भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । ३१
वासा करि हरि चरणन माहीं । होय लीन वह मिटै जुनाहीं ॥
पूंजी कर्म जु माया पासा । फिरउतपति की वाको आसा॥
परलय कालब्यतीते जबहीं । उतपति करै जगतहू तबहीं ॥
चरणदास तुम ऐसे जानौ । कहैंशुकदेव सांच करि मानौ ॥
दो० रहत प्रलय महँ वस्तु छः, इनका नाश न होय !
सो मैं वर्णन करतहों, बुधिआंखन सों जोय ॥
काल अकास जीव अरु माया । पाप पुण्य प्रत्यक्ष बताया ॥
फिर उतपति इनहीं सों होई । जानै पण्डित विरला कोई ॥
काल न एकौ करै पुराना । प्रलय होय सो निश्चयजाना ॥
फिर परलय को लागारहै । करै समाप्त आपना गहै ॥
उतपतिसमै और नहिं होई । परलय हुये जो उतपति सोई ॥
कर्म धरे रहै ज्यों के त्योंही । उलटे पलटे नाहीं क्योंहीं ॥
जैसे के तैसे तन धारे । कर्म लगे रहे उनके लारे ॥
कहि शुकदेव कर्मगति भारी । चरणदास कोइछुटै खिलारी ॥
शिष्यवचन ॥
दो० चरणदास यों कहत है, सुनो गुरू शुकदेव ।
ज्यों करि हो निष्कर्मही, ताको कहियो भेव ॥
गुरुवचन ॥
कहि शुकदेव सँदेह मिटाऊं । ज्योंकी त्यों पूरी समझाऊं ॥
खोंटी करणी नरकहि जावे । पाप क्षीण मृतलोकहि आवे ॥
भले कर्म जा स्वर्ग मँझारा । पुण्यक्षीण मृतलोकहि डारा ॥
ऐसे लोक लोक फिरि आवै । कर्म न छूटै दुख सुख पावै ॥
जैसे कर्म छुटै सो कहूँ । तोपै दया करतही रहूँ ॥
खोटे कर्म सु सकल निवारै । शुभ करणी को नीके धारै ॥
जाके फलको मन नहिं लावै । ह्वै निष्कर्म परम सुख पावै ॥