भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । २६
दो० माली करणी जो तजै, सींचै ना षटमास ।
जैव वह बाग उदास हो, दिन दिन वाको नास ॥
दया धर्म पुण्य दानहीं, बड़ करणी है सांच ।
तीनलोक¹ चौदहैं² भुवन, माहिं न आवै आंच ॥
तीरथ बरत कछू जो कीजै । अरु काहूको दान जु दीजै ॥
याको भी फल नीको पावै । चरणदास शुकदेव दिखावै ॥
शुभकरणी करि भक्ति उपावै । ताते हरिके निकट रहावै ॥
करणी योग महा बलदाई । ईश्वर ह्वै पावै मुक्ताई ॥
चारमुक्ति करणी सों पावै । मन करणीसों ज्ञान जगावै ॥
दो० उज्ज्वल कर्म सदा किये, अरपै हित भगवान ।
लही मुक्ति सालोकही, जन्म मरणकरि हान ॥
सेवा करि भगवान की, निकट बिराजै जाय ।
सा*मीप मुक्तिपाई तिन्हहुँ, इन्द्रहु से अधिकाय ॥
ध्यान किया श्रीकृष्ण का, भये जु वाके रूप ।
लही मुक्ति सारूपही, तनधरि अधिक अनूप ॥
पांचौ³ मुद्रा योगबल, दशवें⁴ काढै प्रान ।
मिली ज्योतिमें ज्योतिही, यह सायुज्य पिछान ॥
सबही करणी है बड़ी, भक्ति सबन सिरमोर ।
बांह पकरि हरि हेत करि, राखैं अपनी ठौर ॥
अजामील सों भी अधिक, जो कोउ पापी होय ।
नाम जपै हिय शुद्ध सों, पातक जावैं खोय ॥
१ स्वर्ग १ मृत्यु २ पाताल ३। २ भूः १ भुवः २ स्वः ३ मह ४ जन ५
तप ६ सत्य ७ तल ८ अतल ९ वितल १० सुतल ११ रसातल १२
तलातल १३ पाताल १४। ३ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान। ४ दशौ
इन्द्रिय । आंख, नाक, श्रवण, जिह्वा, हाथ, वाणी, पांव, त्वचा, लिंग, गुदा ॥
प्रथमपाठ * निकट ॥