी योग महा बलदाई । ईश्वर ह्वै पावै मुक्ताई ॥
चारमुक्ति करणी सों पावै । मन करणीसों ज्ञान जगावै ॥
दो० उज्ज्वल कर्म सदा किये, अरपै हित भगवान ।
लही मुक्ति सालोकही, जन्म मरणकरि हान ॥
सेवा करि भगवान की, निकट बिराजै जाय ।
सा*मीप मुक्तिपाई तिन्हहुँ, इन्द्रहु से अधिकाय ॥
ध्यान किया श्रीकृष्ण का, भये जु वाके रूप ।
लही मुक्ति सारूपही, तनधरि अधिक अनूप ॥
पांचौ³ मुद्रा योगबल, दशवें⁴ काढै प्रान ।
मिली ज्योतिमें ज्योतिही, यह सायुज्य पिछान ॥
सबही करणी है बड़ी, भक्ति सबन सिरमोर ।
बांह पकरि हरि हेत करि, राखैं अपनी ठौर ॥
अजामील सों भी अधिक, जो कोउ पापी होय ।
नाम जपै हिय शुद्ध सों, पातक जावैं खोय ॥
१ स्वर्ग १ मृत्यु २ पाताल ३। २ भूः १ भुवः २ स्वः ३ मह ४ जन ५
तप ६ सत्य ७ तल ८ अतल ९ वितल १० सुतल ११ रसातल १२
तलातल १३ पाताल १४। ३ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान। ४ दशौ
इन्द्रिय । आंख, नाक, श्रवण, जिह्वा, हाथ, वाणी, पांव, त्वचा, लिंग, गुदा ॥
प्रथमपाठ * निकट ॥
३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
महिमा गुरु के ध्यानकी, को करि सकै बखान ।
मेरे मन निश्चय यही, जाय मिलै भगवान ॥
करणी सों सत्ती भवै, करणी सों दातार ।
करणी सों शूरा भवै, जावै स्वर्ग 'मँझार ॥
भांतिभांति के सुख जहां, भोगै भोग अपार ।
धर्म पन्थ कोई चलै, शूद्रा कै नर नार ॥
चारिसमय नित नेमकरि, सदा रहै निष्पाप ।
गिना जाय हरिजन बिषे, होय नहीं जन ताप ॥
जिन जैसी करणी करी, सो निष्फल नहिं जाय ।
जाका बदला होयगा, शुकदेवा कहै गाय ॥
ब्राह्मण करणी ब्राह्मण होई । क्षत्री कर्मसों क्षत्री सोई ॥
वैश्य कर्म सों वैश्य कहावै । शूद्रकर्म सों शूद्र लखावै ॥
नहीं तो सबकी देह बराबर । पांचतत्त्व त्रैगुण सों कर कर ॥
कान आंख मुख नासा एकी । शीश हाथ पग काया देखी ॥
एकबाट ' ह्वै सबही आवै । एकहि भांति सबै बनिधावै ॥
दो० जाति वर्ण अरु 'आश्रम, करणी सों दर्शाय ।
चरणदास निश्चय करो, मूरख भी ले पाय ॥
धोबी छीपी आदि दै, ये छत्तीसौ पौन ।
करणी के सब नाम हैं, जैसो करै सो जोन ॥
कर्मोंहीं से जग यह भासै । कर्मोंही से फिर ह्वै नासै ॥
कर्म प्रलय उतपत्ति करावै । होनिहु कर्म ब्रह्म ह्वै जावै ॥
परलय समय कर्म जी सार्था । बुरे भले जो लागै गाथा ॥
संगहि जाय रहै माया में । 'माया जाय लगत काया में ॥
१ चारि अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र । २. चारि अर्थात् ब्रह्मचारी,
गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास ॥
धर्मजहाजवर्णन । ३१
वासा करि हरि चरणन माहीं । होय लीन वह मिटै जुनाहीं ॥
पूंजी कर्म जु माया पासा । फिरउतपति की वाको आसा॥
परलय कालब्यतीते जबहीं । उतपति करै जगतहू तबहीं ॥
चरणदास तुम ऐसे जानौ । कहैंशुकदेव सांच करि मानौ ॥
दो० रहत प्रलय महँ वस्तु छः, इनका नाश न होय !
सो मैं वर्णन करतहों, बुधिआंखन सों जोय ॥
काल अकास जीव अरु माया । पाप पुण्य प्रत्यक्ष बताया ॥
फिर उतपति इनहीं सों होई । जानै पण्डित विरला कोई ॥
काल न एकौ करै पुराना । प्रलय होय सो निश्चयजाना ॥
फिर परलय को लागारहै । करै समाप्त आपना गहै ॥
उतपतिसमै और नहिं होई । परलय हुये जो उतपति सोई ॥
कर्म धरे रहै ज्यों के त्योंही । उलटे पलटे नाहीं क्योंहीं ॥
जैसे के तैसे तन धारे । कर्म लगे रहे उनके लारे ॥
कहि शुकदेव कर्मगति भारी । चरणदास कोइछुटै खिलारी ॥
शिष्यवचन ॥
दो० चरणदास यों कहत है, सुनो गुरू शुकदेव ।
ज्यों करि हो निष्कर्मही, ताको कहियो भेव ॥
गुरुवचन ॥
कहि शुकदेव सँदेह मिटाऊं । ज्योंकी त्यों पूरी समझाऊं ॥
खोंटी करणी नरकहि जावे । पाप क्षीण मृतलोकहि आवे ॥
भले कर्म जा स्वर्ग मँझारा । पुण्यक्षीण मृतलोकहि डारा ॥
ऐसे लोक लोक फिरि आवै । कर्म न छूटै दुख सुख पावै ॥
जैसे कर्म छुटै सो कहूँ । तोपै दया करतही रहूँ ॥
खोटे कर्म सु सकल निवारै । शुभ करणी को नीके धारै ॥
जाके फलको मन नहिं लावै । ह्वै निष्कर्म परम सुख पावै ॥
३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
फल त्यागै सोइ चरणदासा। चरणकमलकी राखै आसा ॥
दो० सो पावै निर्वान' पद, आवा गमन मिटाय ।
जन्म मरण होवे नहीं, फिरि फिरि काल न खाय ॥
शिष्यवचन ॥
जो जो कहि गुरुदेवजी, सो सो परी प्रत्यक्ष ।
चरणदास को दीजिये, साधु होन की शिक्ष ॥
गुरुवचन ॥
वही साधवी जानिये, निरवारै सब कर्म ।
तन मन वचन सधेरहैं, पालै अपना धर्म ॥
पहिले साधै वचन को, दूजे साधै देह ।
तीजे मन को साधये, गुरु सों राखै नेह ॥
जिनहीं के उपदेश को, सुन राखै निज चित्त ।
ताको मनन सदा करै, भूलै ना नित वृत्त ॥
शिष्यवचन ॥
जो जो कही सो जानिया, एहो श्री शुकदेव ।
साधन तन मन वचन को, सबही कहिये भेव ॥
गुरुवचन ॥
शिष्य सो तोसों कहत हौं, नीके सुन दै कान ।
ज्यों ज्यों कर्म बचैं दशौ, ताकी करि पहिचान ॥
प्रथम वचन के चार सुनाऊं । तेरे चितमें नीके लाऊं ॥
एक यही जो झूठ न बोलै । सांच कहै तब हिरदय तोलै ॥
झूठ कहन को पातक भारी । जो जप करै सुदेह उजारी ॥
झूठेका जप लागत नाहीं । सिद्धहोय नहिं निष्फल जाहीं ॥
अरु झूठेकी नहिं परतीतैं । झूठेकी खोटी सब रीतैं ॥
१ जिस को कि ब्रह्मपद सबसे उत्तम कहते हैं ॥