भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहैं शुकदेव सांच यह जानौ । चरणदास लै मनमें आनौ ॥
दो० कोइ कोढ़ी कोइ आंधरा, कोई रोगी निर्धन ।
अंगहीन मांगत फिरै, कोइ भूखा बिन अन्न ॥
बिना बुद्धि कोइ वावरे, कोइ छोटेतन हान ।
कोइ कर्मों से अति दुखो, जीवै ना सन्तान ॥
कोई जगत अधीन है, कोई बिना प्रतीत ।
कोइ सब वस्तू हीन है, यह पापों की रीत ॥
जन्म मरण बहु भांतिके, नाना भवन निवास ।
करणीही से होत है, ऊँच नीच घर वास ॥
पशु पक्षी अरु चर अचर, सोभी छूटै नाहिं ।
कर्मोंही की चालसों, भुक्तै जग के माहिं ॥
भांति भांति के कष्ट घनेही । पावत हैं वै कर्म सनेही ॥
इनहीं आंखिन सौं तुम देखौ । अपने मनमें करि करि लेखौ ॥
तन छूटे पुनि नरक गहैं हैं । नाना विधि के त्रास सहैं हैं ॥
नरकनकी गति परघट जानौ । शास्त्र माहिंसबकियो बखानौ ॥
अरु इक नरक जगत के माहीं । कोतवाल हाकिम के ठाहीं ॥
खोंटे कर्मन सों हां जावै । त्रास सहै बहुतै विरलावै ॥
शुभकर्मी जो निकसै आगे । उठि हाकिम चरणनसेलागे ॥
कहि शुकदेव सांचहै करणी । सुनिरणजीत करैसो भरणी ॥
दो० शुभकरणी पिछली करी, उज्ज्वल पाई देह ॥
शोभा जिनके भागकी, चरणदास सुनिलेह ॥
तनसों सुखी और धनधारी । सुत नारी सुन्दर संभारी ॥
नानाविधि के भोग करत हैं । अरु बहुतन के दुःखहरत हैं ॥
ऊँचे महल महा सुखदाई । जहां विराजत हैं मनलाई ॥
तीनौ ऋतुमें वै सुखपावैं । बहुतक लोग टहलमें आवैं ॥