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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
फल त्यागै सोइ चरणदासा। चरणकमलकी राखै आसा ॥
दो० सो पावै निर्वान' पद, आवा गमन मिटाय ।
जन्म मरण होवे नहीं, फिरि फिरि काल न खाय ॥
शिष्यवचन ॥
जो जो कहि गुरुदेवजी, सो सो परी प्रत्यक्ष ।
चरणदास को दीजिये, साधु होन की शिक्ष ॥
गुरुवचन ॥
वही साधवी जानिये, निरवारै सब कर्म ।
तन मन वचन सधेरहैं, पालै अपना धर्म ॥
पहिले साधै वचन को, दूजे साधै देह ।
तीजे मन को साधये, गुरु सों राखै नेह ॥
जिनहीं के उपदेश को, सुन राखै निज चित्त ।
ताको मनन सदा करै, भूलै ना नित वृत्त ॥
शिष्यवचन ॥
जो जो कही सो जानिया, एहो श्री शुकदेव ।
साधन तन मन वचन को, सबही कहिये भेव ॥
गुरुवचन ॥
शिष्य सो तोसों कहत हौं, नीके सुन दै कान ।
ज्यों ज्यों कर्म बचैं दशौ, ताकी करि पहिचान ॥
प्रथम वचन के चार सुनाऊं । तेरे चितमें नीके लाऊं ॥
एक यही जो झूठ न बोलै । सांच कहै तब हिरदय तोलै ॥
झूठ कहन को पातक भारी । जो जप करै सुदेह उजारी ॥
झूठेका जप लागत नाहीं । सिद्धहोय नहिं निष्फल जाहीं ॥
अरु झूठेकी नहिं परतीतैं । झूठेकी खोटी सब रीतैं ॥
१ जिस को कि ब्रह्मपद सबसे उत्तम कहते हैं ॥