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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 690 में से

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पृष्ठ 63

३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
महिमा गुरु के ध्यानकी, को करि सकै बखान ।
मेरे मन निश्चय यही, जाय मिलै भगवान ॥
करणी सों सत्ती भवै, करणी सों दातार ।
करणी सों शूरा भवै, जावै स्वर्ग 'मँझार ॥
भांतिभांति के सुख जहां, भोगै भोग अपार ।
धर्म पन्थ कोई चलै, शूद्रा कै नर नार ॥
चारिसमय नित नेमकरि, सदा रहै निष्पाप ।
गिना जाय हरिजन बिषे, होय नहीं जन ताप ॥
जिन जैसी करणी करी, सो निष्फल नहिं जाय ।
जाका बदला होयगा, शुकदेवा कहै गाय ॥
ब्राह्मण करणी ब्राह्मण होई । क्षत्री कर्मसों क्षत्री सोई ॥
वैश्य कर्म सों वैश्य कहावै । शूद्रकर्म सों शूद्र लखावै ॥
नहीं तो सबकी देह बराबर । पांचतत्त्व त्रैगुण सों कर कर ॥
कान आंख मुख नासा एकी । शीश हाथ पग काया देखी ॥
एकबाट ' ह्वै सबही आवै । एकहि भांति सबै बनिधावै ॥
दो० जाति वर्ण अरु 'आश्रम, करणी सों दर्शाय ।
चरणदास निश्चय करो, मूरख भी ले पाय ॥
धोबी छीपी आदि दै, ये छत्तीसौ पौन ।
करणी के सब नाम हैं, जैसो करै सो जोन ॥
कर्मोंहीं से जग यह भासै । कर्मोंही से फिर ह्वै नासै ॥
कर्म प्रलय उतपत्ति करावै । होनिहु कर्म ब्रह्म ह्वै जावै ॥
परलय समय कर्म जी सार्था । बुरे भले जो लागै गाथा ॥
संगहि जाय रहै माया में । 'माया जाय लगत काया में ॥
१ चारि अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र । २. चारि अर्थात् ब्रह्मचारी,
गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास ॥